शास्त्रों में कहा गया है –आत्मनं रथिनं विद्धि शरीररं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथि विद्धि येन श्रेयो हमाप्नुयाम। अर्थात् आत्मा को रथी जानो, शरीर को रथ और बुद्धि को सारथी मानों। इनके संतुलित व्यवहार से ही श्रेय अर्थात श्रेष्ठत्व की प्राप्ति होती है। इसमें इंद्रियों पर तथा मन पर लगाम होना भी अंतनिर्हित है। ऋषियों ने अन्य मंत्रों में इसका भी जिक्र किया है। इस प्रकार दस इंद्रियों के बाद मन को ग्यारहवीं इंद्रिय शास्त्र ने माना है। अतएव इंद्रियों की कुल संख्या एकादश होती है।
एकादशी तिथि को मन शक्ति का केंन्द्र चन्द्रमा क्षितिज की एकादशवीं कक्षा पर अवस्थित होता है। यदि इस अनुकूल समय में मनोनिग्रह की साधना की जाए तो वह सद्य फलवती सिद्ध हो सकती है। इसी वैज्ञानिक आशय से ही एकादशेन्द्रियभूत मन को एकादशी तिथि के दिन धर्मानुष्ठान एवं व्रतोपवास द्वारा निग्राहित करने का विधान किया गया है। यदि सार रूप में कहा जाए तो एकादशी व्रत करने का अर्थ है अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना।
दो एकादशी होती है हर माह
हर महिने दो एकादशी होती हैं यानी वर्ष में 24 और यदि अधिवर्ष है तो 26 एकादशियां होती हैं, पर ज्येष्ठ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी को निर्जला व्रत करने से वही फल प्राप्त होता है। जो साल भर की कमी एकादशियों के व्रत से मिलता है। एक एकादशी के व्रत को करने से समस्त तीर्थों का पुण्य, सभी एकादशियों का फल एवं सब दानों का फल मिलता है। इसका उपवास धन धान्य देने वाला, पुत्र प्रदायक, आरोग्यता को बढ़ाने वाला तथा दीर्घायु प्रदान करने वाला है। श्रद्धा और भक्ति से किया गया यह व्रत सब पापों को क्षण भर में नष्ट कर देता है। जो मनुष्य इस दिन स्नान, दान जप और होम करता है वह सब प्रकार से अक्षय हो जाता है, ऐसा भगवान श्री कृष्ण ने कहा है। जो फल सूर्य ग्रहण के समय कुरूक्षेत्र में दान देने से होता है। वही फल इस व्रत के करने और इसकी कथा पढ़ने से भी प्राप्त होता है। व्रती की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और वह इस जगत का संपूर्ण सुख भोगते हुए परमधाम जाकर मोक्ष प्राप्त करता है।

पूजन विधि-विधान
यह व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इसी दिन ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर दैनिक कार्मों से निवृत होकर स्नान करें, पवित्र होकर, फिर स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की पूजा आराधना व आरती, भक्ति भाव से विधि-विधानुसार संपन्न करें। महिलाएं सजधज कर मेंहदी आदि रचाकर पूर्ण श्रद्धा, भक्तिभाव से पूजन करने के पश्चात कलश के जल से पीपल के वृक्ष को अध्र्य दें। फिर व्रती प्रातः काल सूर्योंदय से आरंभ कर दूसरे दिन सूर्योंदय तक जल और अन्न का सेवन न करें। चूंकि ज्येष्ठ मास के दिन लंबे और भीषण गर्मी वाले होते हैं। अतः प्यास लगना स्वाभाविक है। ऐसे में जल ग्रहण न करना सचमुच एक बड़ी साधना का काम है। बड़े कष्टों से गुजर कर ही यह व्रत पूरा होता है। इस एकादशी के दिन अन्न जल का सेवन करने से व्रत खंडित हो जात है।
अगले दिन क्या करें
व्रत के दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन प्रातःकाल निर्मल जल से स्नान कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या पीपल के वृक्ष के नीचे जल, फूल, धूप, अगरबत्ती और दीपक जलाकर प्रार्थना तथा क्षमा याचना करें। तत्पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन करावें एवं स्वयं भी भोजन करें। इसके पश्चात यथाशक्ति ब्राह्मणों को दान दक्षिणा में शीतल जल से भरा मिट्टी का घड़ा, अन्न, वस्त्र, छतरी, पंखा, गो, पान, शय्या, आसन, स्वर्ण फल आदि दें। ऐसा माना जाता है। कि जो भी व्यक्ति घटदान देते समय जल का नियम करता है, उसे एक प्रहर के अंदर कोटि-कोटि सुवर्ण दान का फल मिलता है। इस दिन घर आए याचक को खाली हाथवापस करना बुरा समझा जाता है।
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