कभी निखिल मेरे घर खेलने आ जाता, कभी मैं उसके यहां चली जाती। एक दिन मैं निखिल के घर पर थी। हम दोनों खेल रहे थे। कमरे में उस समय टीवी चल रहा था, जिसमें कोई फिल्म आ रही थी, उसमें मार-धाड़ का सीन आ रहा था।
हीरोइन को कुछ गुंडे उठा कर ले जा रहे थे और उसे काफी परेशान कर रहे थे तभी हीरो आता है और सभी गुंडों को मार कर हीरोइन को बचा लेता है। मैं यह सब बड़े ध्यान से देख रही थी, तभी मैंने निखिल से कहा, ‘निखिल, कभी मुझे गुंडे उठा ले जाएं तो क्या तुम मुझे बचाने आओगे।’ यह सुनकर सभी हंस पड़े। उस समय तो मुझे समझ नहीं आया कि सभी क्यों हंसे थे, पर अब जब भी यह घटना याद आती है तो बहुत हंसी आती है। यही लगता है कि सचमुच बालमन कितना मासूम होता है।

2- मुझे गंजा बना दो
हम दो भाई-बहन हैं।दोनों की उम्र में साल-डेढ़ साल का ही अंतर है। बचपन से ही मेरा भाई शरारती किस्म का रहा है, जबकि मैं निहायत ही सीधी-सादी। भाई मुझे खेल-खेल में ही सही, खूब परेशान करता था। जब वह मेरी चोटी खींचता तो मुझे रोना आ जाता। घर-भर का लाड़ला होने के कारण मेरे भाई से कोई कुछ ज्यादा कहता नहीं था।

एक बार मैं अपने दादाजी के संग मंदिर गई। साथ में मेरा भाई भी था। दादाजी ने पहले भाई से पूछा कि उसने भगवान से क्या मांगा। उसने कहा कि ढेर सारी पढ़ाई। फिर उन्होंने मुझसे पूछा, ‘बेटे, बता तूने क्या मांगा भगवान से?’
‘दादाजी, मैंने भगवान से वर मांगा कि वे मुझे आपकी तरह गंजा बना दें।’
‘पर क्यूं, यह कैसा वरदान मांगा तूने?’ दादाजी ने अपने गंजे सिर पर हाथ फिराते हुए पूछा।
‘ताकि भैया मेरे बाल खींचकर मुझे परेशान न कर सके।’ मेरा भोला जवाब सुन दादाजी हक्के-बक्के रह गए और उन्होंने गोलू को डांट भी लगाई। सचमुच, ऐसा ही होता है बचपन।

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