Madhumita Pandey: फेमिनिज़्म वर्तमान दौर में सबसे अधिक उपयोग में आने वाला शब्द है। वह अलग बात है कि इसका इस्तेमाल कोई मजाक उड़ा कर करता है तो कोई नारियों को सपोर्ट करने के लिए। क्योंकि कुछ नारियों ने इतने झूठे रेप के इल्जाम पुरुषों पर लगाएं है कि लोग रेप और फेमिनिज्म को एक मजाक की तौर पर अधिक लेने लगे हैं। जब कि लोगों को असल में मालूम ही नहीं है कि रेप क्या है और फेमिनिज़्म क्या है? इस पर हम कभी और बात करेंगे। आज की चर्चा इस बात की है कि रेप क्यों होते हैं और पुरुष रेप करते क्यों है? इसी की शोध में लगी मधुमिता पांडे ने अब तक 142 अपराधियों से बात की है या यूं कहें कि उनका इंटरव्यू ले चुकी हैं। उन्होंने रेप की सजा काट रहे अपराधियों से बात करने और उनका इंटरव्यू लेने का काम 22 साल की उम्र में शुरू किया था, जिसे अब 8 साल से अधिक हो गए हैं।
तिहाड़ जेल के अपराधियों से लिए हैं इंटरव्यू
अब तक ये सारे इंटरव्यू इन्होंने तिहाड़ जेल में रेप की सजा काट रहे अपराधियों से लिए हैं। मधुमिता पांडे ब्रिटेन के शेफील्ड हॉलम यूनीवर्सिटी में अपराधशास्त्र की लेक्चरर हैं और ये अपराधियों के मनोविज्ञान के बारे में जानने पर शोध भी करती हैं। इनके शोध को मुख्य अध्ययन यह है कि आखिर में अपराधी क्या सोच कर अपराध करते हैं? अपराध करते वक्त अपराधियों के दिमाग में क्या चलता है ?

निर्भया कांड के बाद से रेपिस्ट की मनोस्थिति को जानने का कर रही प्रयास
रेपिस्ट या फिर रेप के जुर्म में सजा काट रहे अपराधियों से इंटरव्यू करने का सिलसिला निर्भया कांड के बाद से शुरू हुआ। 16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड की चीख पूरी दुनिया में सुनी गई थी जिसकी विभित्सा का विवरण देने से लोग आज भी डर जाते हैं। इसी भयानक कांड की मानसिकता को जानना, मधुमिता पांडे ने अपना डॉक्टरल थीसिस का मकसद बना लिया।
इस विषय को चुनने के बारे में वह बताती हैं कि दिल्ली का निर्भया कांड समूची मानवता को शर्मसार करने वाला था। इसने मुझे भी अंदर से झकझोर दिया था। ऐसे में वह इन अपराधियों के मनोस्थिति को समझना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने इन अपराधियों से बात करने की सोची। तिहाड़ जेल में लगभग डेढ़ सौ बलात्कारियों का इंटरव्यू करने वाली मधुमिता पांडेय बताती हैं कि ऐसे कैदियों से बातचीत के पीछे उनका मकसद डॉक्टरल थीसिस है।
पुरुषवादी मानसिकता है वजह
लगभग डेढ़ सौ बलात्कारियों का इंटरव्यू करने के बाद मधुमिता इस नतीजे पर निकली हैं कि भारतीय पुरुषों में पुरुषवादी सोच थोड़ी अधिक है। उनके साहसिक रिसर्च में यह बात निकलकर आई है कि ऐसी घटनाओं के पीछे की वजह भारतीय समाज में पुरुषवादी मानसिकता है।
इस रिसर्च के बारे में पूछने पर वह बताती हैं कि निर्भया कांड की विभत्सता को जानकर वह अंदर से हिल गई थीं। वह रेप करने वाले उन पुरुषों से मिलकर देखना व जानना चाहती थीं कि उनकी सोच ऐसी कैसी होती है और वे रेप करने के दौरान क्या सोच रहे होते हैं? पांच-छह के सामूहिक रेप की घटनाओं में किसके मन में सबसे पहले रेप जैसे घिनौने अपराध को अंजाम देने की भावना आती है और जब यह दूसरों को बताता है तो उसके अन्य साथी उसे रोकने के बजाय उसका साथ क्यों देते हैं? जबकि माना जाता है कि समाज में अच्छाई तो केवल लोग एक-दूसरे को देखकर ही करते हैं। ऐसे में सामूहिक रेप क्यों होते हैं और उस समूह में ऐसा कोई एक भी इंसान क्यों नहीं होता है जो इसे गलत कहकर रोक सके? इसके अलावा वे किसी भी महिला को अपना शिकार बनाकर, बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते वक्त उनके दिमाग में क्या चल रहा होता है? क्या ये आम इंसानों से अलग होते हैं और इनकी इनकी प्रवृति कैसी होती है?

