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'अमृत स्नान' का महत्व सबसे ज्यादा है। 14 जनवरी मकर संक्रांति के दिन पहले अमृत स्नान का आयोजन हो चुका है। अब दूसरा अमृत स्नान 29 जनवरी को आयोजित होने जा रहा है। इस दिन लाखों करोड़ों तीर्थयात्री पवित्र गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम में आस्था की डुबकी लगाएंगे।
Shahi Snan Importance: प्रयागराज की पावन धरती पर सदी के सबसे महत्वपूर्ण आयोजनों में से एक महाकुंभ 2025 की शुरुआत हो चुकी है। 13 जनवरी से 26 फरवरी 2025 तक चलने वाले इस 45 दिन के महा आयोजन का हर एक दिन खास है। फिर भी शाही स्नान, जिसे अब ‘अमृत स्नान’ कहा जाता है का महत्व सबसे ज्यादा है। 14 जनवरी मकर संक्रांति के दिन पहले अमृत स्नान का आयोजन हो चुका है। अब दूसरा अमृत स्नान 29 जनवरी को आयोजित होने जा रहा है। इस दिन लाखों करोड़ों तीर्थयात्री पवित्र गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम में आस्था की डुबकी लगाएंगे। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों है शाही स्नान इतना महत्वपूर्ण।
इसलिए कहा जाता है शाही स्नान

‘शाही स्नान’ का उल्लेख महाकुंभ मेले में कुछ विशेष तिथियों पर किए गए पवित्र स्नान से जुड़ा हुआ है। यह शब्द सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके पीछे कई तरह की मान्यताएं और इतिहास छिपे हुए हैं। कई विद्वान मानते हैं कि शाही स्नान की परंपरा नागा साधुओं से जुड़ी हुई है। महाकुंभ के दौरान जब विशेष ग्रहों की स्थिति बनती है, तब नागा साधु सबसे पहले गंगा स्नान के लिए आते हैं। वे हाथी, घोड़े और रथों पर सवार होकर आते हैं। ये सभी उनके धार्मिक महत्व और निष्ठा का प्रतीक होते हैं। इन साधुओं के तेज और लाव-लश्कर को देखकर महाकुंभ के इस विशेष स्नान को शाही स्नान नाम दिया गया। एक अन्य मान्यता है कि पुराने समय में राजा-महाराज भी साधु-संतों के साथ भव्य जुलूस लेकर महाकुंभ में स्नान करने जाते थे। उनके साथ इस शाही आयोजन की भव्यता को देखकर इस स्नान को शाही स्नान कहा गया। कई लोग यह भी मानते हैं कि महाकुंभ का आयोजन सूर्य, गुरु जैसे राजसी ग्रहों की स्थिति के आधार पर किया जाता है, इसलिए इसे ‘शाही स्नान’ की संज्ञा दी गई।
धार्मिक दृष्टि से है महत्वपूर्ण
धार्मिक दृष्टि से शाही स्नान को अत्यधिक पवित्र माना जाता है। इसे करने से व्यक्ति के पाप धुल जाते हैं, मन की अशुद्धियां समाप्त हो जाती हैं और आध्यात्मिक उत्थान होता है। माना जाता है कि इस दिन देवता गण खुद नदियों में स्नान करते हैं। जिससे इस पवित्र जल में स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है। महाकुंभ के दौरान न केवल स्नान किया जाता है, बल्कि पवित्र मंदिरों के दर्शन और दान-पुण्य भी किए जाते हैं।
ऐसे तय होता है कुंभ का स्थान
कुंभ मेले का आयोजन, तिथियां और स्थान सभी ग्रहों और राशियों की स्थिति पर निर्भर करता है। इस मेले में सूर्य और गुरु ग्रह का विशेष महत्व होता है। कुंभ मेला तब आयोजित होता है, जब सूर्य और गुरु एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं। इसी आधार पर तिथि और स्थान तय होते हैं। जब गुरु यानी बृहस्पति ग्रह वृषण राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य मकर राशि में होता है, तब कुंभ मेला प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर आयोजित होता है। जब सूर्य, मेष राशि और गुरु, कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं तो मेला हरिद्वार में गंगा नदी के किनारे आयोजित होता है। ठीक ऐसे ही जब सूर्य और गुरु दोनों सिंह राशि में प्रवेश करते हैं तो कुंभ मेला नासिक में गोदावरी नदी के किनारे होता है। और जब गुरु ग्रह सिंह राशि और सूर्य, मेष राशि में प्रवेश करते हैं तब कुंभ मेला उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर होता है। गुरु के सिंह राशि में प्रवेश के कारण इसे सिंहस्थ कुंभ भी कहा जाता है। शाही स्नान की तारीख हिंदू पंचांग के अनुसार तय की जाती हैं।
