भारत में मौजूद मंदिर सिर्फ आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि हर मंदिर की एक अलग कहानी है। यहां पर ऐसे कई मंदिर है, जहां के रहस्य आज भी लोगों को अचंभित करते हैं। इन मंदिरों में मौजूद कई निशानियां अपनी ही कहानी कहते हैं। जहां कुछ मंदिरों की वास्तुकला बेहद भव्य है, तो कुछ मंदिर अधूरे ही रह गए, लेकिन फिर भी आज उनका अपना एक अलग आकर्षण है। ऐसा ही एक मंदिर है मध्यप्रदेश में ककनमठ मंदिर। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर को लेकर कई तरह की किदवंतियां प्रचलित है। कुछ लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण 11 वीं शताब्दी में राजा कीर्ति राज के शासनकाल में हुआ था, वहीं कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इस मंदिर को स्वयं भगवान शिव के आदेशानुसार भूतों द्वारा किया गया है। सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन यह अधूरा मंदिर अपने आप में बेहद ही अनोखा व अभूतपूर्व है। तो चलिए आज हम आपको ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण इस मंदिर के बारे में बता रहे हैं-

मध्यप्रदेश में है स्थित

यह मंदिर मध्यप्रदेश के सिहोनिया गांव में स्थित है (सिहोनिया को पहले सिहपण्य नाम से भी जाना जाता था)। यह भगवान भूतनाथ अर्थात् शिव को समर्पित है। यह मंदिर काफी हद तक ध्वस्त हो चुका है, लेकिन इसके अवशेष साफतौर पर इस बात की गवाही देते हैं कि अपने समय में यह कितना भव्य रहा होगा।  इस मंदिर की विशेषता इसी बात से पता चलती है कि पूरे राज्य में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में यह यह गांव अपने इस मंदिर के कारण ही जाना जाता है। भले ही आज यह मंदिर काफी हद तक ध्वस्त हो चुका है, लेकिन फिर भी इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

कुछ ऐसा है मंदिर

मंदिर की उंचाई लगभग 100 फीट है और इस मंदिर में बेहतरीन नक्काशी की गई है। मंदिर पर की गई नक्काशी की शैली खजुराहो के मंदिर की नक्काशी से काफी हद तक मिलती-जुलती है। दीवारों पर आपको कई देवी-देवताओं की खूबसूरत मूर्तियां देखने को मिलेगी। इस मंदिर में एक गर्भगृह भी है, जहां पर लोग आज भी भगवान शिव की उसी श्रद्धा से पूजा करते हैं। इसके अलावा, यहां पर दो मंडप भी है, जिसे मुख मंडप और गुढ़ा मंडप कहा जाता है। जैसे ही आपक मंदिर के मंच पर चढ़ते हैं तो आपको मुख मंडप नजर आता है, जो अब काफी हद तक ध्वस्त हो चुका है। इसके अलावा, पहले यहां प्रवेश द्वार की सीढ़ियों पर दो बड़ी शेर की मूर्तियाँ थीं, जो अब पुरातत्व संग्रहालय, ग्वालियर के प्रवेश द्वार पर स्थित हैं। इतना ही नहीं, यहां पर स्थित कई अन्य मूर्तियों को भी ग्वालियर ले जाया जा चुका है। वहीं मंदिर के अंदर गर्भ गृह के बाहर गुढ़ा मंडप स्थित है।

11 वीं सदी में हुआ था निर्माण

इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में कच्छपघाट शासक कीर्तिराज ने करवाया था। मंदिर एक उंचे मंच पर बना हुआ है। कुछ वर्षों पहले तक मंदिर कई छोटे-छोटे मंदिरों से घिरा हुआ था। हालांकि, अब यह छोटे-छोटे मंदिर यहां स्थित नहीं हैं, लेकिन फिर भी उनकी निशानियों को यहां पर साफतौर पर देखा जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि राजा कीर्तिराज की रानी ककनावती की भगवान शिव की अटूट श्रद्धा थी और उनके कहने पर ही इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था और इसलिए इस मंदिर को भी रानी ककनावती के नाम पर ककनमठ नाम दिया गया।

नाम को लेकर कई कहानियां है प्रचलित

यूं तो ककनमठ मंदिर मध्यप्रदेश का एक बेहद ही प्रचलित मंदिर है, लेकिन इस मंदिर के नाम को लेकर कई तरह की किदवंतियां हैं। जहां कुछ लोग यह मानते हैं कि इस मंदिर का नाम राजा की पत्नी के नाम पर रखा गया। हालांकि, इस किंवदंती की ऐतिहासिकता को लेकर लोगों में संदिग्धता है। एक संभावना यह भी है कि मंदिर का नाम कनक अर्थात् सोना और मठ यानी मंदिर से लिया गया है।

भूकंप में हो गया क्षतिग्रस्त

बता दें कि मूल रूप से, साइट में एक मंदिर परिसर था, जिसमें चार सहायक मंदिरों से घिरा एक केंद्रीय मंदिर था। लेकिन, अब केवल केंद्रीय मंदिर के खंडहर खड़े हैं, इसकी बाहरी दीवारें, बालकनियाँ और इसके शिखर का एक हिस्सा गिर गया है। यह क्षति संभवतः भूकंप के दौरान हुई। मंदिर में एक स्तंभ शिलालेख है, जिसमें संस्कृत भाषा में एक दुर्गाप्रसाद द्वारा ककनमठ मंदिर के रिनोवेशन के बारे में लिखा गया है। यह स्तंभ शिलालेख डूंगरा (ग्वालियर के एक तोमारा शासक) के शासनकाल के दौरान देखना नामक एक तीर्थयात्री की यात्रा को रिकॉर्ड करता है। इस शिलालेख में बताया गया है कि देखना काका का पुत्र था, और नलपुरगठ का निवासी था।

यह कथा भी है प्रचलित

इस मंदिर से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा यह भी है कि किदवंती के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान शिव के आदेशानुसार हुआ था और उसे भूतों ने बनया था। भगवान शिव को भूतनाथ भी कहा जाता है और भूत-प्रेत उनकी पूजा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर को बनाने का कार्य भूतों को सौंपा गया था और उन्हें यह काम एक रात में पूरा करना था, लेकिन वह मंदिर का निर्माण करते-करते सुबह हो गई और इसलिए मंदिर का निर्माण कार्य अधूरा छोड़कर भूतों को वापिस जाना पड़ा। इसलिए, यह मंदिर आज तक पूरा नहीं बन पाया। मंदिर के शीर्ष पर एक बहुत भारी पत्थर रखा गया है, जिसका वजन कई टनों के बराबर है। जिसे देखकर यह कहा जा सकता है कि ऐसा करना किसी मनुष्य के लिए संभव नहीं था और इसलिए, यह कथा लोगों को अधिक सच्ची लगती है।

 

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