22 साल की उम्र में शुरू किया यह इंटरव्यू कार्यक्रम
निर्भया कांड के बाद मधुमिता ने भारत सरकार से तिहाड़ जेल के अपराधियों पर करने वाली रिसर्च के लिए अप्लाई किया। मंजूरी मिलने के बाद वे जब भारत आकर पहली बार बलात्कारियों के साक्षात्कार लेने के लिए दिल्ली के तिहाड़ जेल में पहुंची तब उनकी उम्र केवल 22 साल थी। उस समय वह यूनाइटेड किंगडम की एंजला रस्किन यूनिवर्सिटी से क्रिमिनोलॉजी की पढ़ाई कर रही थीं। उसी दौरान वर्ष 2012 में दुनिया को दहला देने वाली दिल्ली में वह निर्भया कांड हुआ था। जिसके बाद ब्रिटेन में बैठी मधुमिता तक अंदर से कांप गई थी और उन्होंने इस पर रिसर्च करने की ठानी। इस रिसर्च के लिए अपराधियों से मिलना जरूरी था।
रेप के आरोपियों की मानसिकता पर रिसर्च करने का पायलट प्रोजेक्ट रिसर्च इंटरव्यू 2013 में शुरू हुआ।
वह जानना चाहती थीं कि आखिर ये वहशी किस्म के लोग कैसे आसानी से एक पल में किसी भी महिला की ज़िंदगी बर्बाद कर देते हैं? वह तिहाड़ जेल में ऐसे कैदियों के साथ करीब एक सप्ताह रहीं।
कुछ ने जताया अफसोस
इस रिसर्च के दौरान मधुमिता कई अलग-अलग तरह के अपराधियों से मिलीं जिनमें से कुछ को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था तो कुछ अफसोस जताते थे। मधुमिता कहती हैं, वह एक 49 साल के कैदी से मिलीं जो एक पांच वर्ष की लड़की के रेप की सजा काट रहा था। उसे अपने किए पर पछतावा था और वह कहता है कि ‘हां मैं बुरा महसूस करता हूं। मैंने उसका जीवन बर्बाद कर दिया। अब वो तो बड़ी हो गई होगी, कोई भी उससे शादी नहीं करेगा लेकिन मैं उसे स्वीकार करूंगा। जब मैं जेल से बाहर आऊंगा, तब मैं उससे शादी करूंगा।’
उस 49 साल के अपराधी की इस सोच ने मधुमिता को अंदर से और अधिक हिला दिया। क्योंकि उसके इस कथन का अर्थ था कि महिलाओं के लिए उसके जिस्म के अलावा और कोई वज़ूद नहीं और जिस्म से जुड़ी इज्जत ही सबकुछ होती है। ऐसे में मधुमिता के मन में उस लड़की से मिलकर उस लड़की के और उसके घरवालों के विचारों को जानना चाहा। उस अपराधी ने इंटरव्यू में उस लड़की के घर के पते का विवरण बताया था।
घरवालों को अपराधी के गिरफ्तारी की कोई जानकारी नहीं थी
जब मधुमिता उस लड़की के घर पहुंची तो वहां उन्हें और भी अधिक हैरानी हुई। क्योंकि लड़की के घरवालों को उस अपराधी के गिरफ्तारी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मधुमिता बताती हैं कि वह भी नई दिल्ली में पली-बढ़ी हैं। लेकिन इससे पहले उन्हें दिल्ली कभी इतनी निर्दयी नहीं लगी। निर्भया कांड के बाद से उनको दिल्ली का चेहरा अलग सा, हिंसक, क्रूर, अमानवीय नजर आने लगा। उन्होंने सोचा कि मन में घुमड़ते सवालों से वह क्यों न सीधे मुठभेड़ करें। वह क्यों न अपने सवाल सीधे रेप के आरोपियों से ही पूछें।

बहुत से अपराधियों को मालूम ही नहीं रेप क्या है
इन इंटरव्यू को करने के दौरान मधुमिता को अलग-अलग तरह के अनुभवों से गुजरना पड़ा। कुछ अपराधियों से इंटरव्यू के दौरान तो यह पता चला कि उन्हें मालूम ही नहीं था कि वे रेप या किसी तरह की जबरदस्ती कर रहे हैं। उन्हें लड़कियों की सहमति से कोई फर्क नहीं पड़ता। उन अपराधियों में अधिकांश पुरुष अशिक्षित थे और कुछ चौथी या हाईस्कूल पास। इस रिसर्च से पहले वह सोचती थीं कि ऐसे अपराधी राक्षस होते हैं लेकिन रिसर्च के बाद वह इस नतीजे पर पहुंची की ये हमारे ही बीच के वहशी किस्म के लोग है।
पुरुषवादी सोच है कारण
इस पूरे रिसर्च का परिणाम पुरुषवादी सोच निकलकर आया। इसके बारे में मधुमिता ने तुरंत अपने दोस्तों से फोन कर पूछा कि उनकी मां उनके पिताजी को क्या कहकर बुलाती हैं। जिसके बाद पता चला कि अब भी अधिकतर घरों में महिलाएं अपने पति को उनके नाम से नहीं पुकारती हैं। ‘आप सुन रहे हैं,’ ‘सुनो,’ या ‘चिंटू के पिता’ के जरिये अधिकतर भारतीय महिलाएं अपने पति से बात करती हैं।
रेप के दोषियों से बातचीत करने के दौरान मधुमिता ने अनुभव किया कि इन पुरुषों को लड़कियों की सहमति से कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें समझ नहीं आता कि सहमति क्या है। अपने सवालों के ऐसे जवाब मिलने से वे तो हैरान रह गई थीं कि क्या यह सिर्फ ये ही पुरुष ऐसे हैं? या पुरुषों का विशाल बहुमत ही ऐसा है?
इसे जानने के लिए मधुमिता को और अधिक रिसर्च करनी है जिसके लिए उन्होंने आगे आवेदन किया हुआ है। अब देखना है इसके परिणाम क्या आते हैं।
