shekhachillee ka sapana, hitopadesh ki kahani
shekhachillee ka sapana, hitopadesh ki kahani

Hitopadesh ki Kahani : देवीकोट नगर में देवशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। बैसाख की संक्रान्ति के दिन उसको सत्तुओं से भरा एक सकोरा मिला। उस सकोरे को लेकर वह जा रहा था । चलते-चलते उसको धूप लगने लगी। वह आराम करने के लिए कुम्हार की कोठरी में जा कर बैठ गया। उस कोटरी में कुम्हार के बर्तन भरे हुए थे ।

उसके एक हाथ में सत्तू थे और उसकी रक्षा के लिए उसने दूसरे हाथ में डंडा ले लिया । यों बैठे-बैठे वह सोचने लगा कि यदि वह इस सकोरे को बेच दे तो उसको इसके बदले दस कौड़ियां मिल जायेंगी। उन कौड़ियों से वह बर्तन खरीद लेगा । उनको बेचकर जो धन मिलेगा उससे वह सुपारी आदि खरीद लेगा। फिर इसी प्रकार वस्त्र खरीद कर उसका व्यापार करेगा। यों सोचता-सोचता वह इस निष्कर्ष पर पहुंच गया कि तुरन्त ही एक समय ऐसा आएगा जब वह लखपति बन जायेगा।

लखपति बनते ही वह विवाह करेगा। विवाह भी एक नहीं चार-चार । उन चारों में से जो सबसे अधिक युवती और रूपवती होगी उससे वह अधिक प्रेम करेगा। यदि वे सौतनें इससे चिढ़कर परस्पर लड़ने लगेंगी तो मैं उनको इस प्रकार इस डंडे से पीटूंगा ।

यह सोचते ही उसने बड़ी जोर से अपने हाथ के डंडे को सत्तू के सकोरे पर मार दिया। सकोरा टूट कर चूर-चूर हो गया और सत्तू बिखर कर धरती पर फैल गए। न केवल इतना ही, डंडा एक दो बर्तनों पर भी पड़ा। वे टूटे तो उसके सहारे रखे कुछ अन्य बर्तन भी टूट गए। बर्तन टूटने की आवाज सुनकर कुम्हार उधर आ गया।

कुम्हार ने जब उसको देखा तो पीट-पीट कर उसने उसको वहां से भगा दिया। मन्त्री कहने लगा, “इसीलिए मैं कहता हूं कि शेखचिल्ली की भांति स्वप्न देखने वाले की ऐसो ही दुर्दशा होती है । “

तब राजा ने गीध से एकांत में कहा, “तात, जो करना हो वह शीघ्र बताइये । ” गीध बोला, “महाराज ! यह किला तो केवल आपके प्रताप से जीता गया है, हमने इसको नहीं जीता है।”

राजा बोला, “नहीं, यह एकमात्र आपके उपाय से ही जीता गया है । “

” तो मेरी बात मानिये और अब अपने देश को लौट चलिये। नहीं तो बरसात आ जाने पर यदि फिर युद्ध छिड़ गया तो फिर इस पराई धरती पर से हम लोगों को अपने देश लौटना भी कठिन हो जायेगा । इस लिये अच्छा यही है कि हम सन्धि करके अपने देश लौट चलें । किला जीत लिया है। हमें सुयश प्राप्त हो गया है। अपने इस सुयश को हमें बनाए रखना है। राजहंस भले ही पराजित हो गया हो किन्तु है तो वह हमारे समान ही बलवान । समबल के साथ युद्ध में विजय अनिश्चित रहती है । इस लिये सन्धि कर लेना ही उचित है तुल्य बल होते हुए भी क्या सुन्द और उपसुन्द नष्ट नहीं हो गये थे ? “

राजा ने पूछा, “यह किस प्रकार ?”

मन्त्री बोला, “सुनाता हूं महाराज ! सुनिये। “