वास्तव में बंधन शब्द प्रतिज्ञा का प्रतीक है और रक्षा मनोविकारों से बचाव का प्रतीक है। तिलक आत्मिक स्मृति का प्रतीक हैं। राखी का धागा प्रतिज्ञा में दृढ़ता का प्रतीक हैं, परस्पर अटूट स्नेह का प्रतीक है। गीता में कहा गया है- ‘कि जब संसार में नैतिक मूल्यों की कमी आने लगती है तब ज्योर्तिलिंगम भगवान शिव, प्रजापति ब्रह्मï द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहने मंगलकामना करते हुए भाइयों को बांधती है और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दुख और पीड़ा से मुक्ति दिलाते हैं।’

रक्षाबंधन का इतिहास

रक्षाबंधन के ऐतिहासिक व धार्मिक महत्त्व में व्यक्ति की सुरक्षा, सफलता तथा सुखमय विकास का भाव निहित है। इस त्योहार को भारत में स्त्री की रक्षा के लिए तो सर्वोपरि माना ही गया है। साथ ही स्त्री ने देवताओं की रक्षा के लिए रक्षाबंधन का त्योहार रचा। श्रावण मास में शिव की आराधना से जुड़ा यह त्योहार भी उससे पृथक नहीं है। शिव की निरंतर आराधना तथा धर्म की मर्यादा के लिए माता पार्वती ने भगवान शिव को कहा- ‘कि देवताओं को कोई ऐसा सूत्र दीजिए जिससे इनकी रक्षा हो सके। देवी के वचन सुनने के बाद भगवान शंकर ने रक्षासूत्र दिया। जिसको माता पार्वती ने सभी देवताओं की कलाई पर बांधा।’ इसी को रक्षा सूत्र कहा गया है। सूत्र का अर्थ धागे से भी है और सिद्धांत से भी। द्रौपदी ने भी अपनी साड़ी का धागा निकालकर कृष्ण की कलाई पर बांधा था और कृष्ण ने अपने वचनानुसार कौरव सभा में द्रौपदी की रक्षा कर लाज बचाई थी।

इसी तरह ऐतिहासिक दृष्टि से रक्षाबंधन मनाए जाने के पीछे भी एक पंरपरा रही है। कहा जाता है- ‘कि जब राजपूत राजा युद्ध पर जाते थे, तो घर की महिलाएं उनके माथे पर सिंदूर का तिलक लगाकर हाथ में रक्षा सूत्र बांधा करती थीं। ऐसा करने के पीछे उनका विश्वास था कि रक्षा सूत्र दुश्मन से उनकी रक्षा करेगा और ये विजयी होकर वापस लौटेंगे। उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए अब भी बहने जीवन संघर्ष में भाइयों की सफल होने की कामना करतीं है। उधर भाई भी बहनों के प्रति अपने रिश्ते को जिम्मेदारी पूर्वक निभाने का आश्वासन देते हैं। 

उत्तर प्रदेश में कई क्षेत्रों में गाय-बैलों को माता-पिता मानकर राखी बांधी जाती है। हथियारों को राखी बांधकर उनसे अपनी सुरक्षा के भावों को प्रकट किया जाता हैं। फैक्टरियों की मशीनों तथा विभिन्न वाहनों को राखी बांधकर सुरक्षा का वचन लिया जाता है। 

रक्षा बंधन पर्व की ऐतिहासिकता अत्यंत पुरातन है। ऐसी कहानी पुराणों में मिलती है कि देवता तथा दानवों में बारह सालों तक भंयकर युद्घ होता रहा। इतना लंबा वक्त गुजर जाने पर भी हार-जीत का निर्णय नहीं हो पा रहा था तब देवताओं के गुरु बृहस्पति जी ने देवताओं को रक्षा सूत्र बंधवाने का परामर्श दिया। देवराज इन्द्र जब देवासुर संग्राम में जा रहे थे, तो उनकी पत्नी शची ने पूरे विधि-विधान से विजय की कामना करते हुए इन्द्र तथा सारे देवताओं की कलाई में रक्षा सूत्र बांधा और कहा-

येन राजा बलिर्बद्घो दानवेन्द्रो महाबलषु। तेन् त्वाम प्रतिबध्रानि रक्षेम चल मा चल। 

