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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

कुऽऽऽहू……कुऽऽऽहू……अंधियारे सन्नाटे को चीरती कोयल की सुरीली आवाज। रमा ने करवट ली। पंचम सुर से विचारों का सिलसिला टूटा। नींद नहीं टूटी। टूटती कैसे? आँखों से नींद ने दुश्मनी जो कर रखी है! सच है कहावत, ‘सबके पाका हा सुहाथे, आदमी के पाका ह नई सुहावय, कोनो ल!’ फल हों, साग-भाजी या अन्न। इनका पका हुआ रूप ही सबको भाता है, किंतु ‘आदमी’ का पकना, उसका वार्धक्य, बुढ़ापा किसे सुहाता है? बोझ बन जाती है वद्धावस्था। स्वयं के लिए। परिजन के लिए। रमा पक गई है। वह किसे सुहाती है? तब नींद से भी कैसी शिकायत? जा भई, तू भी किसी सपनीले नैनों में बस जा। दिखा उन्हें सुनहरे-रूपहले ख्वाब। ले जा किसी हरी-भरी घाटी में, चोटी में। देवदार हों। हिमाचल से झांकता चटख लाल गोला हो। चहचहाहट हो। तू जा। मुझे कोई शिकायत नहीं तुझसे। मुझे छोड़ दे। अकेली। मेरे साथ। असंग।

रमा का यह डेली रूटीन है। उसे तो अब यह भी याद नहीं कि देह में तकलीफ की शुरूआत कब से हुई थी, या यह भी कि कभी वह भली-चंगी भी हुआ करती थी। ऐसे भी दिन थे, जब उसके अंगों में दर्द नहीं रहा करता था। अब तो यारी हो चुकी है दर्द से। दर्द का रिश्ता। दिल से। देह से। अंग-प्रत्यंग से। स्थायी रिश्ता है यह। छूटता नहीं। छूट गया तो वह रिश्ता जिसे जीवन-भर का रिश्ता कहा जाता है। झूठ। कितना बड़ा झूठ है न यह! सोचती है रमा। जीवनसाथी। क्या अर्थ हैं इसके?

जीवन भर साथ देने वाला साथी? कितना गलत शब्द! एक गाँठ से बंधे दो राही हमराही जरूर होते हैं, किंतु एक राह पर चलते-चलते भी, दोनों अंत तक साथ कहाँ निभा पाते हैं? सारस जोड़ी भी बिछड़ती ही है। एक पहले। एक बाद में। भाग्यशाली है वह, जो पहले चला जाता है। दुर्भाग्य उसका, जो यमदूत के द्वारा छोड़ दिया जाता है धरती पर। रमा पर यम की नजर नहीं पडी। यम ने ही नहीं छोडा. पति ने भी छोड दिया। कितना रोई थी रमा। ऐसे कैसे बंधन तोड़ चले राजन के पापा? जीवन भर तो खटराग किया। दुनियादारी में फंसे रहे। शादी-व्याह के बाद बच्चे। बच्चों की परवरिश। फिर उनकी नौकरी-चाकरी और शादी-ब्याह। पोता-पोती भी हो गये। इन चक्कियों में ही तो पिसते रहे सदा। तम निन्यानवे की जगत में फंसे रहे और तम्हारे नाम की हल्दी जो मेरे हाथों में लगी थी, जीवन की खुरदरी परतों में जाने कब छीन गई। जाने कहाँ चला गया उसका रंग। पीला रंग उड़ा। लाल रंग भी दब गया। कहीं तहखाने में। घर-गृहस्थी ने मौका कहाँ दिया कि चंद सांसें, ‘जीवनसाथी’ बनकर, साथ-साथ ले सकें। एक हवा में। पुरवाई में। बयार में। बसंत में। सोचा था कि अब बुढ़ापे में सही, एक-दूजे के साथ, मिल-बांटकर यात्रा पर आगे बढ़ेंगे। पर तुम तो स्वार्थी निकले। निकल गये अकेले ही अनंत यात्रा पर। यह भी न सोचा कि मेरे पीछे बुढ़िया का क्या होगा? कैसे जीएगी यह!

