साईंनाथ के चमत्कार –
नीम पर मीठे फल
एक बार बाबा गोदावरी नदी में स्नान के लिए शिरडी गांव पधारे। युवावस्था में लोग उनके योगासन को देखकर दंग हुए। बाबा ने वहां एक नीम के पेड़ के नीचे डेरा लगाया। बाद में यही जगह गुरूस्थान के नाम से जानी गई। इस नीम के आधे भाग में मीठे फल निकलते हैं, क्योंकि बाबा को जब भिक्षा नहीं मिलती थी, तो वह कड़वी निबोरियां चबाते थे, जो कि मीठे आमों में बदल जाती थीं।
गुरू को दूध लाकर दिया
बताया जाता है कि तरूणावस्था में उनकी करिश्माई हरकतों से तंग आकर उनकी दत्तक मां (विधवा) ने उन्हें वेंकुश आश्रम जाने के लिए कहा। बाबा ने गुरू वेंकुश से शिक्षा -दीक्षा प्राप्त की। जब गुरू वेंकुश का अंत काल आया तो उन्होंने बाबा को अपनी सारी विद्याएं व शक्तियां प्रदान कर दीं तथा उसे काली गाय का दूध लाने के लिए कहा। बाबा अपने गुरू के लिए काली गाय खोजने लगे। काफी खोजबीन के बाद जब उन्हें काली गाय दिखी तो उसके मालिक ने बताया कि वह दूध नहीं देती। बाबा ने गाय के सींगों से लेकर पूंछ तक पुचकारा तथा कहा कि अब थनों को खींचों । आश्चर्यपूर्ण ढंग से गाय ने ढेर सा दूध दिया। जिसे लेकर बाबा ने अपने गुरू (वेंकुश) को दिया, तब कहीं उन्होंने अपने प्राण त्यागे।
पानी से माटी के दीप जलाये…
साईं बाबा की प्रसिद्धि फैलने से पूर्व ही आ गई थी। साईं बाबा की आदत थी कि वह बसेरा तो मस्जिद में करते थे। लेकिन आसपास की मस्जिदों व मंदिरों में नियमित रूप से दीपक जलाते थे। माटी के दीपों में तेल भी डालता था। बाबा ने आस-पास के व्यापार मंडल व बनियों से हामी भरवा रखी थी कि वे मुफ्त तेल का प्रबन्ध करेंगे। कुछ समय तो यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही। लेकिन धीरे-धीरे व्यापारी वर्ग को बाबा को मुफ्त तेल देना अखरने लगा। एक दिन उन्होंने बेशर्मी दिखायी तथा बाबा को जता दिया कि वह आगे तेल समाप्त हो गया है। बाबा ने यह सुनकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तथा चुपचाप मस्जिद में वापस चले गए।
यहीं बाबा की लीला उभरी, उन्होंने चुपचाप माटी के दीपों में तेल की जगह पानी डाला। घोर आश्चर्य कि पानी से भी दीप जलकर जगमगा उठे। देर रात्रि तक उन पानी वाले दीपों का प्रकाश कायम रहा। जब वहां के व्यापारियों व बनियों को इस चमत्कार का पता चला तो वह दंग रह गए। साथ ही उन्हें अपनी गलती का भी एहसास हुआ। वे तुरंत वापस साईं बाबा के पास आए और क्षमा मांगने लगे। बाबा ने भी उन्हें माफ कर दिया। पर साथ में चेतावनी भी दी कि भविष्य में कभी झूठ नहीं बोलेगें, यदि मुझे तेल नहीं देना था तो साफ मना कर देते। तेल नहीं होने का बहाना क्यों बनाया? बाबा की इस लीला से व्यापारियों की मिथ्या धारणा भंग हो गई कि उनके सहयोग के बिना कोई काम नहीं होगा।

बाबा ने जब वर्षा थामी
कहा जाता है कि शिरडी में एक बार तत्कालीन राय बहादुर अपनी पत्नी समेत शिरडी के साईं बाबा के दर्शन हेतु पधारे। दम्पति दर्शन के बाद जब बाहर निकलने लगे तो तेज वर्षा शुरू हो गई। असहाय दम्पति इधर-उधर झांकने को मजबूर हो गए। तब बाबा ने प्रार्थना की, ओ परमात्मा, वर्षा थाम लो। मेरे बच्चों को यहां से बिना कष्ट के जाने दो। शांतिपूर्ण घर पहुंचने दो। वर्षा को प्रकोप देखते-देखते थम गया। भंयकर तेज वर्षा फुहार में बदल गई। मोरदान दम्पति व अन्य श्रद्धालु बाबा के डेरे से बिना विघ्न के सहजता से चल दिए।
र्साइं बाबा ने जलती फसल की आग बुझाई
