भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
गोविंद गंज के पुर-रौनक बाजार में क्रिश्चियन स्कूल के सामने, कमल की किताबों की दुकान है। कमल की उम्र चालीस से पैंतालीस साल के लगभग होगी। उसका सिर्फ एक हाथ है। बायाँ हाथ एक हादसे में जख्मी हो जाने की वजह से काट दिया गया था। दुकान खोले हुए उसे ज्यादा अरसा नहीं हुआ है, लेकिन उसने अपने अच्छे अखलाक की वजह से खासी तरक्की कर ली है। सामने के स्कूल में पढ़नेवाले लड़के-लड़कियाँ उसे कमल अंकल कहकर पुकारते हैं। कमल की दुकान पर सुबह से शाम तक बहुत-से लड़के-लड़कियाँ कुछ-ना-कुछ खरीदने आते हैं। लेकिन न जाने क्यों एक लड़की की शक्ल बार-बार उसकी निगाहों के सामने आ जाती है। उसका रंग गोरा. जिस्म दबला-पतला और उम्र 12 या 13 साल की होगी। दुकान में आगे रखे हुए शो-केस के अंदर सजे हुए कलम के डिब्बों में से एक सुनहरे कलम की कीमत वह लड़की तीन बार पूछ चुकी थी और हर बार हसरत भरी नजरों से कलम को ताकती हुई चली जाती थी। कमल ने उससे यही अंदाजा लगाया था कि उस लड़की के माँ-बाप बहुत गरीब होंगे। कितनी दुश्वारी से वह उसे तालीम दिला रहे होंगे। तभी तो वह यह कलम खरीद नहीं सकी। कमल ने अपने दिल में इरादा कर लिया कि अगर अब वह लड़की दुकान पर आ गई तो वह उसे बगैर रुपयों के कलम दे देगा।
एक दिन फिर वह लड़की दुकान पर आ गई। कमल ने उसे देखते ही उसका पसंदीदा सुनहरा कलम निकाला और उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, “तुम्हें यह कलम बहुत पसंद है?”
“जी…” वह कुछ शर्माते, कुछ हिचकते हए बोली।
“लो, तुम इसे कमल अंकल की तरफ से रख लो।”
लड़की की आँखों में खुशी की एक चमक-सी लहराई और उसने झिझकते हुए अपना हाथ बढ़ा दिया।
“ले लो बेटी, और खूब मेहनत से पढ़ो-लिखो।”
लड़की ने कलम ले लिया और चली गई। कमल को उस लड़की को कलम देकर एक अनजानी खुशी का एहसास हुआ। दूसरे दिन वह लड़की छुट्टी होने पर फिर कमल की दुकान पर आई और उसका दिया हुआ कलम शो-केस पर रख दिया, फिर बोली, “कमल अंकल, यह कलम रख लीजिए।”
कमल ने हैरत से उसकी तरफ देखा, “क्यों…? तुम्हें तो यह कलम बहुत पसंद था?”
“मेरी माँ ने कहा है कि इस तरह कोई चीज लेने का हक उसे है, जिसका इस दुनिया में कोई ना हो। मेरी माँ ने मुझसे वादा किया है कि अगले हफ्ते वह मुझे रुपए देंगी। फिर मैं यह कलम खरीद कर ले जाऊँगी।”
कमल कुछ नहीं बोला। उसने कलम उठाकर शो-केस में रख दिया। फिर लड़की से पूछा, “बेटी, तुम्हारा नाम क्या है?”
“अमीना….”
“किस क्लास में पढ़ती हो?”
“आठवें में।”
“तुम्हारे पापा क्या करते हैं?”
“मेरी माँ बताती हैं कि जब मैं चार साल की थी तो जलालाबाद से काँट आते हुए मेरे पापा को किसी ने गोली मार दी थी।”
“ओह….!” कमल के मुँह से निकला, “तुम्हारे पापा का क्या नाम था?”
“अनवर…”
कमल गौर से अमीना का चेहरा ताकने लगा।
“अब तुम लोगों का खर्च कैसे चलता है?” उसने पूछा।
“मेरी अम्मी रात-दिन सिलाई करके जो कुछ कमाती हैं, उसी से घर चलता है।”
कमल फिर कुछ नहीं बोला। न जाने किन ख्यालों में खो गया।
तीसरे दिन अमीना कमल की दुकान पर आई और पाँच रुपए बढ़ाते हुए बोली, “अब मुझे वह कलम दे दीजिए।”
कमल ने कलम निकालकर अमीना को दे दिया। अमीना का चेहरा खुशी से खिल उठा।
कमल ने कहा, “बेटी एक बात कहूँ?”