…….आत्मालाप कर रही है रमा। कुछ दिन और भी तो दे सकते थे साथ! प्रश्न करते-करते रमा की आँखे आनायास ही डबडबा उठती हैं- नहीं राजन के पापा! अच्छा हुआ जो चले गये। बेबस तो नहीं हुए, अचानक ही परलोक सिधार गये। परलोक सुधारना भले न कहूँ, किंतु यह जरूर कहूंगी कि अपना इहलोक सुधार गये। न किसी का सहारा लिया। न किसी पर बोझ बने। न किसी को परेशान किया। न किसी की जेब पर भारी पड़े। बच्चे खुश। बहुएँ खुश। सबकी जुबान पर बस एक बात- “बड़े अच्छे थे पापाजी। किसी से सेवा नहीं कराई। पुण्यात्मा थे।” सचमुच। तुम पुण्यात्मा थे राजन के पापा। मुक्त हो गये। मैं ही फंसी रह गई संसार में। दलदल में। बहत्तर बरस की हो गई हूँ मैं। इसे ‘जुग जुग जीओ’ का वरदान समझू, या अभिशाप? वैसे क्या होती है यह लंबी उमर? टूट चुके दांत। झड चुके बाल। रोशनी खो चुकी आँख। सीस, पाँउ, धर कहूयो न मानत! देह अपनी। मस्तिष्क अपना। किंतु, सब कुछ अपने नियंत्रण से बाहर। सारा कंट्रोल-सिस्टम ध्वस्त। सही कहा कबीर ने, ‘जरा’ और ‘मृत्यु’ में कोई भेद नहीं। जीवनकाल में असामयिक ‘काल’ से अगर जिंदगी बच भी गई, ‘जरा’ से तो नहीं ही बच सकती। वृद्धावस्था मृत्यु की सखी है। अभिन्न। और मैं बिल्कुल अकेली, अबला। तिल-तिलकर मृत्यु की ओर सरक रही हूँ। तुम्हारी तरह भाग्यवान कहाँ?

हाऽऽऽऽय! कराह निकल जाती है रमा के मुँह से। मुआ दरद पीछा ही नहीं छोड़ता। नस-नस में घुस गया है। याद आ रही है वह शाम…पैथॉलॉजी लैब से रिपोर्ट का लिफाफा लेकर राजन घर में घुसा था। चेहरा काफी कुछ बयां कर रहा था। पापा के जाने के बाद राजन बहुत परेशान रहने लगा था। इसलिये नहीं कि पिता बिछड़ गये। इसलिए कि अब मम्मी की सार-संभाल उसे करनी होगी। राजेश अमेरिका में है, सो मम्मी की जिम्मेदारी उसकी। जब देखो तब, कोई न कोई बीमारी घेरे रहती है। कभी यहाँ दर्द, कभी वहाँ दर्द। कभी घुटना तो कभी कंधा। कभी कमर तो कभी पिंडली की ऐंठती मछलियाँ। और अब? यह रिपोर्ट! राजन ने चुपचाप रिपोर्ट का लिफाफा सिम्मी को धरा दिया था। सिम्मी ने बहुत धीमी आवाज में कहा था, अटकते शब्दों में….“मम्मी जी, यह रिपोर्ट सही नहीं है।” “क्या हुआ है बेटा? बोल न! क्या लिखा है डॉक्टर ने?” मम्मी जी, बोन कैंसर हुआ है आपको…. “पता नहीं क्या-क्या बोलती रही सिम्मी। मैं बस इतना जानती हूँ कि जब होश आया, मैं पलंग पर थी….ऊपर छत से लगा पंखा घर्र-घर्र की आवाज के साथ घूम रहा था…चक्कर दर चक्कर मेरे सर की तरह….मैं चीखना चाहती थी। परी शक्ति के साथ। नहीं। नहीं। नहीं। यह नहीं हो सकता। पर यह हो चुका था। नियति थी। नियति बदली नहीं जा सकती। राजन के पापा, तुम्हें जी भरकर कोसा था मैंने उस दिन। हाँ। जी भर कर। जीवन की हर पीड़ा को तुम संग भोगा था मैंने। इस विशाल पीड़ा को कैसे झेल सकूँगी अकेली? तम बिन। सचमच. मैं अब सहागन नहीं. अभागन हँ। दर्द कितना अकेली? तुम बिन। सचमुच, मैं था उस दिन देह में नहीं मालूम, मेघ जीभर के बरसे थे। तकिया भी रोता रहा रातभर, सुबक-सुबक कर। तर हो उठा!

