durga ka mandir by munshi premchand
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भामा ने फिर देवी की ओर संशय दृष्टि से देखा। उसके दिव्य रूप पर प्रेम का प्रकाश था। आंखों में दया की आनंददायी झलक थी। उस समय भामा के अन्तःकरण में कहीं स्वर्गलोक से यह ध्वनि सुनाई दी – जा, तेरा कल्याण होगा।

संध्या का समय है। भामा ब्रजनाथ के साथ इक्के पर बैठी तुलसी के घर उसकी थाती लौटने जा रही है। ब्रजनाथ के कड़े परिश्रम की कमाई तो डाक्टर की भेंट हो चुकी है, लेकिन भामा ने एक पड़ोसी के हाथ अपने कानों के झुमके बेचकर रुपए जुटाए हैं। जिस समय झुमके बनकर आए थे, भामा बहुत प्रसन्न हुई थी। आज उन्हें बेचकर वह उससे भी अधिक प्रसन्न है।

जब ब्रजनाथ ने आठों गिन्नियां उसे दिखाई थी, उसके हृदय में एक गुदगुदी सी हुई थी लेकिन हर्ष मुख पर आने का साहस न कर सका था। आज उन गिन्नियों को हाथ से जाते समय उसका हार्दिक आनंद आंखों पर चमक रहा है, ओठों पर नाच रहा है, कपोलों को रंग रहा है और अंगों पर किलोल कर रहा है। वह इंद्रियों का आनंद था, यह आत्मा का आनन्द है! वह आनन्द लज्जा के भीतर छिपा हुआ था, यह आनन्द गर्व से बाहर निकला पड़ता है। तुलसी का आशीर्वाद सफल हुआ। आज पूरे तीन सप्ताह के बाद ब्रजनाथ तकिए के सहारे बैठे थे। वह बार-बार भामा को प्रेम-पूर्ण नेत्रों से देखते थे। वह आज उन्हें देवी मालूम होती थी। अब तक उन्होंने उसके बाह्य सौन्दर्य की शोभा देखी थी। आज वह उसका आत्मिक सौन्दर्य देख रहे हैं।

तुलसी का घर एक गली में था। इक्का सड़क पर जाकर ठहर गया। ब्रजनाथ इक्के पर से उतरे, और अपनी छड़ी टेकते हुए भामा के हाथों के सहारे तुलसी के घर पहुंचे। तुलसी ने रुपए लिए और दोनों हाथ फैलाकर आशीर्वाद दिया – दुर्गा जी तुम्हारा कल्याण करें। तुलसी का वर्णविहीन मुख वैसे ही खिल गया, जैसे वर्षा के पीछे वृक्षों की पत्तियां खिल जाती हैं। सिमटा हुआ अंक फैल गया, गालों की झुर्रियां सिमटी दीख पड़ी। ऐसा मालूम होता था, मानों उसका कायाकल्प हो गया।

वहां से आकर ब्रजनाथ अपने द्वार पर बैठे हुए थे कि गोरेलाल आकर बैठ गए। ब्रजलाल ने मुंह फेर लिया।

गोरेलाल – भाई साहब! कैसी तबियत है?

ब्रजनाथ – बहुत अच्छी तरह हूं।

गोरेलाल – मुझे क्षमा कीजिएगा। मुझे इसका बहुत खेद है कि आपके रुपये देने में इतना विलम्ब हुआ। पहली तारीख ही को घर से एक आवश्यक पत्र आ गया और मैं किसी तरह तीन महीने की छुट्टी लेकर घर भागा। वहां की विपत्ति-कथा कहूं तो समाप्त न हो लेकिन आपकी बीमारी का शोक समाचार सुनकर आज भागा चला आ, रहा हूं। ये लीजिए, रुपये हाजिर हैं। इस विलम्ब के लिए अत्यन्त लज्जित हूं।

ब्रजनाथ का क्रोध शांत हो गया। विनय में कितनी शक्ति है! बोले – जी हां, बीमार तो था लेकिन अब अच्छा हो गया हूं। आपको मेरे कारण व्यर्थ कष्ट उठना पड़ा। यदि इस समय आपको असुविधा हो, तो रुपए फिर दे दीजिएगा। मैं अब उऋण हो गया हूं। कोई जल्दी नहीं है।

गोरेलाल विदा हो गए तो ब्रजनाथ रुपये लिए हुए भीतर आए और भामा से बोले – ये लो अपने रुपये गोरेलाल दे गए।

मामा ने कहा – ये मेरे रुपए नहीं, तुलसी के हैं। एक बार पराया धन लेकर सीख गई। ब्रजनाथ – लेकिन तुलसी के पूरे रुपये तो दे दिए गए।

भामा – दे दिए गये तो क्या हुआ? ये उसके आशीर्वाद को न्यौछावर हैं।

ब्रजनाथ – कान के झुमके कहां से आवेंगे?

भामा – झुमके न रहेंगे, न सही, सदा के लिए ‘कान’ तो हो गए।