आज हम अपने समाज को जिस आत्ममुग्धता के ‘मोड‘ में देख रहे हैं, उतना शायद ही पहले कभी रहा हो। घर पर, सड़क-चौराहों पर, बसों-मेट्रो में या कहीं भी, ये नज़ारा हम में से अब किसी के लिए भी नया नहीं रह गया है। अपने फोन में पूरी दुनिया समेट लेने वाले हम, सोशल मीडिया के ज़रिये हर बुराई के ख़िलाफ़ ज़ोर-शोर से बहस छेड़ देने वाले हम, तमाम तरह के ऐप इस्तेमाल करके ख़ुद को संवारते-सजाते हम, लेकिन असल में कहां हैं ‘हम‘?
ऐसा नहीं है कि ख़ुद को प्यार करना कोई बुरी बात या ऐब है। जब हम ख़ुद को प्यार करते हैं तो दूसरों की कद्र करनी भी बड़ी आसानी से आ जाती है, पर काश वाकई में ऐसा ही होता। सिर्फ़ अपने को अहमियत देते-देते कब हम दूसरों को नज़रअंदाज़ और उपेक्षित करने लगे हैं, ये एहसास अभी कम ही लोगों को हुआ है।
इस सेल्फ़ी-मोड के साथ हमारी एक और आदत फ़ितरत में बदलती जा रही है। वीडियो बनाने की। वे तमाम जगह, घटनाएं, हादसे, जहां किसी को लोगों की मदद की ज़रूरत होती है, वहीं अब लोग तो बहुत दिखते हैं, लेकिन मदद करते हुए नहीं, बल्कि तमाशबीन बने हुए, संवेदनहीनता की हद तक जाकर सिर्फ़ वीडियो बनाते हुए।
चाहे कोई सड़क पर लड़-भिड़ रहा हो, बेदर्दी से पीटा जा रहा हो, छेड़ा जा रहा हो, मारा जा रहा हो या इसी तरह की कोई भी घटना घट रही हो, लोग अपने-अपने फ़ोन ताने वीडियो बनाने में तल्लीन मिलते हैं। कोई बीच-बचाव की ज़रूरत ही महसूस नहीं करता आज। ‘हमें क्या‘ वाले भाव हर चेहरे पर मिल जाते हैं। हां, अगर कहीं जागरुकता दिखती है तो सिर्फ़ सोशल मीडिया पर, जहां ये वीडियो डाउनलोड करके, बड़ी ही भावुकता के साथ ये सवाल उठाए जाते हैं कि हमारी इंसानियत क्यों ख़त्म होती जा रही है। इस पर ख़ूब ज़ोरदार बहसें शुरू होती हैं। ऐसी-ऐसी बातें कही-सुनी जाती हैं कि आत्मा झकझोर उठे, जबकि असल में हमारे द्वारा उठाए जा रहे ये सवाल हमें ख़ुद ही से करने की ज़रूरत है, क्योंकि भीड़ का अस्तित्व बनता भी तो हमीं से है।
पहले भी कभी जब सड़कें किसी हादसे की गवाह बनती थीं तो भीड़ जुटना आम बात होती थी। ये भी सच है कि ये भीड़ भी तमाशबीनों से भरी होती थी, लेकिन इसी में कई हाथ ऐसे भी होते थे, जो बीच-बचाव के लिए आगे आते थे। क्या आज ऐसा है?
इन सवालों को उठाने की ज़रूरत सिर्फ़ इतने-भर के कारण ही नहीं है। जो आशंका हमें डरा रही है, वह ये है कि अब यही भीड़ अपना कानून भी चलाने लगी है। ग़लती छोटी हो या बड़ी, लोग सार्वजनिक रूप से कानून अपने हाथ में लेने लगे हैं। भीड़ द्वारा किसी को पीट-पीटकर मार डालना अब कोई अनसुनी सी या बड़ी बात नहीं लगती। समाज की हर कमी, हर बुराई की ज़िम्मेदारी सरकार की है, व्यवस्था की है। हमारी नहीं। हम इंसाफ़ करने के नाम पर हर कानून अपने हाथ में लेने को आज़ाद हैं, क्योंकि हम एक आज़ाद देश के, आज़ाद लोकतंत्र का हिस्सा हैं।
बीते साल में तो एक-दो नहीं, बल्कि सैकड़ों ऐसी घटनाएं घटी हैं, जो लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलते जाने की गवाह रही हैं। हादसे कभी किसी से पूछ कर नहीं होते। ऐसे में इस बात की क्या गारंटी है कि कभी हम इस भीड़तंत्र के शिकार नहीं हो सकते? हो सकता है कि उस समय हमें किसी की मदद की सख़्त ज़रूरत हो, लेकिन हम सिर्फ़ वीडियो के नायक बने ज़िंदगी और इंसानियत से हार रहे हों।
बीते समय के साथ जो बीत गया, हम उसे बदल नहीं सकते, लेकिन आने वाले कल के लिए क्या हम आज वे हाथ नहीं बन सकते, जो वीडियो बनाने के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत के नाते सिर्फ़ किसी इंसान की मदद के लिए उठ रहे हों। यकीन कीजिए, कहीं न कहीं से हुई ये पहल ही बदलाव की बयार बन सकती है। बस एक बार कोशिश तो कीजिए भीड़ में रहकर भी, भीड़ का हिस्सा न बनने की, बल्कि सब से अलग एक मिसाल बनने की। यही आज की कोशिश कल की एक मज़बूत उम्मीद बनेगी…
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