तब से अब तक। बरस बीत गया है। कैंसर की तकलीफ। तमाम दवाएँ। थेरेपी। राजन व्यवस्थाएँ करता है, पर उसके चेहरे की लकीरें बता जाती हैं कि कट कर रह गया है भीतर से। अपने बंद कमरे में पड़ी-पड़ी, सुनने की चेष्टा में रहती हूँ, क्या चल रहा है घर में? राजन मुझसे ज्यादा बात करता नहीं, तो सिम्मी भी अपने में ही सिमटी रहती है। रानू और रानी मेरे पोते-पोती। इन्हें भी कमरे से बाहर रहने की सख्त हिदायत दे दी गई है। दादी की तबियत ठीक नहीं। उन्हें परेशान नहीं करना है। मुझे कमरे के पार कुछ दिख तो सकता नहीं, पता नहीं कैसे ईश्वर ने कानों को बख्श दिया है मेरे। आहटों के पैटर्न से जान जाती हूँ कि समय क्या हुआ होगा? कौन जा रहा है? कौन आ रहा है! झाडू। बर्तन। चौका। सब। राजन और सिम्मी का गृहस्थ-जीवन ठीक-ठीक चल रहा है। सिम्मी पढ़ी-लिखी, सुशिक्षित लड़की होकर भी ज्यादा महत्त्वाकांक्षी नहीं रही। उसने शुरू-शुरू में नौकरी की, फिर रानू के आने की सुगबुगाहट होते ही रिजाइन कर दिया। दोनों ने अपने बच्चों को अच्छा माहौल दिया। मैंने हल्की-फुल्की नोंक-झोंक के अलावा कभी कोई बड़ा झगड़ा दोनों के बीच नहीं देखा। किंतु, आजकल मैं अगर ठीक-ठाक थोड़ा भी सुन-समझ पा रही हूँ तो यह कि दोनों की तीखी आवाजें कमरे में गूंजती हुई, मुझसे टकरा ही जाया करती हैं। उसकी आवृत्ति भी बढ़ रही है। कभी राजन झल्लाता है, कभी सिम्मी चीखती है। एक शोर सा। क्या हो रहा है इन दिनों? मेरा कमरा हर वक्त बंद रहता है, बाहर की आवाजें सुनाई तो देती हैं, पर ठीक से समझ नहीं आतीं।

आज अचानक जैसे परदा उठ गया। कामवाली बाई ने पोछा लगाने के लिए कमरा खुला रख छोडा था, -“आखिर कब तक करती रहूंगी मैं यह सब? झन्नाटेदार आवाज ने कमरे से होते हुए, कानों को झकझोरा।” – “तुम तो निकल लेते हो रोज अपने काम पर, जब देखो बाहर। कभी देखा है कि घर कैसे संभलता है? रान-रानी का स्कल. टयशन होमवर्क। किचन। मेहमान और ऊपर से तुम्हारी मम्मी का रोग!” ….सिम्मी चीख रही थी पूरे दम के साथ! राजन फट रहा था… “तो क्या मैं भी घर पर बैठ जाऊँ तुम्हारी तरह? मम्मी का बहाना क्यों करती हो? क्या मैंने उन्हें रोग दे दिया है? मैं चाहता हूँ कि वे बिस्तर पर पड़ी रहें? मैं भी तो पक गया हूँ रोज-रोज की किचकिच से। दफतर, घर, अस्पताल के बीच फंस कर रह गया हूँ मैं। सबको अपनी पडी है। कोई मेरे बारे में सोचता तक नहीं..”

सन्न रह गई है रमा! तो यह है ऊँची आवाजों का राज। वह खुद ही फांस की तरह धंस गई है उनके जीवन में! हे ईश्वर! मैंने कब चाहा था, मुझे लंबी उमर मिले? कब चाहा था, यों घिसट-घिसट कर मरूँ? कब चाहा था, बिस्तर ही मेरा संसार हो जाए? कब चाहा था, बेटे के लिए अनचाही बन जाऊँ? कब? कब? कब? तूफान मच गया मन में। उठा लो ईश्वर मुझे। क्यों जीवन देकर जहर दे रहे हो प्रभु? राजन के पापा! सुन रहे हो? अपनी ही औलाद क्या कह रही है? पक गया है वह। मैं बोझ हो गई हूँ उसके लिए बोझ। बोझ। बोझ। आँखें बंद हैं। खोलने का मन नहीं हो रहा। आँखे गोमुख हो गईं….रिसती रहीं। जाने कब तक!

