chhat par kabootar
chhat par kabootar

Kids story in hindi: निक्की परेशान थी। सुबह से कई बार सोच चुकी थी, ‘ये परिंदे बेचारे प्यासे होते हैं तो इन्हें पानी कहाँ से मिलता है? भूख लगती है तो खाने को दाना मिल जाता होगा? … कितनी मुश्किल है। ये अपनी बात भी तो किसी से नहीं कह पाते न!’

निक्की ने मम्मी से पूछा तो मम्मी समझ गईं उसके दिल की बात। बोली, “निक्की, तुम हर सुबह छत पर कबूतरों के लिए दाना डाल दिया करो। मिट्टी के सकोरे में उनके पीने के लिए पानी रख दिया करो। तब सच्ची-मुच्ची वे खुशी से चहकेंगे।… पर इसके लिए तुम्हें सुबह जल्दी उठना होगा। उठ पाओगी?”

“क्यों नहीं, मम्मी? इसमें क्या मुश्किल है…!” निक्की को मम्मी की बात एक चुनौती की तरह लगी। बोली, “मैं तो उठ जाऊँगी, पर मम्मी, दाने किसमें डालूंगी…? कोई बड़ी सी प्लेट तो रखो। या फिर मिट्टी की ले आते हैं। और हाँ, पानी के लिए एक सकोरा भी तो चाहिए।”

मम्मी ने अगले ही दिन चौक के पास वाले माँगेलाल कुम्हार के पास जाकर मिट्टी की एक छोटी-सी तश्तरी ले ली। साथ ही एक छोटा-सा सकोरा भी। उसे निक्की को देकर बोली, “निक्की, अब तू वादा कर, कभी नागा नहीं करेगी।…तुझे एक दिन नाश्ता न मिले तो आफत आ जाती है न! ऐसे ही कबूतरों से तेरी दोस्ती हो जाएगी, तो वे रोज-रोज बड़ी उम्मीद से आएँगे छत पर। और अगर दाना-पानी न मिले, तो जरा सोच, उन्हें कितना दुख होगा।”

निक्की बोली, “देख लेना मम्मी, मैं वादा निभाऊँगी।” फिर मजे में गरदन हिलाकर बोली, “मम्मी, फिर तो कबूतरों से मेरी पक्की दोस्ती हो जाएगी न!”

मम्मी ने हँसकर उसके गाल पर चपत लगाते हुए कहा, “हाँ जी, निक्की बिटिया, जरूर…!”

अगले दिन से ही निक्की की सुबहें बदल गईं। रोजाना वह आधा घंटा पहले उठती और सीधा छत पर भागती। झटपट मिट्टी की तश्तरी में दाना डालती और सकोरा पानी से भरकर रख देती। और फिर कबूतरों का इंतजार…! सोचती, ‘अब आए कबूतर … अब आए!’

ऐसे ही एक दिन बीता, दो दिन। तीसरा दिन भी निकल गया। पर कबूतरों ने इधर रुख ही नहीं किया तो निक्की परेशान।

तभी निक्की का ध्यान सामने वाली छत पर गया। उसने देखा कि सामने वाले घर में फौजी अंकल कबूतरों को बड़े प्यार से दाना खिला रहे हैं। और इतना ही नहीं, वे तो जैसे हँस-हँसकर उनसे कुछ बातें भी कर रहे हैं। कबूतर उनके इर्द-गिर्द ऐसे आकर जमा हो गए, जैसे फौजी अंकल के प्यारे दोस्त हों और उनकी सारी बातें समझ रहे हों।

फौजी अंकल की छत पर बाँस का बना एक जाल भी था, जिस पर दाना चुगने के बाद कबूतर मजे में बैठे हुए थे और अब वे बड़े प्यार से ‘गुटर-गूँ, गुटर-गूँ’ कर रहे थे। जैसे मीठा गाना गाकर फौजी अंकल का अभिनंदन कर रहे हों।

निक्की सोचने लगी, ‘ओहो, तो यह बात है! फौजी अंकल इतना प्यार जताते हैं, इसीलिए तो कबूतर वहाँ से हिलने का नाम नहीं लेते। तो फिर वे मेरी छत पर क्यों आएँगे? पता नहीं, यहाँ आकर वे कभी दाना खाएँगे भी या नहीं?’

कुछ देर निक्की परेशान सी यहाँ-वहाँ टहलती रही। फिर अचानक उसे एक आइडिया सूझा। उसने दाने से भरा कटोरा उठा लिया। उसे दिखाकर जोर-जोर से पुकारने लगी, “कबूतर आ- आ-आ… कबूतर आ-आ-आ!”

