एक संत प्रातःकाल भ्रमण हेतु समुद्र के तट पर पहुँचे। समुद्र तट पर उन्होंने एक पुरुष को देखा जो एक स्त्री की गोद में सिर रख कर सोया हुआ था। पास में शराब की खाली बोतल पड़ी हुई थी। संत बहुत दुःखी हुए। उन्होंने सोचा कि ये मनुष्य कितना तामसिक और विलासी है, जो प्रातःकाल शराब सेवन कर स्त्री की गोद में सिर रख प्रेमालाप कर रहा है।
थोड़ी देर बाद समुद्र से बचाओ, बचाओ की आवाज आई,
संत ने देखा एक मनुष्य समुद्र में डूब रहा है, मगर स्वयं तैरना नहीं आने के कारण संत देखते रहने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे।
तभी स्त्री की गोद में सिर रख कर सोया हुआ व्यक्ति उठा और डूबने वाले को बचाने हेतु पानी में कूद गया।
थोड़ी देर में उसने डूबने वाले को बचा लिया और किनारे ले आया।
संत विचार में पड़ गए कि इस व्यक्ति को बुरा कहें या भला। वे उसके पास गए और बोले- भाई तुम कौन हो, और यहाँ क्या कर रहे हो..?
उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- मैं एक मछुआरा हूँ। आज कई दिनों बाद समुद्र से मछली पकड़ कर प्रातः जल्दी यहाँ लौटा हूँ। मेरी माँ मुझे लेने के लिए आई थी और साथ में (घर में कोई दूसरा बर्तन नहीं होने पर) इस मदिरा की बोतल में पानी ले आई। कई दिनों की यात्र से मैं थका हुआ था और भोर के सुहावने वातावरण में पानी पी कर थकान कम करने माँ की गोद में सिर रख कर ऐसे ही सो गया।
संत की आंखों में आंसू आ गए कि मैं कैसा मनुष्य हूँ, जो देखा उसके बारे में मैंनें गलत विचार किया, जबकि वास्तविकता अलग थी।
ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–Anmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)
