20 साल पहले की सास

अरे ओ बहुरिया…फ्रिज में वो अनार रखा है…काट कर मुझको दे दे आकर जल्दी से…सुबह से आज तूने कुछ भी खाने को नहीं दिया है..भूख लग रही है…बहू फ्रिज से अनार लेने जाती है..फ्रिज में अनार नहीं मिलता है…बहू बोलती है…माजी अनार खत्म हो गया है..जब बाहर आएगा तो खरीद कर दे दूंगी…सास तेजी से चिल्लाते हुए..अरे कल ही तो आया था खरीदकर…कौन खा गया…बहू बोलती है माजी नहीं पता है…कौन खा गया..सास को बहुत गुस्सा आया…और बहू के ऊपर जमकर चिल्लाया…सास खुद फ्रिज खोलकर देखा कि एक अनार रखा था…सास के गुस्से से पारा और बढ़ गया..सास रसोई घर से बहू के कमरे की ओर चिल्लाते हुए गई…तो देखा बहू आराम से कमरे में लेटी हुई थी..सास तेजी से चिल्लाते हुए उठ यहां से…तुझसे क्या बोला था…कि अनार काट कर देना..तूने देखा था जाकर फ्रिज में कि अनार नहीं है…अरे सासू मां..जो अनार था वो आपका बेटा रात में खा गया था..तो मैंने सोचा नहीं होगा…गुस्से में सास…आज आने दो नासपीटे को…बताती हूं…कि तू मेरा कितना मेरा ख्याल रख रही है..दोपहर में बेटा जैसे ही घर में घुसा…गुस्से में इधर आ मोहन…तूने अपनी बीवी को कुछ ज्यादा ही सर पर चढ़ा लिया है…मेरी एक बात भी नहीं सुनती है…और तू भी मेरी तरफ ध्यान नहीं दे रहा है…क्या जादू कर दिया है तेरी बीवी ने…मोहन…हंसते हुए..अरे नहीं मां…वो तो बहुत सीधी है…रोज मूझसे कहती है…की आज मैंने माजी के पंसद का खाना बनाया है…उनके लिए ये लाना है…वो लाना है…सास बोली..मोहन ज्य़ादा तू अपनी बीवी का पक्ष न लें…मैं सब जानती हूं…कितना तेरी बीवी मेरा ख्याल रखती है और तू भी…सास का इमोशनल ड्रामा

नये जमाने की सास

मोहन रहने दो ना मां…बताओं तुमको क्या चाहिए…मैं लेकर आता हूं…मोहन जैसे ही मां के कमरे से निकलने के लिए उठा…तुरंत मां बोली.. नहीं रे जा अपनी बहू के पास…उस का ख्याल रख जाकर..वह बीमार है। मैं तो अब बूढ़ी हो गई हूं.. मैं अपना ख्याल रख लूंगी। बहु अभी नई-नई है इस घर में और आते ही किस-किस का ध्यान रखे।…..मां ऐसा नहीं कहते हैं…मैं हूं…बीवी को आवाज देते हुए मोहन ने बुलाया…और कहा रीना, सुनती हो.. आज मां की तबीयत ठीक नहीं है उनके पैरों में दर्द है। वो यहां अकेली बैठी हैं थोड़ा ध्यान कर लो..।

अरे बेटा कैसी बात कर रहा है मैंने उसको बोला है आराम करने के लिए। रखती तो है ध्यान।…आज उठने का मन नहीं था…इसलिए आ नहीं पाई…इसके लिए इतना बवाल करने की किया जरूरत।..सास बोली सुन बहू तू मेरे लिए कुछ मत कर…बस तू मेरे बेटे का ख्याल रख…जब तक मैं जिंदा हूं…खूद के लिए काम कर लूंगी..।

यह है नए जमाने की सास लेकिन सास तो भई सास ही है। 

पहले जमाने की सास यदि बेटे बहू में युद्ध छिड़वा देती थी तो इस जमाने की सास बहू को सोचने के लिए मजबूर कर देती है कि ‘इतने मीठे पल का कारण क्या है? कहीं कुछ घपला तो नही!!’ देखा जाए तो दोनों केस में ही जीत सास की ही है।

कहते हैं माता पिता अपनी संतान में खुद को तलाशते हैं। ऐसे में कई माता पिता बच्चों के जरिए अपने उन सपनों को पूरा करने की कोशिश में लग जाते हैं जो वो खुद नहीं कर सके। यहां तक भी बात एक हद्द तक समझ आती है लेकिन समस्या तब होती है जब अ•िभावक बच्चों पर अपनी सोच और कार्यप्रणाली को थोपने लगते हैं। ये सिलसिला चलता जाता है और बच्चे बड़े होकर अपना परिवार बना लेते हैं। लेकिन माता पिता का ये स्वभाव अगर न बदले तो संतान का के वैवाहिक जीवन पर इसका बुरा प्रभाव पड़ने लगता है।

इस तरह का बर्ताव बहुत सी सासों में देखा गया है जो बहू से भी यही उम्मीद रखती हैं कि वो पूरी तरह से उनके कहे अनुसार ही चले। लेकिन ऐसा संभव नहीं। वो भूल जाती हैं कि बहु को उनकी तानाशाही की आदत नहीं है। ऐसी सासें खुद के बारे में ज्यादा और बच्चों के बारे में कम सोचती हैं। या यूं कह लें कि बच्चों की सोच और तरीके का सम्मान नहीं कर पातीं। उन्हें लगता है कि वो जो कहती हैं वही सही है और सबको उनकी बात माननी चाहिए।

अगर बहु ऐसी सास के विपरीत चले तो वो पूरी तरह से घर को अपने नियंत्रण में ले लेती है। घर के सभी सदस्यों को यहां तक की अपने बेटे को भी बहु को नजरअंदाज करवाने की कोशिश करती है। वो बहु को घर के सभी जरूरी निर्णयों और कार्यों से दूर रखने की कोशिश करती है। ऐसे में कई बार बहू को अपने ही घर में मेहमान जैसा महसूस होने लगता है। ऐसी सास को लगता है कि वही घर की सर्वेसर्वा हैं और बहु कुछ संभाल नहीं सकती क्योंकि वो उनकी बात नहीं मानती। 

ये है उपाय

जिस घर में आप हजारों सपने लेकर उसे अपना बनाने आई हों, वहां अपनी एक भी न चले तो मायूस होना स्वाभाविक है। लेकिन आपको ऐसे में सास के विपरीत खड़ा होना और भी नुक्सान पहुंचा सकता है। यहां थोड़ा कूटनीति से काम लेने की जरूरत है। पहले तो आप ये समझें कि नियंत्रण की सास की ये आदत आज की नही है। आपके पति आपको अक्सर कहते भी होंगे कि मम्मी शुरू से ही ऐसी हैं। ऐसे में आप सास की माने या न माने लेकिन उन्हें हर बात में तवज्जो देना न भूलें। उनके कहे उनुसार कुछ काम करने के साथ ही उसमें अपने सुझाव को सामने रख दें। यहां जरूरत है सास की चहेती बनने की, जो आप समझदारी से ही बन सकती हैं।

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