“कहिए…”
“मैं किसी दिन तुम्हारे घर आना चाहता हूँ।”
“जरूर आइए…” अमीना खुश होते हुए बोली, “मैंने अपनी माँ को आपके बारे में सब कुछ बता रखा है। वह आपसे मिलकर बहुत खुश होंगी।”
फिर कमल ने अमीना से उसके घर का पता पूछ लिया।
कई दिन गुजर गए। एक दिन छुट्टी थी। बाजार बंद था तो कमल अमीना के बताए हुए पते पर घर पहुँच गया और दरवाजे पर दस्तक दी। अमीना बाहर आई और कमल को देखकर खुश हो गई।
“आ गए, कमल अंकल…?” इतना कहकर वह अंदर चली गई। जरा देर बाद अमीना की माँ दरवाजे पर आ गई। अमीना भी उनके साथ थी। अमीना की माँ बोली, “अमीना आपकी बहुत तारीफ करती है।”
“बड़ी प्यारी बच्ची है…” कमल ने अमीना की तरफ देखते हुए कहा, “पता नहीं मुझे इससे इतनी उन्सियत (लगाव) क्यों हो गई है। जिस दिन यह स्कूल नहीं आती है, मुझे अच्छा नहीं लगता है। फिक्र हो जाती है।”
“दरअसल उसे बाप का प्यार नहीं मिला। आप उससे बेटी कहकर बात करते हैं, इसलिए आपसे घुल-मिल गई है।”
“आप ठीक कहती हैं। अमीना से मुझे आपकी दर्द भरी कहानी मालूम हुई, तो मुझे आप लोगों से दिली हमदर्दी पैदा हो गई।”
“आपका बहुत-बहुत शुक्रिया वरना इस जमाने में किसी से सच्ची हमदर्दी की उम्मीद रखना बेमानी है”, अमीना की माँ संजीदगी से बोलीं।
“आप मुझे अपना समझें। कभी कोई परेशानी हो, या मदद की जरूरत पड़े तो अमीना से मुझे बुलवा लीजिएगा।” इतना कहकर कमल चला गया।
उस दिन से अमीना रोजाना कमल की दुकान पर आने लगी। वह कमल से खूब घुल-मिल गई। उसके बाद कमल कई बार अमीना के घर भी गया। अमीना की माँ भी कमल का बहुत ख्याल रखती थीं और घर के एक फर्द (सदस्य) की तरह उससे सलाह व मशवरा करती थीं।
एक दिन अमीना की माँ कमल से बोली, “भैया आज तक मेरी एक बात समझ में नहीं आई कि शरीफ और ईमानदार लोगों के घर तबाह करनेवाले पापी ऊपरवाले से क्यों नहीं डरते? बल्कि वह खूब फलते-फूलते हैं, जबकि वह भयानक सजा के हकदार होते हैं।”
“ऊपरवाले के खेल निराले होते हैं, बहन। उसके राज हम तुम जैसे लोग नहीं समझ सकते।”
“आप शायद ठीक कहते हैं,” अमीना की माँ बोली, “लेकिन मैं अपने शौहर की अजीयतनाक (यातनापूर्ण) मौत कभी नहीं भूल सकती। वह जलालाबाद की तहसील में क्लर्क थे। रोजाना काँट से जलालाबाद जाते थे। उनकी सब इज्जत करते थे क्योंकि पूरी तहसील में सिर्फ वही एक ऐसे आदमी थे, जो सिर्फ अपनी तनख्वाह में गुजारा करते थे। उन्होंने रिश्वत के पैसे से कभी अपने हाथ गंदे नहीं किए। जलालाबाद के पुराने जमींदार का पोता अनिल भी उनकी बहुत इज्जत करता था। अकसरो-बेशतर उसके तहसील के काम वही करते थे। वह अनिल के घर भी जाते थे। अगर कुछ दिन नहीं जाते तो वह उन्हें बुलवा भेजता। लेकिन वह अनिल को पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वह खराब सोहबत में पड़ गया था। उसने अपनी बहुत-सी जमीन बेचकर जुए और शराब में खत्म कर दी थी। एक दिन मेरे शौहर घर आए तो बहुत परेशान थे। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया, अनिल का आज मैंने वह रूप देख लिया, जो कभी सोच भी नहीं सकता था। अब तक मैं समझता था कि वह बाप-दादा की दौलत जुए और शराब में उड़ा रहा है। मगर आज पता चला कि उसने नशा-आवर चीजों का धंधा भी शुरू कर रखा है। जिसके इस्तेमाल से हमारे मुल्क के नौजवान तबाहो-बर्बाद हो रहे हैं। इत्तिफाक से आज मैं उससे मिलने गया तो वह दूसरे कमरे में किसी से बातें कर रहा था। उसे मेरे आने की खबर नहीं हुई। उसके अल्फाज मैंने सुन लिए। वह कह रहा था- ‘इस बार दस लाख का माल लेकर तुम्हें आज रात की गाड़ी से दिल्ली जाना है। लेकिन ध्यान रहे पुलिस बहुत चौकन्नी है। हर हाल में उसकी नजरों से माल बचाकर ठिकाने पर पहुँचाना है।’ यह सुनते ही मैं वहाँ से अपने एक दोस्त के घर पहुंचा और पुलिस को अपना नाम बताए बगैर मुत्तिला (सूचित) कर दिया। पुलिस यकीनन अनिल के आदमी से माल बरामद कर लेगी। लेकिन मुझे डर है कि अनिल को अगर मुझ पर शक हुआ तो वह कहीं मेरा दुश्मन ना हो जाए।’ आखिर वही हुआ। अनिल का आदमी और माल पुलिस ने स्टेशन पर पकड़ लिया। तीसरे दिन जलालाबाद से काँट आते हुए किसी नामालूम आदमी ने मेरे शौहर को गोली मार दी। एक ईमानदार आदमी का इस तरह कत्ल देखकर लोगों ने पुलिस पर बहुत दबाव डाला। लेकिन कोई सुबूत ना होने की वजह से उनके केस की फाइल बंद कर दी गई। मैंने इसलिए जुबान नहीं खोली कि कहीं अनिल मेरा और अमीना का भी दुश्मन ना हो जाए। कुछ दिन मैं खौफ के साए में काँट में रही गई। फिर शाहजहाँपुर आ गई। एक मकान किराए पर लेकर मेहनत से अपना और अमीना का पेट पालने लगी।”
कमल बिलकुल खामोश बैठा अमीना की माँ से उसकी दुख भरी कहानी सुन रहा था। वह चुप हुई तो कमल एक ठंडी साँस लेकर बोला, “जालिम को भगवान कभी माफ नहीं करता। उसे उसकी सजा इस दुनिया में ही भुगतनी पड़ती है।”
“उसे अब सजा मिले ना मिले, मेरा सुहाग तो वापस नहीं आ सकता…” अमीना की माँ के सूखे जख्म फिर से हरे हो गए थे। उनकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
“तुम रोओ मत…” जज्बात से बेकाबू होकर कमल के मुँह से निकला, “आज से तुम मेरी छोटी बहन हो और मैं तुम्हारा भाई। मैं जब तक जिंदा रहूँगा, एक भाई का हक अदा करता रहूँगा।”
कमल के अपनाइयत से भरे अल्फाज सुनकर अमीना की माँ खुद पर काबू न रख सकीं और सिसक-सिसककर रो पड़ीं। कमल की भी आँखें भीग गईं।
अमीना की माँ आलिया को बहन कह देने के बाद कमल पूरी तरह अपनी जिम्मेदारी निभाने लगा। वह उन्हें परेशान नहीं देखना चाहता था।
एक दिन आलिया ने कमल से पूछा, “भैया तुम्हारे हाथ में ऐसा क्या हो गया था, जो काट दिया गया?”
