जीवन की क्षणभंगुरता, घटनाओं की अस्थिरता के प्रति सजगता से एक सत्य का उद्ïघाटन होता है कि इस चलायमान सृष्टि में कहीं कुछ अचल भी है जो नहीं बदलता। एक ऐसा आधार-बिन्दु जहां से सतत परिवर्तन की प्रतीति हो सकती है। उस आधार-बिन्दु की झलक का मिलना अर्थात अपनी आत्मा को देख लेना। यही ज्ञान है। ज्ञानी व्यक्ति मूर्ख होता है। सभी ज्ञानियों को मूर्ख समझा गया। गैलिलियो के उद्घोष, ‘धरती सूर्य के चारों ओर घूमती है’ पर संसार ने उसे मूर्ख ही घोषित कर दिया था।

मूर्ख की परिभाषा- शांत, मुक्त एवं आनन्दित। उसे सांसारिक अथवा आध्यात्मिक उपलब्धियों की चिंता नहीं। आपने अपनी उऌपलब्धियों से क्या पाया और कहां पहुंचे? वास्तव में कुछ पाना नहीं, कुछ खोना नहीं। आप अपने कृत्यों से परमात्मा को प्रसन्न अथवा अप्रसन्न नहीं कर सकते। संस्कृत की एक कहावत, ‘मेरा घर तो स्वर्ग में है, संसार में मैं विश्राम के लिए आया हूं’। मैं संसार में क्रीड़ा विश्राम और यहां के घटनाक्रम को निहारने आया हूं। इस संसार में यदि अपने आसपास के घटनाक्रम को सजगता एवं सर्तकता से देखो तो यह अति मनोरंजक है। यह संसार एक मनोरंजक स्थली है।

तुमने कभी अनुभव किया कि तुम्हारा जीवनयापन एक ही शैली से हो रहा है। दूसरों के जीवन में भी वही पुनरावृत्ति। एक ही क्रियाविधि के घेरे से मुक्त हो जाना ही जागरण है। पहले उस परिधि से परिचय होना और फिर कूद कर उससे बाहर हो जाना। इस कार्य के लिए मूर्ख भी बनना पड़े तो उपयुक्त है। मूर्ख बनने को सहमत हो जाओ।

पूरे जीवन को एक क्रीड़ा बना लो। क्रीड़ा का अर्थ है- निष्प्रयोजन, निरुद्देश्य होकर कुछ करना। सहजता, सरलता से किया गया कृत्य क्रीड़ा है। यही पूजा है, यही उत्सव है। आपका कोई भी कृत्य परमात्मा को प्रसन्न अथवा अप्रसन्न नहीं कर सकता। वह डण्डा लेकर प्रतीक्षा नहीं कर रहा कि आप कोई भूल करें और वह दण्ड दे। अपने मन में परमात्मा की ऐसी भयावह छवि न बनाओ कि वह तुम्हारे कृत्यों के लिए तुम्हें दण्डित करेगा। आप उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ कर ही नहीं सकते। उसने तो हमें जो भी हम चाहते हैं वह करने की स्वतंत्रता दी हुई है। परमात्मा जैसे कह रहा हो, ‘अधिक गंभीर होने की आवश्यकता नहीं, जीवन तो बस एक खेल है, सब स्वप्न समान है।’

तुम्हारी आध्यात्मिक साधना भी मन का बोझ न बने। साधना स्वैच्छा से हो, प्रेमपूर्वक हो। प्रेम से पूर्ण साधना बंधन नहीं रह जाती। यह कोई कर्तव्य नहीं जैसे हर रविवार गिरजाघर जाकर प्रार्थना करने का कर्तव्य पालन करना ही है। यह अनिवार्यता नहीं। साधना तो जीवन का रसास्वादन है। प्रार्थना तुम्हारी जीवन शैली बन जाये। तुम्हारी हर श्वास प्रार्थना बन जाये। तुम्हारा अस्तित्व ही प्रार्थना बन जाए। तुम्हारा चलना, तुम्हारा प्रत्येक कर्म, तुम्हारी चितवन सब प्रार्थना बन जाते हैं। तुम जिस पर भी दृष्टि डालो तुम्हारे हृदय से अहोभाव ही उमड़ता है। एक पेड़ को भी देखते हो तो अहोभाव से। इस अहोभाव को जी कर देखो। सागर तट पर खड़े होकर इसके विस्तार, इसकी गहराई, इसमें उठती विशाल लहरों को देखो। तुम्हारे हृदय की गहराई में कुछ उतरने लगेगा। वही प्रार्थना है। प्रार्थना स्वत: स्फूटित हो गई- ‘मैं इस समय इस संसार में, इस स्थान पर हूं। वाह! मैं कितना भाग्यशाली हूं।’

पतझड़ का आगमन हो रहा है। ऐसे में भ्रमण पर निकलो और रंग-बिरंगे पेड़, चारों ओर छिटकी रंगों की छटा को देखो। हृदय आभार से गद्गद हो उठता है, धन्यता से धनी हो जाता है। बस ऐसे ही क्षण में आप प्रार्थनामय हो जाते हैं। आसपास के लोग उद्धिग्न होकर लाल आंखों से चीख चिल्ला भी रहे हों। तो भी आपके आनंद में, आपकी खुशी में कोई अंतर नहीं पड़ता। उस दशा में भी आपके मुंह से निकल उठेगा, ‘वाह, कितना सुंदर’।

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