रक्षा सूत्र से सारे देवता रक्षित हो गए। रक्षित हो जाने पर देवों ने दुगुने साहस से युद्घ किया एवं विजयश्री पाई। इस युद्घ में देवताओं की रक्षा के लिए देवताओं की ओर से युद्घ के लिए पृथ्वी से भी अनेक तेजस्वी राजा गए थे। उन्होंने जब रक्षा मंत्र, रक्षा विधान और रक्षा बंधन की बड़ाई देखी तो वे बृहस्पति से निवेदन कर इसे पृथ्वी पर ले आए तथा प्रारंभ में आसुरी ताकतों से आक्रमण में विजय हासिल करने के लिए इस मंत्र विधान का प्रयोग करने लगे।

यज्ञों में रक्षा सूत्र

पुरातनकाल में यज्ञ के मौके पर हाजिर लोगों की कलाइयों में एक सूत्र बांधा जाता था। यह सूत्र यज्ञ में उपस्थिति का सूचक माना जाता था, साथ ही यज्ञ से प्राप्त ऊर्जा का आधार भी था। इन्हीं सूत्रों के माध्यम से व्यक्ति की रक्षा की कामना की जाती थी।

रक्षा सूत्र से लक्ष्मीजी ने पाया स्वामीजी को 

भगवान विष्णु जी ने वामन अवतार में राजा बलि से तीन पग जमीन मांगी। बलि दानी था। वह किसी को खाली हाथ नहीं जाने देता था। इसलिए उसने जब भगवान वामन से तीन पग जमीन लेने को कहा तो ‘भगवान ने एक पग में स्वर्ग ओर दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया।’ तीसरा पैर कहां रखे इस बात को लेकर बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया, अगर वह अपना वचन नहीं निभाता तो अर्धम होता। आखिरकार उसने अपना सर भगवान के सामने कर दिया और कहा, तीसरा पैर आप मेरे सर पर रख दीजिए। वामन भगवान ने वैसे ही किया पैर रखते ही बलि पाताललोक में पहुंच गया। बलि की उदारता से भगवान प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे पाताललोक का राज्य प्रदान किया। बलि ने वर मांगा कि वह उसके द्वारपाल बनकर रहे। तब भगवान को उसे यह वर भी प्रदान करना पड़ा। पर इससे लक्ष्मीजी संकट में आ गईं। वह चिंता में पड़ गईं कि अगर स्वामी द्वारपाल बनकर पाताललोक में रहेंगे, तो बैकुंठ लोक का क्या होगा? संयोग से उस उधेड़बुन के दौरान देवर्षि नारद उनसे मिलने आए। लक्ष्मीजी ने उन्हें अपनी समस्या बताई। नारद जी ने लक्ष्मीजी को उपाय बताते हुए कहा- ‘बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांध दो और उसे अपना भाई बना लो।’ लक्ष्मीजी ने ऐसा ही किया उन्होंने बलि की कलाई पर राखी (रक्षासुत्र) बांधी। बलि ने लक्ष्मीजी से वर मांगने को कहा, तब उन्होंने विष्णु जी को मांग लिया। रक्षासूत्र की बदौलत लक्ष्मीजी को अपने स्वामी पुन: मिल गए। 

मध्यकाल आते-आते

मध्यकाल में रक्षा की भावना का दोहरा आशय माना जाने लगा। प्रथम जिस व्यक्ति से रक्षाबंधन किया जाए, कल्याण कामना तथा दूसरे रक्षा बंधन करने या रक्षा सूत्र भेजने वाले की सहायता। मुगल शासन काल में तमाम स्त्रियों ने आक्रमणकारियों से बचाव के लिए बहादुर व्यक्तियों को रक्षासूत्र भेजे तथा उन्होंने स्त्रियों की रक्षा की। इनमें चित्तौड़ की ‘महारानी कर्णवती’ की घटना खासतौर से अद्भूद है। उन्होंने हुमायूं को राखी भेजकर गुजरात के बादशाह जफर के विरुद्घ सहायता मांगी थी। हुमायूं ने राखी का पूरा आदर किया तथा महारानी कर्णवती को अपनी बहन मानकर उसकी सहायता के लिए शीघ्र चित्तौड़ पहुंच गए थे।