एक बार शिरडी में बहुत अच्छी फसल हुई। फसल पकी खड़ी थी, तेज गर्मी का प्रकोप था। बाबा ने कोडांजी सूतर को बुलाया तथा कहा कि तुम्हारे खेत में आग लगी है। कोडांजी तेजी बदहवासी में भागकर खेत पहुंचे, परंतु वहां आग का कोई चिन्ह न पाकर वह बाबा के पास लौटे। फिर कहा कि बाबा आपने मुझे हैरान क्यों किया, वहां तो कहीं भी आग नहीं लगी है। बाबा ने फिर मुस्कराते हुए कहा कि कोंडाजी तुम फिर जाकर अपने खेत में आग की जांच करो। आखिरकार बाबा की बात सच्ची निकली । देवीय शक्ति से बाबा को आग लगने की घटना का पता चल गया था। दरअसल पहले कुछ घास-फूस में धूआं उठ रहा था, अचानक तेज हवा से मक्के की फसल आग की चपेट में आ गई। आग बुझाने के लिए गांववासी खेत में पहुंचे।
जब सब गांव वाले आग बुझाने में असफल रहे तब बाबा ने तुरंत प्रार्थना सुनी तथा खेत में जलती फसल को हाथ में पानी लेकर एक बार में बुझा दिया। बाबा की आग की भविष्यवाणी तथा आग को शांत करने की प्रक्रिया चर्चा का विषय बन गई थी।
सूखे कुएं के पानी का स्तर बढ़ा
शुरू-शुरू में जब बाबा शिरडी पधारे थे तो वहां आधारभूत व्यवस्थाओं का अभाव चल रहा था। वहां एक ही कुआं था, लेकिन उसका जल कम होकर लगभग सूख सा गया था। पानी का स्तर बहुत नीचे होने के कारण गांव के लोग पानी के लिए परेशान थे। सब ने बाबा को अपनी समस्या बताई। बाबा ने कहा बस इतनी सी बात है, लो यह एक बूंद, इसे कुएं में डालकर इसका कमाल देखो। गांव वालों ने बूंद ली जो अचानक फूलों में बदल गई जिस पर प्रसाद भी रखा हुआ था। वह फूल व प्रसाद कुएं में डाल दिया गया और कमाल हो गया। थोड़ी देर में लोगों ने देखा कि कुएं में जल का स्तर इतना बढ़ गया है कि फूल तैरते हुए स्वयं कुएं से बाहर आ गए।

बच्ची को डूबने से बचाया
एक बार की बात है कि एक दिन किसी गरीब की 3 वर्ष की बेटी कुएं में गिर गई थी, जिसके कारण सभी गांव वाले चिंतित थे। लोगों ने हिम्मत कर कुएं में झांका तो सब दंग रह गए। कारण था कि लड़की डूबी नहीं थी, बल्कि किसी अज्ञात के हाथों ने उसे थाम रखा था। शीघ्र की लड़की को सकुशल बाहर निकाला गया। दरअसल वह लड़की बाबा को प्रिय थी तथा वह अपनी तोतली भाषा में कहती फिरती थी कि ‘वह बाबा की बहन है।’ यह बाबा की लीला का प्रताप था, तो भला उसकी जान कैसे जा सकती थी?
अन्य लीलाएं (चमत्कार)
बाबा पर अग्नि का कोई असर नहीं होता था। वह अक्सर रसोई की अंगीठियों की अग्नि अपने नंगे हाथ से बुझा देते थे। मजाल है कि जलता कोयला या लकड़ी उनका बाल भी बांका कर सके। एक बार की बात है बाबा के यहां भोजन चल रहा था। मीठे के रूप में बनी खीर समाप्त हो गई। बाबा को जब स्थिति का पता चला तो वह तुरंत रसोई में गए तथा चावल को मुट्ठी में डाला तथा उसे पास में उबलते पानी में डाल दिया। कुछ ही क्षणों में चावल खीर के रूप में बनकर तैयार हो गए जिसे खुशी-खुशी सबने खाया।
ऐसे ही दिन की बात है कि बाबा के यहां कमरे में भोजन चल रहा था। मस्जिद में तीन श्रद्धालु एक साथ बैठकर भोजन में व्यस्त थे कि बाबा अचानक चिल्लाए, रूको सबने बाबा की आवाज को अनसुना कर खाना जारी रखा। तसल्ली से खा-पीकर जब लोग बाहर जाने के लिए दरवाजे पर पहुंचे, जोरदार धम्म की आवाज करते हुए कमरे की छत भोजन वाले स्थान पर जा गिरी तब कहीं जाकर रूको का रहस्य सबकी समझ में आया कि बाबा का प्रकृति पर भी नियंत्रण है। ऐसे ही न जाने और कितने उदाहरण हैं। बाबा की हर लीला उन्हीं की तरह निराली है।
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