“बहन एक दर्द भरी कहानी इस हाथ से जुड़ी हुई है।”
“कैसी कहानी…?” आलिया ने सवालिया नजरों से कमल की तरफ देखा।
“मैं किसी दिन फुरसत से सुनाऊँगा।”
वक्त गुजरता रहा। अमीना ने दसवीं पास कर लिया था। अब आलिया को अमीना की शादी की फिक्र थी। रात-दिन मेहनत करके जैसे-तैसे चंद जेवरात और कपड़ों का बंदोबस्त तो आलिया ने कर लिया था। वह चाहती थी कि अमीना की शादी हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी खत्म हो जाए। अकेला दम रह जाएगा उसको वह किसी न किसी तरह ढो लेंगी।
कुछ महीनों बाद एक जगह से अमीना का रिश्ता आ गया। आलिया ने कमल से लड़के और घर-बार के बारे में मालूमात करने को कहा। कमल ने लड़का देखा। लड़का कुबूल सूरत था। आमदनी भी मुनासिब थी। उसकी सिलाई की दुकान थी। अच्छी चलती थी। घर के लोग भी ठीक थे। कमल ने आलिया को सारी बात बता दी और अपनी पसंदीदगी भी। आलिया ने लड़के वालों को जबान दे दी। अब आलिया रात-दिन फिक्रमंद रहने लगी।
एक दिन कमल ने आलिया से पूछा, “तुम मुझे परेशान दिखाई देती हो। क्या बात है? बहन को भाई से कोई बात नहीं छिपानी चाहिए।”
आलिया ने सब कुछ कमल को साफ-साफ बताते हुए कहा, “अमीना के लिए जो कुछ भी मुझसे हो सका मैंने किया, मगर फर्नीचर और खाना वगैरा के लिए रुपए की जरूरत है। उसकी फिक्र है।”
“मेरे होते हुए तुम क्यों फिक्र करती हो? देखना अमीना का ब्याह बहुत धूम-धाम से होगा।”
आलिया ने कमल की तरफ देखा और उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह दिल ही दिल में सोच रही थी कि दुनिया कभी अच्छे लोगों से खाली नहीं रही। गरीबों की मदद के लिए कोई-ना-कोई मसीहा आ ही जाता है।
अचानक आलिया ने कमल के हाथ पर निगाह डाली और बोली. “भैया तुमने अपने हाथ के कटने के बारे में बताने का वादा किया था। आज बताओ ना…”
कमल ने एक ठंडी साँस भरी और बोला, “बरसाती दिनों की एक तूफानी रात थी। तेज हवा के साथ मूसलाधार बारिश हो रही थी। मैं अपने पुराने आबाई (पुश्तैनी) मकान के एक कमरे में अपनी बीवी और तीन साल की बेटी के साथ सो रहा था कि अचानक मेरे कमरे की छत गिर गई। मेरी बीवी और बेटी उसी में दबकर मर गईं। मुझे मोहल्ले वालों ने निकाला तो मेरी साँसे चल रही थीं। लेकिन मेरा हाथ बुरी तरह कुचल गया था। मुझे अस्पताल पहुंचाया गया। मैंने पानी की तरह रुपया बहाया कि मेरा हाथ बच जाए। लेकिन बेसूद (कोई लाभ नहीं)। डॉक्टरों ने जहर फैलने के अंदेशे में उसे काट दिया।” कहते-कहते कमल रो पड़ा, “एक बात और सुन लो जो बताना बहुत जरूरी है…”
“नहीं भैया, अब आगे कुछ मत कहो। वाकई तुम्हारे साथ बड़ा हादसा हुआ है।”
“नहीं बहन यह हादसा नहीं, कुदरत की तरफ से मुझे सजा दी गई है। और यह सजा इसलिए दी गई है कि मैंने एक ईमानदार और शरीफ इंसान का घर बर्बाद कर दिया था। जानती हो किसका…? अनवर का, जिसे मेरे ही आदमी ने मेरे इशारे पर गोली मारी थी, जिसकी सजा मैं आज तक भुगत रहा हूँ।”
“लेकिन वह तो अनिल था जिसने…” आलिया जुमला अधूरा छोड़कर उसकी तरफ देखने लगी।
“मैं ही अनिल हूँ। मैंने जब अपना घर छोड़ा, तो नाम भी बदल डाला। मैं उस नाम से नफरत करने लगा था। अगर हो सके तो बहन मुझे माफ कर दो ताकि मैं बहुत बड़े बोझ से आजाद हो जाऊँ…” कमल की निगाहें एहसासे-जुर्म से झुकी हुई थीं।
कुछ देर बाद उसने निगाहें ऊपर उठाई तो वह काँप उठा। आलिया का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था। फिर आलिया की आवाज उसके कानों से टकराई, “…तो तू ही वह नाग है जिसने मेरे शौहर को डसकर मुझे दर-बदर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर किया। लेकिन तुमने यहाँ भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा और भाई का नाटक रचाकर आ पहुँचे। मैं तुम्हारा मनहूस चेहरा नहीं देखना चाहती है। तम फौरन मेरे घर से चले जाओ और कभी इधर का रुख ना करना।”
कमल की आँखों से आँसू बहने लगे। फिर वह चुपचाप दरवाजे की तरफ बढ़ गया। रास्ते में वह सोचता जा रहा था कि आलिया ने उसके साथ जो कुछ किया, वह उसी के काबिल था। भला अपने सुहाग को मिटानेवाले को वह किस दिल से माफ करती। लेकिन उसे फिक्र थी कि अमीना की शादी करीब आ रही थी और आलिया के पास रुपया नहीं था। फिर अमीना का घर किस तरह बसेगा? यकायक उसकी निगाहों के सामने उसकी अपनी बेटी की छवि उभर आई। आज वह जिंदा होती तो इतनी ही बड़ी होती और उसकी शादी की तैयारी चल रही होती। एकबारगी उसके मुंह से निकला“अमीना की शादी जरूर होगी, धूमधाम से होगी…”
अमीना की शादी के दिन करीब आते जा रहे थे और आलिया की परेशानी बढ़ती जा रही थी। लेकिन उसे इस बात की खुशी थी कि बर वक्त (समय रहते) कमल की हकीकत मालूम हो जाने से उसका एहसान लेने से बच गई। वह अपनी लड़की को जिंदगी भर घर बिठा सकती थी लेकिन उसे कमल जैसे कमीन और जलील आदमी की मदद गवारा नहीं थी।
एक दिन वह यूँ ही ख्यालों में गुम थी कि किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। वह दरवाजे पर पहुंची तो एक अजनबी शख्स खड़ा था। आलिया के पूछने पर उसने बताया कि उसका नाम इकबाल है और वह अनवर का दोस्त है। काँट से आया है।
आलिया ने इकबाल को घर में बुला लिया। वह बहुत संजीदा आदमी लगता था। चंद लम्हें की खामोशी के बाद इकबाल ने आलिया को मुखातिब करते हुए कहा, “भाभी, मैं जिस वक्त काँट छोड़कर मुंबई गया था, उस वक्त आलिया गोद में थी। अब तो माशाअल्लाह जवान हो गई होगी। कहाँ है वह?”