बहुत आराम-सा लग रहा है। एक हल्कापन। उड़ रही हूँ। पंख लग गए हों जैसे। बंद पलकों के भीतर ही देख रही हूँ सब कुछ। यह क्या? मैं कहाँ आ गई हूँ? यह तो मेरा घर नहीं। वह बिस्तर, वह पलंग, वह दीवार, वह दरवाजा, कुछ भी नहीं। मुंदी आँखों से ही जैसे सब कुछ स्पष्ट दिख रहा है। अरे रे! यह तो मैं हूँ, पलंग पर लेटी हुई। सफेद चादर से ढंकी है मेरी जर्जर काया। क्या मर गई हूँ मैं? नहीं, नहीं। यह शायद हॉस्पीटल का कमरा हैं। मेरे हाथ-पैर पलंग से जकड़ दिये गए हैं। मुँह पर ऑक्सीजन का मास्क लगा है। ढेरों-पाइप लगे हैं। मुँह में। नाक में। ड्रिप लगी है। नर्स हैं। राजन है। सिम्मी भी। राजन के दोस्त भी खड़े हैं मेरे इर्द-गिर्द। मैं सबके चेहरे देख रही हूँ। गमजदा। स्तब्ध। रूआंसे। माजरा समझ में आ रहा है मुझे। रोना। तनाव। स्ट्रोक। हॉस्पीटल। और अब? विरोधाभास। मुझे राहत मिलती है। सचमुच। यह देखकर। अपनी देह की हालत देख मुझे यह तो समझ आ गया है कि केस ‘क्रिटिकल’ है। राहत इस बात की, कि देखो अंतत:-इन्हें मम्मी की हालत देखकर रोना आ ही गया। दोनों अगर मेरी वजह से लड़ते हैं तो क्या हुआ? किसी पेशेंट को कितना संभाले कोई? कोई भी चिड़चिड़ा हो सकता हैं। मैंने माफ किया तुझे बच्चे। कोई बात नहीं। मेरे मन में अब कोई दुख नहीं है। कितना प्यार करता है राजन मुझसे। आखिर खून है मेरा। मेरी पीडा उसे क्यों नहीं दख देगी। हाय मेरा बच्चा। मत रोना बेटे। जाने का दिन तो सबका होता है। जो आया है सो जायेगा। राजा, रंक, फकीर। और माँ-बाप जीवन भर साथ कहाँ दे सकते है बेटा? पापा गये, अब मेरी बारी है। चाहती हूँ राजन को सीने से लगा लूं। चूम लूं। माथा सहला लूं। पीठ थपका लूं। परेशान न हो मेरे लाल। …….याद आ रहा है वह ऑपरेशन थियेटर, जब डॉक्टर ने उस नन्हे राजन को मेरे सीने से लगाकर कहा था- ‘लाल टमाटर हुआ है रमा, ले देख ले, कितना सुंदर है तेरा बेटा’ आँखों की कोर से बह निकला था पानी। हाय मेरा बच्चा। मेरा अंश। मेरा वंश। मेरी पहचान। दुनिया से जाने के बाद भी तुझमें जिन्दा रहूंगी मैं। मेरा आलय। मेरी आत्मा बसती है तुझमें! और देखते ही देखते, यह बित्ते भर का लाल टमाटर, देखो तो कैसा बरगद हो गया है आज। उसे मेरी नहीं, मुझे उसकी छाँव चाहिये। सुस्ताने को। चैन पाने को। मैं विभोर हो गई हूँ। और…

“देयर इज नॉट ए सिंगल होप मि. राजन! योर मदर इज सिंकिंग!…” डॉक्टर की आवाज थी यह।…“वे वेन्टीलेटर पर हैं, किंतु उनका यहाँ रहना बेमानी है। वे रिस्पांड नहीं कर रही हैं। सपोर्ट सिस्टम पर रखने का अब कोई मतलब नहीं हैं। आप चाहें तो इन्हें घर ले जा सकते हैं।”

राजन की फुसफुसाहट सुनाई दे रही है- “जी डॉक्टर साहब। आप जैसा कहें। अगर होपलेस केस है तो यहाँ रखना बेकार ही है…11 दिन तो हो ही गए…कब तक देखें..“देन ओ. के। मि. राजन। मैं यह व्यवस्था करवा सकता हूँ कि एम्बुलेंस आपकी मम्मी को घर तक पहुँचा दे, हम ऑक्सीजन के साथ उन्हें भेजेंगे। आप अपनी मम्मी को वहीं मतलब अपने घर में गंगाजल पिला सकते हैं। ठीक है?”

