किन्तु इसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं है। वास्तु शास्त्रों में इस योग को सर्वप्रथम विश्वकर्मा के ग्रंथ में दर्शाया गया है। यह ग्रंथ सातवी-आठवी सदी में रचा गया था। आचार्य वरामिहिर कृत ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वृहत्सहिंता’ जिसकी रचना काल लगभग 570 ई. की टीका लिखने वाले उत्पल भट्ट (9वी सदी) ने ‘वास्तुतंम्’ नाम से इस ग्रंथ के कुछ उदाहरणों को चौदहवी में संपादित हुए ‘ज्योतिष चिंतामणि’ में लिया गया और ये ही उदाहरण के तौर पर बाद के ग्रंथों के लिए आधार बने। इसका श्लोक है
‘ईशनत: सर्पति काल सर्पो विहाय सृष्टि गणयेद विदिक्षु’ शेषस्य वास्तोर्मुख मध्य काल सर्पो विहाय सृष्टि गणयेद विदिक्षु शेषस्य वास्तोर्मुख मध्य पुच्छंञयं परित्यज्य खनेगा लुर्यम्ï॥
इसका अर्थ है पहले ईशान (पूर्वत्तर) से कालसर्प चलता है। सृष्टिï मार्ग या पूर्व से दक्षिण के क्रम को छोड़कर विपरीत दिशा में उसका मुख, नाभि और पूंछ रहती है। इस प्रकार ईशान कोण में नाग का मुख वायव्य कोण में पेट और नैऋत्य कोण में पूछ रहती है। इन तीन कोण को छोड़कर चौथे अग्निकोण या दक्षिण-पूर्व में प्रथमत: खड्डï करना चाहिए। मुख, नाभि और पूछ के स्थान पर खुदाई करने पर हानि होती है।
साधारण व्यक्ति इस वास्तविकता को समझने में असमर्थ होता है। विवाह, भवन निर्माण के अवसरो पर रोपे जाने वाले खंबों के प्रसंग में काल सर्प योग देखने का जयोतिष विद्या में निर्देशित करने का उल्लेख है, ऐसा कार्य गुजरात आदि प्रदेशों में होता है, जब खंबा रोपने के लिए नाग वास्तु पुरुष का मुख देखा जाता है।

वास्तु विषयक ग्रंथों में नाग या राहु मुख देखने का विवरण मौजूद है जैसा निम्र कुंडली से राहु और केतु कि स्थिति दर्शाई जा रही है, उससे ज्योतिष विद्या कहती है कि जातक को कालसर्प योग का प्रकोप है जिससे ज्योतिषी लोग भ्रम पैदा कर भविष्यवाणी करते हैं कि मनुष्य कालसर्प योग से घिरा हुआ है और इसकी शांति करवा ले और ज्योतिष योग ‘त्र्यम्बकेश्वरी’ (नासिक के पास है) जाकर शांति करवा लें।
भिन्न-भिन्न कुंडली में यह स्थिति हो सकती है। राहु के सामने केतु और केतु के सामने राहु तो आते ही हैं बल्कि दोनों पाप ग्रह के अंश (डिग्री) एक ही होती है जैसे, राहु 30 डिग्री का है तो उसके सामने आने वाला केतु भी 30 डिग्री (अंश) का ही होगा इन स्थितियों को ज्योतिषशास्त्र जातक को कालसर्प योग होने का निष्कर्ष निकालते हैं।
जबकि यह वास्तु दोष के लिए है मानव जीवन से ऐसी स्थिति का कोई संबंध नहीं है।
वशिष्ठ गुरु (मुनी) ने जिसे वास्तुनर कहा था, उसे वास्तु शास्त्रियों ने कालसर्प योग संज्ञा दी है। जबकि ज्योतिष विद्या ने इसको मनुष्य जीवन से जोड़ दिया है। अत: कालसर्प योग को मानव जीवन में पदोन्नति उत्कर्ष, विकास, संबंध, गुण-दोष को मानना उचित नहीं है। ज्योतिष शास्त्री वास्तुदोश निवारण के लिए भवन के निर्माण के समय भूमि पूजन करवा लेते हैं या वास्तु पूजा करवाना आवश्यक समझते हैं। ज्योतिष शास्त्रीय इस विषय को गंभीरता से ले और जातक को कालसर्प योग के भय से भ्रमित न करें।
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