पूर्व- पूर्व की दिशा को विजय द्वार बताया गया है। पूर्व दिशा में बनाया हुआ कूप या बोरिंग गृह स्वामी को ऐश्वर्य, वंशवृद्धि, सदाचारी, क्षमाशील, गुणवान, बलवान, धनवान इत्यादि गुणों को दान करने वाला होता है। उसके व्यापारिक कार्य, व्यक्तिगत क्षमताएं अत्यधिक होती है और हर काम में विजय प्राप्त करते हैं, ऐसा विद्वानों का मत है।
पूर्वी अग्नि कोण, एवं दक्षिणी अग्नि कोण- जाने-अनजाने में जब यहां पर कुंआ या बोरिंग बन जाता है तो भवन में रहने वाले परिवार को भूमिजनित विकार का सामना करना पड़ता है। शत्रुओं की बढ़ोतरी होती है, शत्रु भय बना रहता है। पति-पत्नी के दाम्पत्य जीवन में मधुरता नहीं रहती। व्यापार में हानि, विपत्ति का आगमन, पूर्वजों के द्वारा किया हुआ संचित धन का नाश, नेत्र रोग, इत्यादि दोषों का शास्त्रों में वर्णन किया गया है।
दक्षिण- दक्षिण के मध्य की दिशा को यम की दिशा कहा गया है। अज्ञानतावश वहां पर द्वार बन जाता है। उसको यम का द्वार कहते हैं। बोरिंग, कुंआ या अंडरग्राउण्ड टैंक यहां बनाना त्याज्य है। अगर यहां बना हुआ है तो उसके परिणाम बड़े दुखद होते हैं। उदाहरण के तौर पर-गृहस्वामी को राज रोग, अकस्मात् देह का त्याग करना, अल्पायु होना, अभिमानी होना, हिंसक होना, अपयश को प्राप्त करना इत्यादि अनिष्टकारक कई दोष पाए जाते हैं। दक्षिणी नैॠत्य एवं पश्चिमी नैॠत्य का भी मिला-जुला उपरोक्त फल मिलता है। नैॠत्य कोण में अंग दोष, असफलता, गर्भधारण नहीं होना या गर्भपात होना उपरोक्त बातों के साथ भी शामिल हो जाते हैं।
पश्चिम- कुछ प्राचीन शास्त्रों में इस दिशा को लेकर काफी मतान्तर चले आ रहे हैं। विद्वानों के मत में पश्चिम के मध्य में कुंआ खोदना सही बताया गया है। वास्तु के मुख्य नियम में पश्चिम के मध्य में खड्डा नहीं होना चाहिए। वायव्य कोण में कूप बनाने से काफी नयी-नयी विपत्तियां हवा की तरह आती हैं। कफ, श्वास, रक्त संबंधी विकार, पति-पत्नी के बीच में विवाद, चरित्र का पतन, पत्नी का गृह त्याग करके निकल जाना इत्यादि होने की संभावना बन जाती है। पश्चिमी वायव्य, उत्तरी वायव्य का यही मिला-जुला असर होता है।
उत्तर- उत्तर दिशा को कुबेर का स्थान कहा गया है। कुबेर सुख-समृद्धि, लक्ष्मी देने में सहायक हैं। उत्तर के मध्य से उत्तरी ईशान पर भूमिगत पानी का होना हर सुख सुविधा प्रदान करने में सहायक है। पूर्व की भूमि का जल का भाव भी इसमें शामिल हो जाता है। ईशान कोण में कभी भी कुंआ या बोरिंग नही कराना चाहिए। क्यों नहीं कराना चाहिए, इसका मुख्य कारण है पुरुष के सिर का छेदन-भेदन हो जाना। लक्ष्मी का आवागमन तो होता है मगर मस्तिष्क विहिन पुरुष सुख के लिए पैसे कमा सकता है सुख नहीं ला सकता है। कहते हैं ईशान में जल होना चाहिए। परन्तु पूर्वी ईशान और उत्तरी ईशान में बनाना उचित है ईशान कोण में नहीं।
भूखण्ड के मध्य (ब्रह्म स्थान) में जल का होना हर तरह की विपत्ति, परेशनियां, नुकसान, मृत्यु तुल्य भय, राजरोग इत्यादि कई व्याधियां देने में समर्थ है।
नाली को ढककर रखें। भवन का जल बहाव ईशान, उत्तर पश्चिम, कोण या वायव्य से घर के बाहर जाए तो अच्छा है।
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