राजन ‘हाँ’ में सर हिला रहा है और मैं बेसुधी में भी अवाक हूँ। राजन की बात मैं सुन चुकी हूँ, मतलब मैं पिछले 11 दिनों से कोमा में रही? चिल्लाना चाहती हूँ कि नहीं बेटा नहीं ……अनर्थ हो जाएग। मेरा दम घुट जाएगा। मुझे इस तरह मत मार। मेरी सांसे मजबूत होने को हैं, बस थोड़ा इंतजार। छटपटा रही हूँ, पर हाथ-पैर डुला नहीं पाती। राजन, बेटा राजन! सुन तो! पर, कैसे सुने वह मेरे अबोले बोल? नहीं सुनता। नहीं ही सुनता। मेरी तैयारी होने लगी है। अस्पताल छोड़कर घर जाने की। या, संसार छोड़कर ऊपर जाने की? एक सिस्टर कमरे में आई है। उसने मझे चेक किया है। श्वांसें चल रही हैं। पलकें खलवाने की चेष्टा में चिमट भी दिया है उसने मेरी चमड़ी को। किंतु बेजान, बेसुध शरीर में ताकत नहीं कि कुछ प्रतिक्रिया दूं। बता सकूँ कि मरी नहीं। अभी मरने वाली नहीं। जिंदा हूँ मैं। “आप नीचे आ जाइये सर, बिल तैयार हो रहा है, पेमेंट कर दीजिए, फिर डिस्चार्ज कर देंगे इन्हें।” –सिस्टर ने कहा। राजन ने ‘बस दस मिनट’ की मोहलत मांगी है। दस मिनट क्यों? अच्छा-अच्छा। सामान समेटना होगा! पर यह क्या?

राजन अपने मोबाईल पर कुछ वॉईस टायपिंग कर रहा है। श्रीमती रमा मिश्रा पत्नी श्री गजानन मिश्रा का आकस्मिक निधन आज दिनांक 13 अक्टूबर 2020 को हो गया है। उनका अंतिम संस्कार मारवाड़ी श्मशान गृह में 14 अक्टूबर 2020 को दोपहर बारह बजे किया जायेगा। श्रीमती रमा मिश्रा सेवानिवृत्त व्यावख्याता थीं। वे राजन मिश्रा, राजेश मिश्रा की माता, सीमा मिश्रा की सास एवं रानू-रानी की दादी थी…

राजन के एक-एक शब्द पिघले सीसे की मानिंद उतर रहे हैं कानों में। गमगीन, उलझे हुए राजन का मुखड़ा देख मेरे भीतर अभी-अभी संवेदना, वात्सल्य, भावनाओं का जो ज्वार उमड़ा पड़ा था …..पीछे खिसक गया है। छोड़ गया है कीचड़। सडांध। तुम इसलिए दुखी नहीं थे बेटे कि अनाथ होने वाले हो, इसलिए दुखी थे कि जाने कब तक मम्मी का बोझ सर पर रहेगा! तुम्हें मुझे बचाने की नहीं, स्वयं को ‘झमेलों’ से बचाने की चिंता थी और अब डॉक्टर द्वारा वेन्टीलेटर हटाने की सलाह ने ही तुममें नया जोश भर दिया है। छुट्टी चाहिये तुम्हें। अधीरता इतनी कि तुम्हें मेरी चंद सांसें भी भारी हैं। हड़बड़ी इतनी कि चार लाईन के प्रेसनोट के लिए, मेरे मरने तक का इंतजार असहाय है। तुम्हारी बेचैनी, तुम्हारी उमंग। वैसे बेटा, बिल्कुल यही मनः स्थिति मेरी तब थी, जब तुम मेरी कोख में अपने दिन पूरे कर रहे थे। ऐसा ही अस्पताल था। ऐसे ही डॉक्टर थे। मेरी देह दर्द की लहरों के थपेड़े खा रही थी, लगता था प्राण ही निकल जाएंगे, पर तुम्हारा मुख देखने की उत्कट इच्छा ने थाम रखा था मुझे। तब मैं अधीर थी तुम्हारा जन्म देखने को। आज तुम अधीर हो मेरी मृत्यु देखने को। यही है जन्म-मृत्यु का कोमल-कठोर-क्रूर सच। समय-समय का खेल है! माया महाठगनी हम जानी!