नन्ही निक्की को ‘कबूतर आ-आ’ की पुकार लगाते देख, फौजी अंकल को इतना मजा आया कि उनकी लंबी-लंबी मूँछें फड़कने लगीं। हँसते हुए बोले, “अरे निक्की, ऐसे ही थोड़े आ जाएँगे कबूतर! बिटिया, ये तो मेरे पले हुए हैं, बरसों बरस से यहीं रह रहे हैं।”

पर फौजी अंकल यह देखकर हैरान रह गए कि अभी उनकी बात पूरी हुई भी न थी कि उनके जाल पर से उड़कर दो-तीन कबूतर निक्की की छत पर आ गए। निक्की ने झट अपने हाथ में पकड़ी हुई बाजरे के दानों से भरी तश्तरी नीचे रखी और पुचकारकर उन्हें पास बुलाया।

पर निक्की समझ गई कि अभी कबूतर कुछ डरे हुए हैं। इसीलिए पास आने में झिझक रहे हैं। उसने झटपट बाजरे की तश्तरी से दाने निकालकर आसपास बिखेर दिए। फिर दूर पत्थर की बेंच पर जाकर बैठ गई कि देखूँ, ये कबूतर दाने चुगते हैं कि नहीं?

निक्की की खुशी का कोई ठिकाना न रहा, जब उसने देखा कि उन तीनों कबूतरों ने बड़े मजे से पहले थोड़ा पानी पिया, फिर दाना चुगने लगे।

अभी ये तीन कबूतर दाना चुग ही रहे थे कि देखते-देखते पाँच-सात कबूतर और आ गए। और फिर तो थोड़ी ही देर में कबूतरों का एक बड़ा सा झुंड निक्की की छत पर नजर आने लगा।

दूर पत्थर की बेंच पर बैठी निक्की मजे में तालियाँ बजा रही थी। उसने मीठे सुर में गाना भी गाना शुरू कर दिया था, “कबूतर आ-आ-आ… दाना खा-खा-खा…गाना गा-गा-गा…!!”

गाना खत्म हुआ तो निक्की ने घूमकर देखा, फौजी अंकल के बाँस वाले जाल पर कबूतरों की संख्या अब आधी भी नहीं रह गई थी। देखते ही देखते फौजी अंकल का चेहरा लटक गया। भला अपनी छत से जाते हुए कबूतरों को वे कैसे रोकें?

अब तो निक्की का रोजाना का ही यह नियम बन गया। वह मिट्टी की बड़ी-सी तश्तरी में ढेर सारे बाजरे के दाने रखती और सकोरे में पानी भरकर रखती। फिर उसी तरह मीठे सुर में गाती हुई पुकार लगाती, “कबूतर आ-आ-आ…दाना खा-खा-खा… गाना गा-गा-गा…!!”

निक्की की आवाज में न जाने कैसा जादू था कि फौजी अंकल की छत से कबूतर उड़ते और देखते ही देखते निक्की की छत पर नजर आने लगते। वे बाजरे के दाने खाते, पानी पीते। इधर-उधर बैठकर मजे में गुटर-गूँ करते और फिर उड़ जाते।

*

फौजी अंकल हैरान, कुछ-कुछ परेशान भी थे। वे रोजाना देखते कि उनके यहाँ से कबूतर ढेर सारा दाना रखने के बावजूद उड़कर निक्की के यहाँ चले जाते हैं। कोई घंटे भर के लिए उनकी छत एकदम सुनसान हो जाती है और निक्की की छत गूँजने और चहचहाने लगती है। अब तो कबूतरों से निक्की की इस कदर दोस्ती हो गई थी कि वे उसके चारों ओर घेरा बनाकर बैठ जाते थे। कुछ उसके कंधों पर भी बैठ जाते थे। मानो सारे के सारे कबूतर निक्की से बातें करना चाहते हों!

फौजी अंकल अकेले अपनी छत पर टहलते हुए यह देखते रहते और कुढ़ते रहते। निक्की ने कई बार उन्हें गाल पर हाथ रखे कुछ सोचते देखा तो सोचा, ‘अरे, फौजी अंकल तो लगता है, कुछ ज्यादा ही परेशान हो गए। पर कबूतरों को बच्चों से दोस्ती ज्यादा पसंद है न, तो मैं भला क्या करूँ?’

