durga ka mandir by munshi premchand
durga ka mandir by munshi premchand

सात बजे चिराग जल गए। सड़क पर अंधेरा छाने लगा। ब्रजनाथ सड़क पर उद्विग्न भाव से टहलने लगे। इरादा हुआ, गोरेलाल के घर चलूं। उधर कदम बढ़ाए लेकिन हृदय कांप रहा था कि कहीं वह रास्ते में आते हुए न मिल जायें, तो समझें कि थोड़े से रुपयों के लिए इतने व्याकुल हो गए। थोड़ी ही दूर गये कि किसी को आते देखा। भ्रम हुआ, गोरेलाल हैं, मुड़े, और सीधे बरामदे में आकर दम लिया, लेकिन फिर वही धोखा! फिर वहीं भ्रांति! तब सोचने लगे कि इतनी देर क्यों हो रही है? क्या अभी तक वह कचहरी से न आये होंगे। ऐसा कदापि नहीं हो सकता है, या तो उन्होंने कल आने का निश्चय कर लिया, समझें होंगे, रात को कौन जाये, या जान-बूझकर बैठे होंगे। देना न चाहते होंगे, उस समय उनके गरज थी, इस समय मुझे गरज है। मैं ही किसी को क्यों न भेज दूं? लेकिन किसे भेजूं मन्नू जा सकता है। सड़क ही पर मकान है। यह सोचकर कमरे में गये, लैम्प जलाया और पत्र लिखने बैठे, मगर आंखें द्वार ही की ओर लगी हुई थी। अकस्मात् किसी के पैरों की आहट सुनाई दी। तुरंत पत्र को एक किताब के नीचे दबा लिया और बरामदे में चले आए। देखा, पड़ोस का एक कुंजड़ा तार पढ़ाने आया है। उससे बोले, भाई इस समय फुरसत नहीं है, थोड़ी देर में आना। उसने कहा – बाबूजी, घर भर के आदमी घबराए हैं, जरा एक निगाह देख लीजिए। निदान ब्रजनाथ ने झुंझलाकर उसके हाथ से तार ले लिया, और सरसरी नजर से देखकर बोले – कलकत्ते से आया है। माल नहीं पहुंचा। कुंजड़े ने डरते-डरते कहा – बाबूजी, इतना और देख लीजिए किसने भेजा है। इस पर ब्रजनाथ ने तार फेंक दिया और बोले – मुझे इस वक्त फुरसत नहीं है।

आठ बज गए। ब्रजनाथ को निराशा होने लगी – मन्नू इतनी रात बीते नहीं जा सकता। मन में निश्चय किया, आप ही जाना चाहिए, बला से बुरा माने। इसकी कहां तक चिंता करूं? स्पष्ट कह दूंगा, मेरे रुपये दे दो। भलमनसी भले मानसों से निभाई जा सकती है। ऐसे भूतों के साथ भलमनसी का व्यवहार करना मूर्खता है। अचकन पहनी घर में जाकर भामा से कहा – जरा एक काम से बाहर जाता हूं किवाड़ बन्द कर लो।

चलने को तो चले लेकिन पग-पग पर रुकते जाते थे। गोरेलाल का घर दूर से दिखाई दिया, लैम्प जल रहा था। ठिठक गए और सोचने लगे, चलकर क्या कहूंगा? कहीं उन्होंने जाते-जाते रुपये निकालकर दे दिये, और देर के लिए क्षमा मांगी तो मुझे बढ़ी झेंप होगी। वह मुझे क्षुद्र, ओछा, धैर्य-हीन समझेंगे। नहीं रुपयों की बातचीत करूं ही क्यों? कहूंगा – भाई, घर में बड़ी देर से पेट दर्द कर रहा है। तुम्हारे पास पुराना तेज सिरका तो नहीं है। मगर नहीं, यह बहाना कुछ भद्दा-सा प्रतीत होता है। साफ कलई खुल जायेगी। उंह इस झंझट की जरूरत ही क्या है। यह मुझे देखकर आप ही समझ जायेंगे। इस विषय में बातचीत की कुछ नौबत ही न आवेगी। ब्रजनाथ इसी उधेड़बुन में आगे बढ़ते जाते थे, जैसे नदी में लहरे चाहे किसी ओर चलें, धारा अपना मार्ग नहीं छोड़ती।

गोरेलाल का घर आ गया। द्वार बंद था। ब्रजनाथ को उन्हें पुकारने का साहस न हुआ, समझे खाना खा रहे होंगे। दरवाजे के सामने से निकले, और धीरे-धीरे चलते हुए एक मील तक चले गए, नौ बजने की आवाज कान में आयी। गोरेलाल भोजन कर चुके होंगे, यह सोचकर लौट पड़े, लेकिन द्वार पर पहुंचे, तो अंधेरा था। वह आशा-रूपी दीपक बुझ गया था। एक मिनट तक दुविधा में खड़े रहे। क्या करूं? अभी बहुत सवेरा है। इतनी जल्दी थोड़े ही सो गए होंगे? दबे पांव बरामदे पर चढ़े। द्वार पर कान लगाकर सुना, चारों ओर ताक रहे थे कि कहीं कोई देख न ले। कुछ बातचीत की भनक कान में पड़ी। ध्यान से सुना। स्त्री कह रही थी – रुपये तो सब उठ गए, ब्रजनाथ को कहां से दोगे? गोरेलाल ने उत्तर दिया – ऐसी कौन-सी उतावली है, फिर दे देंगे। आज दरखास्त दे दी है, कल मंजूर हो ही जायेगी। तीन महीने के बाद लौटेंगे, तब देखा जायेगा।

