संभालिये अपने बच्चे को
sambhaliye apne bacche ko

Parenting Advice: अपने बच्चों को शांत बिठाए रखने के लिए जब आप उन्हें फोन पकड़ा देती हैं या फिर टीवी के आगे बिठा देती हैं, तब शायद आपको आने वाले खतरे का आभास तक नहीं होता। जानिए, इसी बारे में-

यूनेस्को के जाने-माने विशेषज्ञ तथा शिक्षाविद आरएच दवे के अनुसार, ‘बच्चे 18 वर्ष की उम्र तक टीवी पर
कम से कम 30 हजार हत्याएं देख चुके होते हैं। फिल्मों के बाद जिस तेजी से दूरदर्शन ने ङ्क्षहसा को आश्रय दिया है, उसके दूरगामी प्रभाव नज़र आने लगे हैं।

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संभवत: आपको याद हो कि भारत में अखंड रामायण पाठ का चलन तो लोकप्रिय है, लेकिन महाभारत जैसे बहु आयामी ग्रंथ का अखंड पाठ वॢजत है। इसके पीछे हमारे मनीषियों की यह धारणा रही होगी कि हिंसात्मक प्रसंगों, कुटिलता, राजनीतिक उखाड़-पछाड़ और द्वेष से युक्त इस ग्रंथ के अखंड पाठ का श्रवण अपरोक्ष रूप से संपूर्ण जन-मानस पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है। उस युग से अगर दूरदर्शन अस्तित्व में होता तो हमारे विचारकों ने दूरदर्शन पर भी इसे दिखाने पर प्रतिबंध लगा दिया होता।
श्रव्य माध्यम से दृश्य माध्यम निश्चिय ही कई गुना प्रभाव अधिक डालता है और आज सर्वाधिक प्रभावशाली दृश्य माध्यम टेलीविजन, जिसकी पहुंच ड्राइंगरूम से लेकर बेडरूम तक है, महाभारत से गई गुना भयावह, क्रूरतम और वीभत्स हिंसात्मक दृश्यों को सुबह से रात तक दिखला रहा है। इन ङ्क्षहसात्मक दृश्यों का, इन क्रूरता प्रधान प्रसंगों का और इन रक्त रंजित कथानक का अपरोक्ष रूप से संपूर्ण जन-मानस पर गहन प्रभाव पड़ रहा है।
आज से बीस वर्ष पूर्व का युग याद कीजिए स्कूल में एक बच्चे की उंगली कट जाती थी तो दस बच्चे दौड़ पड़ते थे और अध्यापक के आने से पहले ही उसकी मरहम पट्टी कर दी जाती थी, लेकिन आज सड़क पर यदि दुर्घटना हो जाए और दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति सहायता के लिए याचना भी करे तो लोग पास से उसे अनदेखा किए निकल जाते हैं। संवेदनशून्यता की यह स्थिति हर आयु वर्ग पर समान रूप से लागू होती है। क्रोध आने पर पहले जहां बात केवल दो-चार घूंसे-थप्पड़ तक सीमित रहती थी, अब सीधे-सीधे जानलेवा आक्रमण तक जा पहुंचती है। आज से बीस वर्ष पूर्व जहां आतंक का पर्याय रामपुरी चाकू था, (वह भी आसानी से नहीं निकलता था) वहीं आज विद्यालयों के हॉस्टल में भी हथियार मिल जाने पर हैरानी नहीं होती।
इस स्थिति का, इस बदलाव का, इस हिंसात्मक प्रवृत्तियों के विकास का सीधा-सीधा संबंध अगर फिल्म और दूरदर्शन से जोड़ा जाए तो गलत न होगा। दरअसल मानव मन की प्रक्रिया ही यही है। पहले वह किसी चीज़ को, चाहे वह प्रेम हो या हिंसा, नकारता है। फिर धीरे-धीरे वह उसकी ओर आकॢषत होता है, फिर वह उससे आनंदित होता है और फिर उसमें लिप्त होने की भावना विकसित होने लगती है। हिंसात्मक एवं क्रूर दृश्यों के साथ भी यही प्रक्रिया काम कर रही है। इसका सब से बड़ा दुष्परिणाम यह सामने नजर आ रहा है कि मन की कोमल भावनाएं धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही हैं। कोमल भावनाओं की अनुभूति से आनंदित होने की प्रवृत्ति नष्ट होती जा रही है। आज का शिशु हिंसात्मक दृश्यों को देखते हुए बड़ा हो रहा है। हत्याओं के जघन्यतम तरीके, मारपीट के क्रूरतम दृश्य, रंगीन स्क्रीन पर बहता ढेर सारा खून, वीभत्स चेहरे, आतंक के साये में पलती जिंदगी, लाशें, यह सब टीवी के रोज के कार्यक्रमों का एक हिस्सा बुन चुका है और यह अचेतन मन पर, विशेषकर शिशुओं के अचेतन मन पर अमिट रेखा के रूप में अंकित होता जा रहा है। आज का 8-10 साल का बच्चा बजाय इन क्रूरतम वीभत्स-हिंसात्मक दृश्यों से सहमने या डरने के, आनंदित होता है, ताली बजाता है, आज का किशोर इन्हीं दृश्यों को जाने-अनजाने अपने वास्तविक जीवन में भी दुहराने की कल्पना करने लगता है। इसी कारण आज समाचार पत्र किशोरों द्वारा मात्र मनोरंजन के लिए एक्साइटमेंट के लिए किए गए अपराधों के समाचारों से भरना शुरू हो चुके हैं। पश्चिमी देशों में तो यह समस्या पहले ही चिंता का विषय बन चुकी है और वहां के दार्शनिक-विचारक बड़ी तेजी से इसके निवारण की दिशा में कदम उठा रहे हैं। भारत में भी इक्कीसवीं सदी के जाते, न जाते यह समस्या गंभीर हो जानी है।
संवेदन शून्यता की ओर बढ़ती हमारी किशोर पीढ़ी जब जीवन के रणक्षेत्र में उतरेगी तो वह कितना कुछ खो चुकी होगी, इसका उसे एहसास भी नहीं होगा। स्नेह, दयालुता, सहायता की भावना, भाव विह्वïलता, मित्रता, मानवता के प्रति आस्था, दूसरे के लिए कुछ भी करने की इच्छा जैसी कोमल भावनाओं का स्थान स्वार्थपरता, अहं, विरोधी को समूल नष्ट कर देने की इच्छा और कुटिलता ले चुकी होगी। सहानुभूति और निष्ठा जैसे शब्द उसके लिए बेमानी हो चुके होंगे। भ्रातत्व और मातृत्व जैसी बातें उसके लिए मूर्खता बन चुकी होगी और इस सबके लिए उत्तरदायी होगा टीवी, फोन और कंप्यूटर का दुरुपयोग।