“वह मोहल्ले में अपनी सहेली के घर गई है।”
“चलिए, दोबारा आऊँगा तो मिल लूँगा। इकबाल ने एक थैले से डिब्बा निकालते हुए कहा, “यह मिठाई उसे दे दीजिएगा।” फिर कुछ तवक्कुफ (विलंब) के बाद बोला, “भाभी अनवर का मुझ पर बहुत बड़ा एहसान है, जिसे मैं जिंदगी भर नहीं अदा कर सकता। मगर अफसोस कि वह आज इस दुनिया में नहीं। काश, मैं अपनी कामयाबी की कहानी सुनाता तो बहुत खुश होता।”
“आप शायद नहीं जानते कि उनकी मौत से हम माँ-बेटी पर मुसीबतों के कितने पहाड़ टूटे हैं।” |
“मुझे उसका एहसास है। वह बड़ा मुखलिस (निश्छल) इंसान था। बेकारी से तंग आकर जब मैं मुंबई जाने लगा तो उसने चलते वक्त मुझे दो हजार रुपए दिए थे और कहा था कि इन्हें किसी रोजगार में लगा लेना। अल्लाह चाहेगा तो तरक्की होगी। फिर किसी मौके पर आना तो वापस कर देना। मैं मुंबई चला गया। वहाँ किस्मत ने ऐसा साथ दिया कि मेरी पान की छोटी-सी दुकान आज बहुत बड़ी दुकान में बदल गई। अब मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं है। कई बार सोचा कि अनवर के रुपए भिजवा दूँ। मगर दिल ने कहा कि अपने हाथ से रुपए देना चाहिए। बरसों बाद वापस हुआ, पर यह हसरत दिल ही में रह गई।” यह कहते-कहते इकबाल की आवाज भर्रा गई।
कुछ देर रुककर वह बोला, “फिर मुझे आपकी तलाश हुई। मैंने लोगों से पूछा तो आपका पता मालूम हुआ और मैं सीधा यहाँ चला आया। अब अनवर की इस अमानत को आप सँभालिए, इकबाल ने जेब में हाथ डाला और दो हजार रुपए आलिया के हाथ में दिए, फिर बोला, “काँट में मुझे यह भी मालूम हआ कि अमीना की शादी होने वाली है। इसके लिए दो हजार मेरी तरफ से रख लीजिए और जो मेरे लायक काम हो, मैं अपने हाथों से करा कर जाऊँगा।”
फिर शादी का दिन आ पहुँचा। इकबाल ने अमीना की शादी में कोई कसर नहीं रखी। जब अमीना रुखसत होने लगी तो आलिया के साथ इकबाल के भी आँसू निकल आए। लेकिन उन दोनों के अलावा एक शख्स और रो रहा था जिसे किसी ने नहीं देखा। वह कमल था। अमीना के घर से कुछ दूर खडा सुबह से शादी का सारा मंजर देख रहा था। अमीना की रुखसती के बाद उसने एक गहरी साँस ली, भगवान का शुक्र अदा किया और दिल ही दिल में कहने लगा- “मेरे दोस्त इकबाल ने बड़ी खूबी से सारे काम को अंजाम दिया और मेरी अमीना इज्जत के साथ अपने ससुराल चली गई।”
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
