भगवान श्री गणेश जी को प्रसन्न करने का साधन बड़ा ही सरल और सुगम है। उसमें न विशेष खर्च की, न विशेष समय की ही आवश्यकता है। पीली मिट्टी की डली लें उस पर लाल कलावा (मोली) लपेट दें। भगवान श्री गणेश साकार रूप् में उपस्थित हो गए। रोली का छींटा लगा दो और चावल के दाने डाल दो। पूजन की यही सरल विधि है। गुड़ की डली या चार बताशे चढ़ा दें, और भोग लगाते समय ये मंत्र बोलें –

 

गजननं भूतगणादिसेवितं, कपित्थ जम्बूफल चारु भक्षणम्।

उमासुतं शोकविनाशकारकं, नामामि विघ्नेश्वर पादपंकजम् ।।

 

गणपति को तुलसी न चढ़ाएं 

गणपति को दूर्वा अधिक प्रिय है अतः इन्हें सफेद या हरी दूर्वा अवश्य चढ़ानी चाहिए। तुलसी से गणेश जी की पूजा करना सर्वथा वर्जित है। गणपति को नैवेद्य मे लड्डू अधिकतम प्रिय हैं।

गणेश चतुर्थी पर पूजन विधि

इस दिन प्रातःकाल स्नानादि करके सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी तथा गोबर से बनी गणेश जी की प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है। मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाकर षोड्शापचार से उनका पूजन करना चाहिए तथा दक्षिणा अर्पित करके 21 लड्डूओं का भोग लगाने का विधान है। इनमें से पांच लड्डू गणेश जी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बांट देने चाहिए।

गणेश जी की पूजा सांयकाल के समय की जानी चाहिए। पूजन के पश्चात् नीची नजर से चंद्रमा को अध्र्य देकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए। नीची नजर से चन्द्रमा को अध्र्य देने का तात्पर्य है जहां तक संभव हो इस दिन (भाद्रपद चतुर्थी को) चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए।

मूर्ति कब प्रतिष्ठित करें?

अक्सर लोग बिना सोचे-समझे जब मन करता है तब अपनी इच्छानुसार अपने इष्ट की मूर्ति घर ले आते हैं और मंदिर में स्थापित कर देते हैं। यदि आप अपने घर मंदिर में गणेश जी की मूर्तिै को स्थापित या प्रतिष्ठित करना चाहते हैं तो इन महीनों में जिस दिन मूर्ति को प्रतिष्ठित करें उस दिन मंगलवार न हो तथा तिथियों में चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी न हो तो उसके लिए चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ माघ अथवा फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष को ही चुनें।

मूर्ति कहां प्रतिष्ठित करें?

गणपति आदि देवताओं का मंदिर घर के ईशान-कोण में होना चाहिए और उनकी स्थापना इस प्रकार करनी चाहिए कि उनका मुख पश्चिम की ओर रहे।

पूजा स्थान में ऐसी गणेश आकृति उचित होती है जिसकी सूंड उनके बाएं तरफ हो। यह आकृति उर्जा को ग्रहण करके संतुलन करने के उपरांत उसके वातावरण में बस जाने की प्रतीक है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

व्रत व पूजन विधि

गणेश जी का यह पूजन करने से बुद्धि और रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है तथा विघ्न बाधाओं का समूल नाश हो जाता है। भाद्रपद -शुक्ल चतुर्थी को सिद्धिविनायक व्रत का पालन करना चाहिए। इस दिन गणेश जी का मध्यान्ह में प्राकट्य हुआ था, इसमें मध्यान्हव्यापिनी तिथि ही ली जाती है। 
सर्वप्रथम एकाग्रचित से सर्वानन्द प्रदाता सिद्धिविनायक का ध्यान करें। फिर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक उनके इक्कीस नाम लेकर इक्कीस पत्ते समर्पित करें। उनके प्रत्येक नाम के साथ ‘नमः’ जुड़ा हो। 

इसमें श्री गणेश जी अत्यंत प्रसन्न होते हैं। इसके अनंतर दो दूर्वादल लेकर गंध, पुष्प् और अक्षत के साथ गणेश जी पर चढ़ाने चाहिए। फिर नैवेद्य के रूप में पांच लड्डू उन दयासिंधू प्रभु गजामुख को अत्यंत प्रेमपूर्वक अर्पण करें। तदन्तर आचमन कराकर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनके चरणों में बार-बार प्रणाम और प्रार्थना करते हुए विसर्जन करना चाहिए।

समस्त सामग्रियों सहित गणेश जी की स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करके ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। इस प्रकार पांच वर्ष तक व्रत एवं गणेश पूजन करने वालों को लौकिक एवं परलौकिक समस्त सुख प्राप्त होते हैं। इस तिथि की रात्रि में चन्द्र दर्शन का निषेध है। चन्द्र दर्शन करने वाले मिथ्या कलंक के भागी होते हैं।

इस दिन क्यों न देंखे चंद्रमा

मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी बनना पड़ता है, क्योंकि एक बार चंद्रमा ने गणेश जी का गजमुख व लंबोदर रूप देखकर उनका मजाक उड़ाया था, गणेश जी ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि आज से जो भी तुम्हें देखेगा उसे मिथ्या कलंक लगेगा, लेकिन फिर चंद्रमा द्वारा माफी मांगने व श्राप मुक्त करने के अनुरोध पर वर्षभर में एक दिन भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन से कलंक लगने का विधान बना। इस दिन चांद के दर्शन करने से भगवान श्रीकृष्ण को भी मणि चोरी का कलंक लगा था।

 

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