हुमायूं के पश्चात् दूसरे बादशाह भी रक्षा बंधन की उपयोगिता को स्वीकारते रहे तथा अपनी प्रजा के साथ उमंग से इसको मनाते रहे। परिणामस्वरूप रक्षा बंधन का त्योहार साम्प्रदायिक सौहार्द्र का प्रतीक बन गया। बादशाह शाह आलम सानी के दरबार में रक्षा-बंधन के पर्व को खास ओहदा मिला। एक ब्राह्मïण महिला राम कौर को शाह आलम सानी ने अपनी बहन के रूप में सम्मानित किया। रक्षा बंधन के दिन वह महलों में आती तथा सोने की घुंडी लगी सच्चे मोतियों की राखी बादशाह को बांधती, बादशाह उसे प्रचुर मात्रा में धन-दौलत देकर विदा करता।

अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के शासनकाल में रक्षा बंधन की शान-ओ-शौकत और ज्यादा बढ़ गई। इस मौके पर लालकिला में आठ दिन पहले से ही तैयारियां आरंभ हो जाती थीं। झुले डाले जाते, भांति-भांति के पकवान बनाए जाते ब्राह्मïण उन्हें आर्शीवाद देते तथा सम्राट यह सब स्नेह पूर्वक स्वीकार करते हुए, उन्हें भांति-भांति के तोहफे देते। संपूर्ण दरबार सम्राट के जयघोष से गूंज उठता।

बदलती परिभाषाएं

रक्षा बंधन का पर्व श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसका स्वरूप दिन प्रतिदिन बदलता जा रहा है। कभी यज्ञ में सभी को सूत्र बांधा जाता था, कभी पत्नी पति को रक्षा सूत्र बांधती थी, कभी ब्राह्मïण यजमान को रक्षा सूत्र बांधता तो कभी बहन भाई को। आज बहन द्वारा भाई को राखी बांधने की परंपरा सर्वत्र प्रचलित है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को राखियां बांधती है। इस त्योहार पर बहनों के भीतर अदम्य साहस और प्रसन्नता का नजारा देखने को मिलता है। बहनें इस त्योहार पर सवेरे पूजा अर्चना करके भगवान से भाई की दीर्घायु सुखद और उनके निरोगी जीवन की कामना करती हैं। इसके बाद अपने भाइयों के दाहिने हाथ की कलाइयों में पवित्र स्नेह का बंधन बांधती हैं तथा अपने हाथों से भाई का मुंह मीठा करती हैं। यह उत्सव हालांकि भारतवर्ष का ही नहीं शनै:-शनै: सारे संसार का त्योहार बनता जा रहा है। ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में बहनें अपने भाइयों के पास जाकर रक्षा सूत्र बांधती हैं या भाई बहन के घर जाकर राखी बंधवाता है। यह आयोजन सवेरे से लेकर पूरे दिन चलता रहता है। इस दिन तो ऐसा लगता है जैसे संपूर्ण वातावरण ही भाई-बहन के स्नेह बंधन के रूप में बंध गया हो।

इस प्रकार असीम प्रेम और अनुराग का परिचायक यह पर्व भारतवर्ष की सुखद संस्कृति का वह बिरवा है, जिसकी खुशबू सारे जहां को महक से भर देती है। भाई-बहन के अमर प्रेम की खुशबू पूरे वातावरण में तैर जाती है और गूंज उठता है संगीत निराला ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’।

अंतराष्ट्रीय ख्याति मिली

सिकंदर के आक्रमण के वक्त इस राष्ट्रीय उत्सव को अंतराष्ट्रीय का भी स्पर्श मिला। सिकंदर तथा सम्राट पुरु के बीच भयानक युद्घ चल रहा था। सिकंदर की सेना के हौसले पस्त हो रहे थे तथा उसकी हार की संभावना बढ़ रही थी। संभावना थी कि विश्व विजेता का सपना देखने वाले सिकंदर को कहीं इस लड़ाई में अपने प्राणों से हाथ न धोना पड़े, ऐसी दशा में एक यूनानी महिला ने सम्राट पुरु के पास, इस आशय के साथ राखी भेजी कि वे उसे अपनी बहन तथा हर हालत में सिकंदर के प्राणों की रक्षा करें। इसके पश्चात् राखी की लाज बचाने के लिए ही सम्राट पुरु ने तमाम बार मौका मिलने पर भी, सिकंदर के प्राण नहीं लिए।

