tap ka phal
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Hindi Katha: एक बार देवी उमा एक शिला पर बैठी हुईं भगवान् शिव का चिंतन कर रही थीं कि तभी उन्हें एक बालक का भयग्रस्त स्वर सुनाई दिया, जो सहायता के लिए पुकार रहा था। उसकी पीड़ित पुकार सुनकर वे उसे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते एक सरोवर के तट पर पहुँची। वहाँ उन्होंने देखा कि एक भयानक और विशाल ग्राह (मगरमच्छ) एक बालक को अपनी ओर खींच रहा है और वह बालक भय से काँप रहा है। यह देख देवी पार्वती का मन अत्यंत दुखी हो गया और वे उससे प्रार्थना करते हुए बोलीं ‘ग्राहराज ! यह बालक अत्यंत निर्बल और अपनी रक्षा करने में असमर्थ है। इसे मारना तुम्हें शोभा नहीं देता । तुम इसे छोड़कर कोई दूसरा भोजन ढूँढ़ लो। “

ग्राह बोला – ” देवी ! प्रति छठे दिन जो प्राणी सबसे पहले मेरे पास आ जाता है, उसी को विधाता ने मेरा भोजन निश्चित किया है। आज ब्रह्माजी द्वारा प्रेरित यह बालक मेरे पास आया है, इसलिए मैं घर आए भोजन को किसी प्रकार नहीं छोड़ सकता।” यह कहकर वह ग्राह पुनः बालक को अपनी ओर खींचने लगा।

देवी पार्वती पुन: करुण स्वर में बोलीं- ” ग्राहराज ! यदि तुम इसे छोड़ दो तो मैं तुम्हारी कोई भी एक इच्छा पूर्ण करने को तैयार हूँ। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, निःसंकोच कहो। मैं वचन देती हूँ, उसे अवश्य पूर्ण करूँगी।”

ग्राह बोला “हे देवी! यह बालक मेरा भोजन है, लेकिन आपकी प्रार्थना पर मैं इसे छोड़ सकता हूँ। किंतु इसके लिए आपको अपने तप का फल मुझे प्रदान करना होगा । “

बालक की रक्षा के लिए देवी पार्वती ने अविलम्ब अपने तप का फल ग्राह को प्रदान कर दिया। इससे वह ग्राह सूर्य की भाँति प्रकाशित हो उठा। उसकी ओर देखना कठिन हो गया। तब ग्राह विस्मित होकर देवी पार्वती से बोला ” देवी ! तुमने यह क्या किया? तपस्या का उपार्जन बड़े कष्ट से होता है, इसलिए बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी उसका परित्याग करने का साहस नहीं कर पाते। तुम अपने तप का फल वापस ले लो। साथ ही मैं इस बालक को भी छोड़ देता हूँ। ‘

देवी पार्वती बोलीं – “ग्राहराज ! तपस्या मैं पुनः कर सकती हूँ, किंतु इस बालक को पुन: जीवन नहीं मिल सकता। मैंने भली-भाँति विचार करके ही इसकी रक्षा की है। ग्राहराज ! तपस्या वापस लेने का प्रश्न ही नहीं उठता, . क्योंकि सचित्त मनुष्य अपनी दी हुई वस्तु कभी वापस नहीं लेते। इसलिए आप इस तपस्या से सुशोभित रहें और इस बालक को छोड़ दें। “

तभी वह ग्राह और बालक अदृश्य हो गए और उनके स्थान पर भगवान् शिव प्रकट होकर बोले “देवी ! तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ही मैंने यह लीला रची थी। तुम वास्तव में मेरे योग्य हो। तुमने अपनी तपस्या मुझे समर्पित की है, इसलिए वह तप सहस्र गुना होकर तुम्हारे लिए शाश्वत हो जाएगा । ” इस प्रकार उत्तम वर पाकर देवी उमा अत्यंत प्रसन्न हुईं और अपने स्वयंवर की प्रतीक्षा करने लगीं।