इतने में निक्की का स्कूल जाने का टाइम हो गया। कबूतरों को ‘टा-टा’ करके वह छत से नीचे आई और नहा–धोकर स्कूल जाने की तैयारियों में लग गई। इस पर कुछ कबूतर तो उड़कर वापस फौजी अंकल की छत पर चले गए। लेकिन बहुत से कबूतर ऐसे थे, जिन्हें निक्की से प्यार हो गया था। निक्की के जाने के बाद भी वे उसकी छत पर मँडराते और ‘गुटर-गूँ, गुटर-गूँ’ करते रहे।

निक्की यह देखकर दुखी थी कि फौजी अंकल तो बेचारे बिल्कुल अकेले रह गए। उसे पता था, आंटी तो दो साल पहले हार्ट अटैक से गुजर गईं। दो बेटे हैं, दोनों अमेरिका में। इतने बड़े घर में अकेले फौजी अंकल रह रहे हैं। कल तक कबूतरों से उनकी छत भरी रहती थी। पर अब ये कबूतर उनके पास जाना ही नहीं चाहते। यह तो ठीक बात नहीं। उसने सोचा, मुझे कुछ करना चाहिए।

अगले दिन कबूतरों को दाना चुगाने के बाद वह बोली, “फौजी अंकल, आप ही बताइए, मैं क्या करूँ? ये कबूतर तो वापस जा ही नहीं रहे हैं।”

सुनकर फौजी अंकल एक पल के लिए चुप। वे भला क्या कहें? फिर एकाएक हँसकर बोले, “बिटिया, जैसे तुम ‘कबूतर आ-आ-आ’ करती हो वैसे ही ‘कबूतर जा-जा-जा’ भी कहा करो। तब शायद ये वापस मेरे पास आ जाएँ।”

नन्ही निक्की को बात जँच गई। जैसे ही कबूतरों का दाना खत्म हुआ, उसने खाली तश्तरी दिखाकर, हाथ हिलाते हुए सभी कबूतरों से कहा, “कबूतर जा-जा-जा… कबूतर जा-जा- जा!” और सचमुच नन्ही निक्की के जा-जा कहते ही सभी कबूतर उड़ते हुए फौजी अंकल की छत पर जा पहुँचे और उनके बाँस के जाल पर जा बैठे।

यह देखकर फौजी अंकल का कुम्हलाया चेहरा खिल गया। इस पर नन्ही निक्की को बड़े जोर की हँसी आई। उसे लगा, उसकी छत से फौजी अंकल की छत पर उड़कर जाते हुए कबूतर भी धीरे-धीरे हँसते हुए गुटर-गूँ, गुटर-गूँ करते जा रहे हैं।

अब तो यह रोजाना का ही तमाशा बन गया। निक्की का यह मजेदार खेल था। शुरू में दाने से भरी हुई तश्तरी दिखाकर वह कबूतर आ-आ कहती और सारे कबूतर उसकी छत पर आ जाते और बाद में जा-जा कहती, तो सारे कबूतर फौजी अंकल की छत पर जा बैठते। फिर निक्की बड़े मजे में तैयार होकर स्कूल की ओर चल देती।

फौजी अंकल अब खुश थे और अकसर अपनी फड़कती हुई मूँछों के साथ, कबूतरों से पहले की तरह बातें करते दिख जाते थे। इतना ही नहीं, निक्की को छत पर देखकर वे खूब जोर से हँसते हुए हाथ हिलाकर अपनी खुशी प्रकट करते थे। और निक्की भी अपनी छत से आवाज लगाती थी, “हैलो फौजी अंकल, आप खुश हैं न…!”

निक्की को लगा, कबूतरों से दोस्ती ने उसे प्यारे फौजी अंकल का भी दोस्त बना दिया है। अब तो वे कई बार घूमते-टहलते हुए घर आ जाते हैं और निक्की के मम्मी-पापा से मिलकर कहते हैं, “निक्की तो एक नन्ही एंजिल है। सबका दिल जीतने वाली एंजिल। इसीलिए तो इसका जादू कबूतरों पर भी चल गया।”

और निक्की सोच रही थी, ‘इस बार अपने बर्थडे पर दोस्तों के साथ-साथ मैं फौजी अंकल को भी जरूर बुलाऊँगी। अपनी बड़ी-बड़ी, फड़कती हुई मूँछों में भी मुझे तो वे बिल्कुल बच्चे जैसे लगते हैं!’

ये कहानी ‘इक्कीसवीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं 21vi Sadi ki Shreshtha Baal Kahaniyan (21वी सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियां)