fifty shades of grey novel in Hindi
fifty shades of grey novel in Hindi

fifty shades of grey novel in Hindi: कमरे में कदम रखते ही सबसे पहले मुझे एक अलग सी गंध का एहसास हुआ-चमड़े, लकड़ी और पॉलिश की मिली-जुली खट्टी सी गंध! ये खुशनुमा है और कमरे में जाने कहां से हल्की सी रोशनी आ रही है। दरअसल, पता नहीं चल रहा कि रोशनी का स्त्रोत कहां है पर बड़ा ही मोहक वातावरण है। दीवारें और छत गहरे बरगंडी रंग से रंगे होने के कारण बड़े से कमरे को मां की कोख जैसा प्रभाव दे रहे हैं और वहां का फर्श वार्निश की गई पुरानी लकड़ी का बना है। दरवाजे के सामने वाली दीवार पर एक्स के आकार का बड़ा लकड़ी का क्रास टंगा है। ये अच्छी पॉलिश वाली महोगनी लकड़ी का बना है और उसके दोनों कोनोंपर हाथ-पांव बांधने वाली हथकड़ियां टंगी हैं। इसके ऊपर लोहे की बनी महंगी जाली दिख रही है, जो कम से कम आठ फुट चौरस होगी और उससे कई तरह की रस्सियां, जंजीरें और बेड़ियां लटकी हैं। दरवाजे के पास ही दीवार पर पर्दे की लंबी रॉड जैसी कोई चीज़ टंगी है, जिस पर कई तरह के पैडल, कोड़े, चाबुक और मजाकिया से दिखने वाले पंखनुमा उपकरण टंगे हैं।

दरवाजे के साथ ही महोगनी के बने रैक में कई दराज दिख रहे हैं, हर दराज इतना पतला है मानो किसी पुराने संग्रहालय की तरह उसमें भी कुछ खास नमूने संभाले गए हों। मैं सोचने लगी कि भला उन दराजों में होगा क्या? क्या मैं सचमुच जानना चाहती हूं? दूसरे कोने पर चमड़े का गद्देनुमा बेंच था। वहीं पास ही पॉलिश लकड़ी का ऐसा रैक देखा जा सकता है जो देखने में पूल या बिलियर्ड के खेल का सामान रखने के लिए बना हो पर ध्यान से देखने पर उसमें कई तरह की लंबाईयों और चौड़ाईयों की छड़ियां देखी जा सकती हैं। उसके विपरीत कोने में छह फुट लंबा मेज रखा है, जिसकी टांगों पर कलात्मक कारीगरी की गई है और उसके नीचे दो मेल खाते स्टूल भी पड़े हैं।

पर उस कमरे में पलंग सबसे बड़ा दिख रहा है। ये तो किंग साइज से भी बड़ा है। कारीगरी देखने लायक है। ऐसा लगता है कि उन्नीसवीं सदी से संबंध रखता हो। उसके चंदोवे तले, कई और तरह की जंजीरें और हथकड़ियां दिख रही हैं। वहां पलंग पर कोई बिस्तर नहीं है… बस लाल चमड़े से मढ़ा गद्दा और लाल साटिन के कुशन एक-दूसरे पर ढेर बने पड़े हैं।

बिस्तर के पास ही कुछ फीट की दूरी पर एक बड़ा बाजुओं वाला गद्देदार सोफा रखा है और कमरे के बीचों-बीच पड़े इस काउच का मुंह पलंग की ओर है। इतना सामान होने के बावजूद इस काउच ने मेरा ध्यान खासतौर से अपनी ओर खींचा। वैसे वो देखने में थोड़ा अजीब लग रहा था। एक काउच, जिसका मुंह पलंग की ओर था। मैंने छत पर देखा तो कई जगह छल्ले से टंगे दिखे, जिनसे कुछ भी टांगा जा सकता था। इन सब चीजों ने पूरे कमरे को एक अलग से मुलायम और रोमानी रंग में रंग दिया था। ….पता नहीं ये क्या था पर शायद क्रिस्टियन के लिए रोमांटिक होने का मतलब यही था।

मैं मुड़ी तो वह मुझे ही घूर रहा था पर चेहरे के भाव पढ़े नहीं जा सकते थे। मैं कमरे में आगे बढ़ी तो वह भी पीछे आ गया। पंखनुमा चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा। मैंने सकुचाते हुए उसे हाथ से छुआ। ये तो एक लच्छेदार चीज थी जिसके छोरों पर प्लास्टिक के मनके लगे थे।

“इसे फ लॉगर कहते हैं।” क्रिस्टियन ने बताया।

फ लॉगर, हम्म …. मुझे लगा कि मैं सदमे में हूं। मेरे भीतर बैठी लड़की शायद कहीं मुंह छिपाए बैठी थी या मर गई थी। मैं सुन्न पड़ गई हूं। मैं ये सब देखकर समझ सकती हूं पर इसके बारे में बात करने लायक हालत नहीं है क्योंकि मैं सदमे में हूं। आपका होने वाला प्रेमी अगर परपीड़क या परपीड़ित-कामुक निकले तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? डर..जी हां …इस समय तो मुझे डर ही लग रहा है। वैसे ये डर उससे नहीं है क्योंकि मैं जानती हूं कि वह मुझे चोट नहीं पहुंचाएगा, कम से कम मेरी मर्जी के बिना तो नहीं… दिमाग में हजारों सवाल चक्कर काट रहे हैं। क्यों? कैसे? कब? कितनी बार? कौन? मैं पलंग के पास गई और उस पर अपना हाथ फिराने लगी। उसकी कलाकारी लाजवाब है।

“कुछ तो कहो।” क्रिस्टियन ने मुलायम स्वर में हुक्म दिया।

“क्या तुम लोगों के साथ ये सब करते हो या वे तुम्हारे साथ करते हैं?”

उसका मुंह हल्का सा तिरछा हो आया। मानो उसे थोड़ी राहत मिल गई हो।

“लोग?” उसने जवाब देने से पहले दो बार पलकें झपकाईं।

“मैं उन औरतों के साथ ये सब करता हूं, जो चाहती हैं कि मैं ऐसा करूं।”

“मैं समझी नहीं।”

“अगर तुम्हें अपनी मर्जी से सेवा देने वाले मौजूद हैं तो मैं यहां क्या कर रही हूं?”

“क्योंकि मैं तुम्हारे साथ ये सब करना चाहता हूं। बहुत ज्यादा करना चाहता हूं।”

“ओह!’’ मैंने आह भरी।” क्यों?”

मैं कमरे के दूसरे कोने में चली गई और गद्देवाले बैंच के चमड़े को हाथों से सहलाने लगी। उसे औरतों को सताना अच्छा लगता है। इस सोच ने मेरा दिल तोड़कर रख दिया।

“तुम एक सैडिस्ट हो, जो दूसरों को पीड़ा देकर सुख पाता है?”

‘‘मैं एक डोमीनेंट हूं यानी मालिक!” उसकी आंखें मुझे गहराई तक भेद रही थीं।

“वह क्या होता है?” मैंने धीरे से पूछा।

इसका मतलब है कि मैं चाहता हूं कि तुम अपने-आप को पूरी तरह से मुझे सौंप दो और मैं तुम्हारे साथ जो जी में आए, कर सकता हूं। तुम्हें अपना सेक्स गुलाम बना सकता हूं।”

मैंने इस बात को पचाने की कोशिश करते हुए, उसे देखकर त्यौरियां चढ़ाई।

“मैं ऐसा क्यों करूंगी?”

“मुझे खुशी देने के लिए।” वह अपना सिर एक ओर झुकाते हुए फुसफुसाया।

उसे खुश करना! वह चाहता है कि मैं उसे खुश कर दूं। ऐसा लगा कि मेरा मुंह खुला का खुला रह गया हो। प्लीज क्रिस्टियन ग्रे!! उस एक पल में मुझे एहसास हुआ कि सच मैं यही तो करना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि वह मुझसे खुशी पाए। ये तो एक राज सामने आ गया।

“सादे शब्दों में, मैं चाहता हूं कि तुम मुझे खुश करो।” उसके सुर में सम्मोहन था।

मैं ऐसा कैसे कर सकती हूं। मेरा मुंह सूख गया। काश! मैंने थोड़ी और वाइन ले ली होती। ओ. के.! खुश करने वाली बात तो समझ में आती है पर मैं उसके एलिजाबेथ के जमाने के पीड़ादायी सेटअप को लेकर उलझन में थी। क्या मैं जवाब जानना चाहती हूं?

“मेरे पास अपने नियम हैं और मैं चाहता हूं कि तुम उनके हिसाब से चलो। वे तुम्हारे फायदे और मेरी खुशी के लिए हैं। यदि तुम मेेरे लिए इन नियमों को मानोगी तो मैं तुम्हें इनाम दूंगा और अगर नहीं मानोगी तो सजा दूंगा और फिर तुम सीख जाओगी।” वह फुसफुसाया। मैंने कोने में पड़ी छड़ियों के ढेर पर नजर मारी।

“और ये सब चीजें कहां फिट होंगी?” मैंने कमरे की ओर इशारा किया।

“तुम मुझ पर अपनी मर्जी थोपोगे, मनमानी करोगे?”

“ये सब तुम्हारा भरोसा और विश्वास जीतने पर निर्भर करता है। तुम खुद मुझे ये सब करने की इजाजत दोगी। मैं तुम्हारे इस बर्ताव से खुश होकर आनंद पाऊंगा। तुम जितना हुक्म मानोगी, मेरी खुशी उतनी ज्यादा होगी। बात तो बिल्कुल साफ है।”

“अच्छा! इस खेल में मुझे क्या मिलेगा?”

उसने कंधे झटके और तकरीबन माफी मांगने के लिहाज में बोला

“मैं मिलूंगा।”

ओह..

क्रिस्टियन ने मुझे देखते हुए बालों में हाथ फिराया।

“एनेस्टेसिया! ये सब तुम्हारी अपनी मर्जी से होगा। चलो नीचे चलते हैं। यहां तुम्हें इस कमरे में पा कर मैं पूरी तरह से बात पर ध्यान नहीं दे पा रहा। तुम मुझे बहका रही हो।” उसने मेरा हाथ थामा और इस बार मुझे उसका हाथ थामने में सकुचाहट सी महसूस हुई।

केट ने कहा था कि ये आदमी खतरनाक था; वह सही कह रही थी। उसने कैसे जाना? वह मेरी सेहत के लिए खतरनाक है क्योंकि मैं जानती हूं कि मैं हां कहने जा रही हूं। और मेरा एक हिस्सा ‘हां’ नहीं कहना चाहता। मेरा वह हिस्सा चाहता है कि इस माहौल और कमरे से चिल्लाते हुए दूर भाग जाऊं। ये जगह मेरे लिए नहीं है।

“एनेस्टेसिया! मैं तुम्हें चोट नहीं पहुंचाने जा रहा।” मैं जानती हूं कि वह सच बोलता है। मैंने उसका हाथ थामा और वह मुझे दरवाजे से बाहर ले गया।

“अगर तुम ऐसा करती हो तो मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं।ं” वह नीचे जाने की बजाए प्लेरूम से दाईं ओर चल दिया और वहां से हम एक बरामदे में जा पहुंचे। हम कई दरवाजे पार करने के बाद एक कोने में पहुंचे। उसके परे एक शयनकक्ष था। वहां एक बड़ा सा पलंग था, बिल्कुल सफेद, सब कुछ सफेद था-फर्नीचर, दीवारें और चादरें। कमरा बिल्कुल ठंडा सा एहसास दे रहा था पर कांच की दीवार से सिएटल का दिखता नजारा खूबसूरत लगा।

“ये तुम्हारा कमरा होगा। तुम इसे जैसे चाहे सजा सकती हो, जो जी चाहे मंगा सकती हो।”

“मेरा कमरा? क्या तुम्हें लगता है कि मैं यहां आकर रहने लगूंगी?” मैं अपनी आवाज में छिपे डर को छिपा नहीं सकी।

“नहीं, हमेशा के लिए नहीं। बस शुक्रवार शाम से इतवार तक। हम इस बारे में सब कुछ तय कर लेंगे। अगर तुम यह करना चाहोगी तो।” उसने खुलासा किया।

“मैं यहां सोऊंगा?”

“हां “

“तुम्हारे साथ नहीं?”

“नहीं, मैंने कहा था न कि मैं किसी के साथ नहीं सोता। हां, उस दिन की बात और थी जब तुम पी कर नशे में अॄाुत्त हो गई थीं।” उसकी आवाज में फटकार थी।

मेरे चेहरे पर एक गंभीर सी रेखा खिंच गई। मैं यही नहीं समझ पा रही। दयालु, देखरेख करने वाला क्रिस्टियन, जो मेरे एक फोन पर मुझे लेने आ गया, उल्टियों के दौरान मुझे थामे खड़ा रहा और कहां ये एक राक्षस जो एक खास कमरे में कोड़े और जंजीरें रखे बैठा है।

“तुम कहां सोते हो?”

“मेरा कमरा नीचे है। आओ! तुम्हें भूख लगी होगी।”

“अजीब-सी बात है। मेरी तो भूख ही मारी गई है।” मैं हौले से बोली।

“एनेस्टेसिया! तुम्हें खाना चाहिए।” उसने डांटा और मेरा हाथ थाम कर नीचे ले गया।

उस बड़े से कमरे में मैं अजीब से एहसास से घिरी खड़ी थी। ऐसा लग रहा था कि मैं किसी खाई के मुहाने पर खड़ी हूं और मुझे तय करना है कि छलांग लगाऊं या नहीं?

“मैं अच्छी तरह जानता हूं कि एनेस्टेसिया, मैं तुम्हें एक अंधेरे रास्ते की ओर धकेल रहा हूं, तभी मैं चाहता हूं कि तुम पहले इस पर अच्छी तरह से विचार कर लो। तुम्हारे पास भी तो कुछ सवाल होंगे।” उसने मेरा हाथ छोड़ा और रसोई की ओर चल दिया।

“मेरे पास सवाल हैं पर शुरूआत कहां से करूं?”

“तुमने उस एनडीए पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, तुम जो दिल में आए, पूछ सकती हो।” मैं सारे सवालों का जवाब दूंगा।

उसने फ्रिज खोल कर एक प्लेट निकाली, जिसमें कई तरह के चीज़ थे। साथ ही लाल व हरे अंगूर के दो बड़े गुच्छे भी थे। मैं वहीं पास खड़ी सब देखती रही। उसने मेज पर सारा सामान रखा और खाने की तैयारी करने लगा।

“बैठो!” उसने नाश्ते की मेज के पास पड़े एक स्टूल की ओर संकेत किया और मैंने उसका हुक्म माना। अगर मैं उसके कहे पर चलने जा रही हूं तो मुझे ऐसे बर्ताव की आदत डालनी होगी। मुझे एहसास हुआ कि मैं उससे जब से मिली हूं, वह पहले दिन से ही तानाशाही रवैया रखता आया है।

“तुम किसी कागजी कारवाई की बात कर रहे थे?”

“हां?”

“कैसे कागज?”

“एनडीए के अलावा हमें एक अनुबंध पर भी हस्ताक्षर करने होंगे कि हम क्या करेंगे और क्या नहीं करेंगे। मुझे तुम्हारी सीमाएं जाननी हैं और तुम्हें मेरी जाननी होंगी। एनेस्टेसिया! ये आपसी रजामंदी पर होगा।”

“और अगर मैं ऐसा नहीं करना चाहती?”

“तो ठीक है।” उसने सावधानी से कहा।

“क्या हम किसी दूसरी तरह का रिश्ता नहीं रख सकते?” मैंने पूछा।

“नहीं “

“क्यों?”

“मैं इसी तरह के रिश्ते में दिलचस्पी रखता हूं।”

“क्यों?”

उसने कंधे झटके।” मैं ऐसा ही हूं।”

“तुम ऐसे कैसे बन गए?”

“कोई जैसा है, वैसा क्यों होता है? इसका जवाब देना आसान नहीं होता। ऐसा क्यों है कि कुछ लोग पनीर पसंद करते हैं और कुछ उससे नफरत करते हैं? क्या तुम्हें चीज़ पसंद है? मिसेज जोंस-मेरा घर संभालने वाली महिला कर्मचारी हैं-वे रात के खाने के लिए यही छोड़ गई हैं।” उसने दराज से बड़ी सफेद प्लेटें निकालीं और मेरे सामने रख दीं।

हम चीज़ के बारे में बात कर रहे थे, हे भगवान!

“मुझे तुम्हारे कौन से नियमों के हिसाब से चलना होगा?”

“मैंने उन्हें लिख रखा है। खाना खाने के बाद हम उन्हें देखेंगे।”

खाना! में अब खा कैसे सकती हु?

“मुझे सचमुच भूख नहीं है।”

“तुम खाओगी।” तानाशाह और हुक्मदराज़ क्रिस्टियन, साफ दिख रहा है। क्या तुम एक गिलास वाइन और लेना चाहोगी?” हां, प्लीज।” उसने मेेरे गिलास में वाइन डाली और मेरे साथ आकर बैठ गया। मैंने जल्दी से एक घूंट भरा।

“एनेस्टेसिया! साथ ही कुछ खाओ भी “

मैंने अंगूरों का छोटा सा गुच्छा उठा लिया। मैं यही खा सकती हूं। उसने आंखें सिकोड़ीं।

“क्या तुम काफी समय से ऐसे ही हो?” मैंने पूछा।

“हां “

“क्या ऐसी औरतें मिल जाती हैं तो तुम्हें ऐसा करने की इजाजत दें?”

उसने एक भौं उठाई।

“जानोगी तो हैरान रह जाओगी।” उसने जवाब दिया

“तो मैं ही क्यों?” मैं सचमुच समझ नहीं पा रही

“एनेस्टेसिया! मैंने तुमसे कहा न कि तुममें कुछ खास बात है। मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकता। मानो मैं शमा का परवाना हूं।”

उसकी आवाज जाने कौन से अंधेरों से आ रही थी- “मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं। खासतौर पर अब, जब तुम फिर से अपना होंठ काट रही हो।” उसने गहरी सांस ली और थूक निगला।

मेरे पेट में भारी उथल-पुथल होने लगी। वह मुझे चाहता है, पर बिल्कुल ही अलग तरह से। पर ये भी तो सच है कि ये खूबसूरत, अजीब और सनकी मर्द मुझे चाहता है।

“ऐसा लगता है कि तुम सही तरह से समझ नहीं पाए।” दरअसल तुम शमा हो और मैं परवाना हूं। मैं जानती हूं कि आखिर में जलना तो मुझे ही होगा।

“खाओ!!”

“नहीं, मैंने अभी तक किसी भी कागज पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं इसलिए अभी मेरी मर्जी चल सकती है, अगर तुम्हें कोई ऐतराज न हो तो?”

उसकी आंखें मुलायम हो आईं और चेहरे पर एक मुस्कान खेल गई।

“जैसा तुम चाहो!” मिस स्टील।

“अब तक कितनी औरतें?” मैं अपना कौतूहल रोक नहीं सकी और पूछ ही लिया।

“पंद्रह।”

ओह! उतनी नहीं, जितनी मैंने सोची थी।

“लंबे-लंबे समय के लिए?”

“हां, उनमें से कुछ “

“क्या तुमने कभी किसी को चोट पहुंचाई?”

“हां “

ओह..

“बुरी तरह से?”

“नहीं “

“क्या तुम मुझे भी चोट पहुंचाओगे?”

“कहना क्या चाहती हो?”

“क्या तुम मुझे शारीरिक रूप से चोट पहुंचाओगे?”

“मैं तुम्हें सजा दूंगा, जब तुम्हें इसकी जरूरत होगी और ये दर्दनाक होगी।”

मुझे लगा कि मैं अपने होश खो रही हूं। मैंने शराब का एक और घूंट भरा। अल्कोहल..इससे मुझे ताकत मिलेगी।

“क्या तुम्हें भी कभी किसी ने पीटा है?” मैंने पूछा।

“हां “

ओह… मैं तो हैरान ही रह गई। इससे पहले कि मैं इस बारे में कुछ और पूछ पाती। उसने मेरे विचारों की शृंखला तोड़ दी।

“चलो, मेरी स्टडी में चलकर इस बारे में बात करते हैं। मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं।”

ये सब संभालना भारी लग रहा था। कहां तो मैं पागलों की तरह सोचे बैठी थी कि इस आदमी के साथ इसके बिस्तर में एक जुनून से भरी रात बिता कर आऊंगी और कहां हम दोनों बैठे इस अजीब से अनुबंध की चर्चा कर रहे थे।

मैं उसके पीछे-पीछे स्टडी में गई। उस बड़े से कमरे में भी जमीन से छत तक लंबी खिड़की थी जो बालकनी में खुलती थी। वह डेस्क पर बैठ गया और मुझे भी वहां पड़ी चमड़े की कुर्सी पर बैठने का संकेत किया। फिर मेरे हाथों में एक कागज पकड़ा दिया।

“ये नियम हैं। इनमें बदलाव हो सकता है। यही उस अनुबंध का हिस्सा हैं, इन्हें तुम अपने लिए रख सकती हो। इन नियमों को पढ़ो और हम इस बारे में चर्चा कर लें।”

नियम

आज्ञाकारिता:

सेक्स गुलाम को बिना किसी हिचक या संकोच के अपने मालिक का हुक्म मानना होगा। सेक्स गुलाम मालिक के आनंद के लिए तय की गई किसी भी तरह की काम संबंधी गतिविधियों के लिए हामी देगी। यहां वे गतिविधियां अपवाद हैं, जो परिशिष्ट 2 में कठोर सीमाओं के रूप में वर्णित हैं। वह पूरी खुशी और उत्साह से मालिक का कहा मानेगी।

नींद

सेक्स गुलाम जब अपने मालिक के साथ नहीं होगी तो वह ध्यान रखेगी कि उसे रात को कम से कम सात घंटे की भरपूर नींद मिले।

भोजन:

सेक्स गुलाम चुनी गई भोजन सूची(परिशिष्ट 4) से नियमित रूप से भोजन करेगी ताकि उसकी सेहत व ताकत बनी रहे। वह दो समय के भोजन के दौरान फलों के अतिरिक्त कुछ नहीं खाएगी।

वस्त्र:

सत्र के दौरान वह मालिक द्वारा दिए गए कपड़े ही पहनेगी। मालिक उसके लिए कपड़ों का बजट तय करेगा, जिसे वह प्रयोग में लाएगी। मालिक कभी-कभी उसे अपने साथ कपड़े खरीदवाने भी ले जा सकता है। यदि मालिक चाहेगा तो उसे उसके साथ के दौरान आभूषण भी पहनने होंगे।

कसरत:

मालिक अपनी सेक्स गुलाम को सप्ताह में चार बार निजी प्रशिक्षक की सुविधा प्रदान करेगा। ये सत्र एक-एक घंटे के होंगे तथा ये समय आपसी रजामंदी से तय किया जा सकते हैं। निजी प्रशिक्षक सेक्स गुलाम की प्रगति के बारे में मालिक को सूचित करेगा।

व्यक्तिगत साफ़-सफ़ाई व सौंदर्य

सेक्स गुलाम खुद को साफ-सुथरा रखेगी और हमेशा शरीर के अंगों को वैक्सिंग या शेव करवाती रहेगी। वह मालिक की मर्जी से उसके द्वारा चुने गए ब्यूटी सैलून में जाएगी और मालिक जो भी उपचार करवाना चाहे, उन्हें बेहिचक करवाएगी।

व्यक्तिगत सुरक्षा:

सेक्स गुलाम आवश्यकता से अधिक शराब व धूम्रपान का सेवन नहीं करेगी और नशे की दवाएं नहीं लेगी। खुद को किसी भी तरह के अनावश्यक खतरे से दूर रखेगी।

व्यक्तिगत विशेषताएं:

सेक्स गुलाम अपने मालिक के सिवा किसी भी दूसरे व्यक्ति से शारीरिक संबंध नहीं रखेगी। वह सदैव मालिक से आदर से पेश आएगी। उसे एहसास होना चाहिए कि उसके इस बर्ताव का मालिक पर सीधा असर होगा। उसे मालिक की अनुपस्थिति में किसी भी तरह के गलत काम या बर्ताव के लिए दोषी ठहराया जाएगा।

यदि इनमें से कोई भी नियम तोड़ा गया तो मालिक के द्वारा तत्काल सजा दी जाएगी जो वह स्वयं तय करेगा।

हाए… ये क्या है? …कठोर सीमाएं? मैंने पूछा।

“हां, तुम क्या नहीं करोगी और मैं क्या नहीं करूंगा, हमें अनुबंध में ही सब तय कर लेना होगा।”

“मैं कपड़ों के लिए पैसे नहीं ले सकती। ये गलत लगता है।” मैंने बड़ी असहजता से कहा

“मैं तुम पर पैसे खर्च करना चाहता हूं। मुझे तुम्हारे लिए कुछ कपड़े खरीदने दो। हो सकता है कि तुम कुछ कार्यक्रमों में मेरे साथ चलो और मैं चाहूंगा कि तुम वहां बेहतरीन कपड़ों में दिखो। मुझे पक्का यकीन है कि तुम अपनी नौकरी के वेतन से वैसे कपड़े नहीं खरीद पाओगी, जिनमें मैं तुम्हें देखना चाहता हूं।”

“जब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूंगी, तब तो उन्हें नहीं पहनना होगा न?”