रात के बारह बज गए हैं। मुझे हॉस्पीटल से बाहर लाकर एम्बुलेंस में लिटा दिया गया है। ऑक्सीजन मास्क लगा हुआ है। मैं छटपटा रही हूँ भीतर ही भीतर। हे ईश्वर! कैसी परीक्षा में डाला है तूने? शरीर पूरी तरह शिथिल है, निष्क्रिय। उस पर मेरा वश नहीं, किंतु चेतना एकदम जीवंत हैं। सब कुछ जान-समझ पा रही हूँ मैं। दुनिया के लिए मैं कोमा में हूँ । मरणासन्न। किंतु निश्चल देह के भीतर प्राणवान हूँ। बेसुधी में हूँ। वे बेसुध नहीं। एंबुलेंस चल रही है। हिल रही है। हिला रही है मुझे। एक बेसुधी छा रही है। गहरा काला अंधकार लपेट रहा है मुझे। मेरा वक्त निकट आ रहा है। सही कहा है डॉक्टर ने। होपलेस केस। पर, क्या होगा तब, जब घर पहुँचते ही, मृत्यु से पहले ही, मुझसे ऑक्सीजन का सहारा छीन लिया जाएगा? दम नहीं घुट जाएगा मेरा? माना कि अब जीना नहीं चाहती। निर्मोही संसार से जी ऊब गया है अब। किंतु ऐसे मरना? कांप उठती हूँ मैं। मत मारो मुझे…मत करो मेरी हत्या…थोड़ा धीरज धरो बेटे…रहम करो…। और.. मैं कहाँ जा रही हूँ? अंधेरा…अंधेरा…अंधेरा…

आँखें खुल गई हैं मेरी। तेज रोशनी है। अच्छा! तो अब मैं मर चुकी हूँ। पढ़े थे न मृत्यु से वापसी किये लोगों के कुछ-कुछ अनुभव किताबों में; देह का मरना, आत्मा का ऊपर उठना। सुरंग। तेज प्रकाश। मतलब, मैं परलोक में आ गई। चलो मुक्ति मिली। पर यह क्या? यहाँ शांति की जगह शोर कैसा? अरे! यह तो जानी-पहचानी जगह है। अपना घर। अपनी दीवार। दीवार पर टंगी घड़ी। घड़ी में टिक-टिक। ग्यारह बजे हैं। कुछ समझ नहीं आ रहा। मैं घिरी हूँ भीड़ से। अड़ोसी-पड़ोसी, रिश्तेदार और राजन-सिम्मी के चिर-परिचित। खुसफुसाहटों की आवाजें कानों में…क्या समय आ गया है….पहले मरने तो दिया होता…खामख्वाह परेशान कर दिया….यार आज तो ऑफिस जाने में लेट हो जाऊँगा…फालतू ही सी. एल. देनी पड़ जाएगी… हाँ रे, पप्पू के पापा बनारस गए हैं न, ताला लगाकर आई हूँ, बाई वापस चली जाएगी, जाकर बरतन मांजना पड़ेगा…राजेश भी अमेरिका से निकल पड़ा है, कितनी महंगी होती हैं आजकल फ्लाइट की टिकटें 12 बजे अंतिम यात्रा होगी। मैसेज पढ़कर भागा-दौड़ा चला आया था…धत्त तेरे की…,पता नहीं क्या-क्या सुन रही हूँ मैं और सिम्मी के सहमे-सहमे, झिझके-झिझके हताश शब्द मेरे कर्ण-कुहरों को झकझोरे मार रहे हैं…“क्या बताऊँ आँटी जी! डॉक्टर ने तो कह दिया था कि होपलेस केस है, बचना मुश्किल है। वेन्टीलेटर से हटते ही सांसे रूक जाएंगी।” इसलिए तो राजन ने रात ही में प्रेसनोट भेज दिया था वॉट्सअप और अखबारों में। ताकि सभी समय पर आ जाएँ। क्या पता था कि घर आते ही इनकी नब्ज चलने लगेगी….हमने तो गंगाजल भी पिला दिया था आंटी….!

दिनांक 24 फरवरी 2021 निधन। श्रीमती रमा मिश्रा। नो वॉट्सएप मैसेज। नो प्रेसनोट।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’