रक्षाबंधन की थालियां

स्नेह बंधन के इस त्योहार पर बहन की राखियों से सजी थाली का विशेष महत्त्व है। वैसे तो बाजारों में आजकल बहुत से डिजाइनों में राखी की थालियां चल पड़ी है। जिन्हें बहनें अपने सामर्थ्य के अनुसार खरीद सकती हैं, लेकिन जब कोई बहन अपने हाथों से प्यार और आर्शीवाद से भरे एहसासों के साथ घर पर ही सुन्दर थाली सजाती है तो उनकी बात ही निराली होती है। थाली में सुन्दर-सुन्दर डिजाइनर राखियां तो होती ही है, साथ ही रौली का टीका, चावल, मिठाई, सूखे मेवे, सुखा नारियल, इलायची व कुछ घरों में दीपक भी रखा जाता है। बहन प्यार से भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और जीवन भर यह प्यार यू ही बना रहे, यह कामना करती हैं। इस दिन सेवइयां जरूर बनाई जाती है क्योंकि सेवइयों या जवों को भी सूत्र ही कहा जाता है, जो कि शंकर जी द्वारा दिए गए सूत्र का ही स्मरण है।

यूं करें रक्षा सूत्र व्रत

  • इस दिन सुबह स्नान कर देवता, पित्तर और ऋषियों का तर्पण करें।
  • दोपहर के बाद ऊनी, सूती या रेशमी पीले कपड़े में सरसों, सुवर्ण, केसर, चंदन, अक्षत और दूर्वा रख कर बाध लें।
  • कलश पर रक्षा सूत्र रखकर व हवन पूजन करें।
  • स्वस्तिवाचन के साथ ब्राह्मïण से रक्षा सूत्र दाए हाथ मे बंधवाएं।

उपहारों की चमक

रक्षाबंधन आने की आहट अब सावन के झूलों व मेलों से ही नहीं बल्कि बाजार के सजने और उपहारों की चमक धमक से भी

होती है। समय के साथ गिट का प्रचलन भी तेजी से बढ़ा है। ऐसे में भाई-बहन दोनों को यह एहसास होता है कि वे एक दूसरे को ऐसा उपहार दें, जो इस मौके को यादगार भी बना दें। राखी के खूबसूरत त्योहार में प्यार से भरे उपहारों में राखी विद स्वीट्स हैंपर्स, चाकलेट हैंपर्स, स्पेशल गिफ्ट आइटम, कंप्लीट राखी गिफ्ट हैंपर्स, गहने या मेकअप किट तथा डायमंड भैया-भाभी सेट आदि प्रचलन में है।

ऑनलाइन राखी

इलेक्ट्रॉनिक युग और हाइटेक होती जीवनशैली के साथ राखी का पवित्र त्योहार रेशम के धागों के साथ-साथ कंप्यूटर स्क्रीन तक भी पहुंच गया है। राखी को यादगार बनाने के लिए अब ऑनलाइन राखियां भी मौजूद है। यानी माउस क्लिक करते ही आप सात समुंदर पार रहने वाले अपने भाई तक राखी और उपहार भेज सकती हैं। बहनें न सिर्फ इन ऑनलाइन वेबसाइट्स के जरिए अपने भाई को राखी भेज रही हैं, बल्कि बदले में भाई से ऑनलाइन उपहार भी ले रही हैं। इसमें राखी की विभिन्न वेरायटी जैसे चंदन, मोती, नग, कुंदन और स्वोस्की की राखियां विभिन्न रेंज में उपलब्ध है। आप वेबसाइट्स से अपनी पसंदीदा राखी चुनकर अपने भाई को भेज सकती हैं जो आपसे मीलों दूर बैठे भाई के चेहरे पर मुस्कान लाने में सहायक होगी।

इस तरह रक्षा बंधन का त्योहार हमारे सामाजिक परिवेश एवं मानवीय रिश्तों का अंग है। लेकिन आज इसमें पवित्रता की जगह कुछ-कुछ आडंबर का भी समावेश हो गया है। जरूरत है आडंबर की बजाय इस त्योहार के पीछे छिपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों की अहमियत देने की तभी व्यक्ति परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण संभव होगा। 

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