“नहीं।”

“ठीक है।” चल, उन्हें वर्दी समझ के पहन लेना।

“मैं सप्ताह में चार बार कसरत नहीं करना चाहती।”

“एनेस्टेसिया! मैं चाहता हूं कि तुम्हारे शरीर की लोच और ताकत बनी रहे। भरोसा रखो, तुम्हें व्यायाम की आवश्यकता है।”

“पर सप्ताह में चार बार नहीं? तीन बार कैसा रहेगा?”

“मैं चाहता हूं कि तुम चार बार कसरत करो।”

“मैंने सोचा कि मिल-जुल कर तय होगा।”

उसने होंठ सिकोड़े- “अच्छा। मिस स्टील! एक और बात दिमाग में आई। तीन दिन तक एक-एक घंटा और चौथे दिन के लिए आधा घंटा।”

“तीन दिन, तीन घंटे। मैंने सोचा था कि जब मैं यहां रहूंगी, तभी कसरत करनी होगी।”

उसकी आंखों में दुष्टता भरी चमक आ गई।” हां! तो पक्का। क्या ये भी तय है कि तुम मेरी कंपनी में काम नहीं करना चाहती?”

“नहीं! मुझे ये बात पसंद नहीं है।” मैंने उसके नियमों पर नजर मारी। वैक्सिंग! कहां की वैक्सिंग। सब जगह…उफ्फ!

“तो सीमाएं… ये मेरी हैं।” उसने एक और कागज आगे कर दिया।

कठोर सीमाएं

आग से जुड़ा कोई काम नहीं होगा।

मल या मूत्र विसर्जन या उससे जुड़े उत्पाद शामिल नहीं होंगे।

सुईयों, चाकू, त्वचा को छेदने या खून निकालने जैसे कोई काम नहीं होंगे।

ऐसे काम नहीं होंगे जिनमें महिला रोग संबंधी उपकरणों का प्रयोग किया जाए।

ऐसे काम नहीं होंगे जिनमें बच्चे या जानवर शामिल हों।

ऐसे काम नहीं होंगे जिनसे त्वचा पर कोई स्थायी दाग या निशान पड़ जाए।

ऐसी कोई गतिविधियां शामिल नहीं होगी जिसमें बिजली का झटका दिया जाए या शरीर को आग व लपटों से जलाया जाए।

हाए! इसको… ये सब लिखने की क्या पड़ी थी। बेशक कोई भी अक्लमंद इंसान कभी किसी दूसरे इंसान के साथ ऐसा नहीं करेगा…हालांकि अब तो मेरा हलक सूख रहा था।

“क्या तुम इनमें कुछ शामिल करना चाहोगी?” उसने बड़ी दयालुता से पूछा

हो गया कबाड़ा! मुझे तो कुछ पता ही नहीं है। मैं तो पूरी तरह हत्थे से गई। उसने मुझे घूरा और भौं नचाईं।

“क्या तुम इसमें कुछ शामिल करना चाहोगी? कुछ ऐसा जो तुम न करना चाहो?”

“मैं नहीं जानती।”

“मतलब नहीं समझा?”

मैंने बेचैनी से पहलू बदलते हुए होंठ काटा।

“मैंने आज तक ऐसा कुछ किया ही नहीं।”

“मैं पूछ रहा हूं कि शारीरिक संबंध बनाते समय ऐसा क्या था, जो तुम्हें पसंद नहीं आया था?”

मेरे चेहरे पर अचानक लाली छा गई।

“एनेस्टेसिया तुम मुझे बता सकती हो। हमें एक-दूसरे के साथ ईमानदारी बरतनी होगी वरना ये रिश्ता कारगर नहीं होगा।”

मैंने अपनी गुंथी हुई अंगुलियों को देखा।

“बताओ।” उसने हुक्म दागा।

“मैंने…मैंने आज से पहले कभी किसी से शारीरिक संबंध नहीं बनाए इसलिए मैं नहीं जानती।” मैंने कहा और उसके चेहरे को देखा। वह पूरी तरह से पीला पड़ गया था। मानो वहीं जम गया हो।

“कभी भी नहीं?” वह हौले से बोला। मैंने गर्दन इंकार में हिलाई।

“तुम एक कुंआरी हो?” उसने गहरी सांस भरी। मैंने फिर से लजाते हुए हामी भरी। उसने आंखें बंद कर लीं और ऐसा लगा मानो मन ही मन एक से दस तक गिन रहा हो। जब उसने आंखें खोलीं तो वह मुझे गुस्से से ताक रहा था।

“तुमने मुझे पहले बताया क्यों नहीं?” वह दहाड़ा।