Aunt trying to understand daughter's emotionsdaughter
Aunt trying to understand daughter's emotions

Summary: बेटियों की परवरिश में आंटी का रोल माँ के बराबर: रिपोर्ट

टीनेज बेटियां कई भावनात्मक और मानसिक बदलावों से गुजरती हैं और हमेशा माँ से सब कुछ साझा नहीं कर पातीं। ऐसे समय में आंटी उनके लिए भरोसेमंद साथी बनकर महत्वपूर्ण भावनात्मक सपोर्ट सिस्टम देती हैं।

Aunts Importance in Teenager Life: किशोरावस्था में कदम रखते ही बेटियों की दुनिया तेज़ी से बदलने लगती है। शारीरिक, मानसिक परिवर्तन के साथ ही ख़ुद की अलग पहचान बनाने की चाह। इस उम्र में बहुत कुछ नया होता है। माँ–बेटी का रिश्ता भले ही सबसे करीब का हो, लेकिन सच यह है कि कुछ पल ऐसे आते हैं जब बेटियाँ माँ से भी अपने दिल की बात कहने में झिझकती हैं। यहीं पर आंटी चाहे बुआ हों, मौसी हों या मम्मी की कोई खास दोस्त उनकी ज़िंदगी में एक भरोसेमंद, समझदार और भावुक साथी बनकर सामने आती हैं। वह वह शख्स होती है जो बिना जज किए सुने, समझे और सही दिशा दिखाए। किशोरी बेटियों के इस संवेदनशील दौर में एक प्यार भरी आंटी सिर्फ रिश्ते का नाम नहीं, बल्कि सेफ स्पेस, गाइड और दोस्त बन जाती है।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और रेजिंग गर्ल्स तथा 10 थिंग्स  गर्ल्स नीड मोस्ट जैसी किताबों के लेखक स्टीव बिडल्फ़ कहते कि लड़कियों के विकास में आंटियों का योगदान बेहद अहम है। वे मानसिक स्वास्थ्य से लेकर भावनात्मक मजबूती तक हर स्तर पर बच्चियों को सहारा देती हैं।

क्यों जरूरी हैं आंटियाँ?

स्टिव बिडल्फ़ की रिपोर्ट के अनुसार, आज की लड़कियां सोशल मीडिया, स्कूल के दबाव, फ़िग़र को लेकर असुरक्षा और रिश्तों से जुड़ी उलझनों जैसी चुनौतियों का रोज़ सामना करती हैं। ऐसे में उन्हें सिर्फ माता-पिता ही नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद महिला साथी की भी आवश्यकता होती है, जिसके पास वे बिना झिझक अपनी दिल की बातें कह सकें।

Aunts Importance in Teenager Life-Aunt can play a role of friend and guide
Aunt can play a role of friend and guide Credit: Istock

दरअसल, कई बार बेटियाँ अपनी माँ की बात नहीं सुनना चाहतीं, लेकिन फिर भी उन्हें सहारे और मार्गदर्शन की जरूरत होती है। आंटियाँ उस समय सुरक्षित जगह बन जाती हैं, जब बेटी को लगता है कि वह माँ से बात नहीं कर सकती।

प्यार का रिश्ता भी है जरूरी

बिडल्फ़ कहते हैं कि आंटी होने के लिए खून का रिश्ता होना ज़रूरी नहीं। यह कोई पड़ोस की आंटी, माँ की मित्र, या बड़ी बहन जैसा रिश्ता निभाने वाली महिला भी हो सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि वह बच्ची को अपनापन दे, उसकी बात सुने और उसके साथ व्यक्तिगत समय बिताए।

कैसे निभाएँ आंटी का रोल?

एक अच्छी आंटी बनने के लिए बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी संवेदनशील बातें रिश्ता मजबूत करती हैं।

  • उसके साथ समय बिताएँ। अकेले में बातचीत हो तो बेहतर
  • उसे अपनी बातों और अनुभवों से सीख दें
  • उसकी कठिनाइयों पर बिना जज किए उसका साथ दें
  • उसके आत्मविश्वास को बढ़ाएँ

क्यों नहीं छोड़ सकते सिर्फ दोस्तों पर?

अगर लड़की को परिवार में ऐसा सहारा नहीं मिलता, तो वह सहारे के लिए अपने दोस्तों यानी पीयर ग्रुप पर निर्भर हो जाती है। लेकिन बिडल्फ़ चेतावनी देते हैं कि यह हमेशा सुरक्षित नहीं होता। अगर हम ये सपोर्ट नहीं देंगे तो लड़कियाँ सहारा अपनी उम्र के दोस्तों से लेंगी और वहीं से सोशल मीडिया का अनियंत्रित असर शुरू होता है। किशोरावस्था में दोस्त खुद असमंजस में होते हैं और सही मार्गदर्शन देने की क्षमता उनमें कम होती है। ऐसे में आंटी जैसी अनुभवी और संवेदनशील महिला का साथ बहुत काम आता है।

आंटियाँ एक अनमोल रिश्ता

बेटियों के जीवन में आंटियाँ सिर्फ रिश्तेदार नहीं, बल्कि दोस्त, मार्गदर्शक और भावनात्मक ताकत होती हैं। वे वो लोग होती हैं जो बिना माँ की भूमिका निभाए उतनी ही ममता, सुरक्षा और समझ देते हुए बच्चियों को संवेदनशील और मजबूत बनाती हैं।

आज जब माता-पिता के पास समय कम होता जा रहा है और सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ रहा है, आंटियों की मौजूदगी और भी अहम हो जाती है।

अभिलाषा सक्सेना चक्रवर्ती पिछले 15 वर्षों से प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में दक्षता रखने वाली अभिलाषा ने करियर की शुरुआत हिंदुस्तान टाइम्स, भोपाल से की थी। डीएनए, नईदुनिया, फर्स्ट इंडिया,...