ब्रजनाथ को ऐसा जान पड़ा, मानों मुंह पर किसी ने तमाचा मार दिया।

क्रोध और वैराग्य से भरे हुए बरामदे से उतर आए। घर चले तो सीधे कदम न पड़ते थे, जैसे कोई दिन भर का थका-मांदा पथिक हो।

ब्रजनाथ रात-भर करवटें बदलते रहे। कभी गोरेलाल की धूर्तता पर क्रोध आता था, कभी अपनी सरलता पर मालूम नहीं, किस गरीब के रुपए हैं। उस पर क्या बीती होगी! लेकिन अब क्रोध या खेद से क्या लाभ? सोचने लगे – रुपए कहा से आवेंगे? भामा पहले ही इंकार कर चुकी है, वेतन में इतनी गुंजाइश नहीं। दस-पांच रुपये की बात होती तो कतर-ब्योंत करता। तो क्या करूं? किसी से उधार लूं। मगर मुझे कौन देगा? आज तक किसी से मांगने का संयोग नहीं पड़ा, और अपना कोई ऐसा मित्र है भी तो नहीं। जो लोग हैं, मुझी को सताया करते हैं, मुझे क्या देंगे। हां, यदि कुछ दिन कानून छोड़कर अनुवाद करने में परिश्रम करूँ तो रुपये मिल सकते हैं। कम से कम एक मास का कठिन परिश्रम है। सस्ते अनुवादक के मारे दर भी तो गिर गई है! हां निर्दयी तूने वही दगा की। न जाने किस जन्म का बैर चुकाया। कहीं का न रखा।

दूसरे दिल से ब्रजनाथ को रुपयों की धुन सवार हुई। सवेरे कानून के लेक्चर में सम्मिलित होते, संध्या को कचहरी से तजवीजों का पुलिंदा घर लाते और आधी रात तक बैठे अनुवाद किया करते। सिर उठाने की मोहलत न मिलती। कभी एक-दो भी बज जाते। जब मस्तिष्क बिन्दु शिथिल हो जाता तब विवश होकर चारपाई पर पड़ रहते।

लेकिन इतने परिश्रम का अभ्यास न होने के कारण कभी-कभी सिर में दर्द होने लगता। कभी पाचन-क्रिया में विघ्न पड़ जाता, कभी ज्वर चढ़ आता। तिस पर भी वह मशीन की तरह काम में लगे रहते। भामा कभी-कभी झुंझलाकर कहती – अजी, लेटे भी रहो बड़े धर्मात्मा बने हो। तुम्हारे जैसे दस-पांच आदमी और होते, तो संसार का काम ही बंद हो जाता। ब्रजनाथ इस बाधाकारी व्यंग्य का उत्तर न देते, दिन निकलते ही फिर वही चरखा ले बैठते।

यहां तक कि तीन सप्ताह बीत गए और पच्चीस रुपए हाथ आ गए। ब्रजवाथ सोचते थे – दो-तीन दिन में बेड़ा पार है लेकिन इक्कीसवें दिन उन्हें प्रचंड ज्वर चढ़ आया और तीन दिन तक न उतरा। छुट्टी लेनी पड़ी, शय्यासेवी बन गए भादों का महीना था। भामा ने समझा, पित्त का प्रकोप है लेकिन जब एक सप्ताह तक डाक्टर की औषधि सेवन पर भी ज्वर न उतरा तब घबराई। ब्रजनाथ प्रायः ज्वर में बक-झक भी करने लगते। मामा सुनकर डर के मारे कमरे में से भाग जाती। बच्चे को पकड़कर दूसरे कमरे में बंद कर देती। अब उसे शंका होने लगती थी कि कहीं यह कष्ट उन्हीं रुपयों के कारण तो नहीं भोगना पड़ रहा है। कौन जाने रुपये वाले ने कुछ कर दिया हो! जरूर यही बात है, नहीं तो औषधि से लाभ क्यों नहीं होता?

संकट पड़ने पर हम धर्म-भीरु हो जाते है, औषधियों से निराश होकर देवताओं की शरण लेते हैं। भामा ने भी देवताओं की शरण ली। वह जन्माष्टमी, शिवरात्रि और तीज के सिवा कोई व्रत न रखती थी। इस बार उसने नवरात्र का कठिन पाठ शुरू किया।

आठ दिन पूरे हो गए। अंतिम दिन आया। प्रभात का समय था। भामा ने ब्रजनाथ को दवा पिलाई और दोनों बालकों को लेकर दुर्गा जी की पूजा करने के लिए चली। उसका हृदय आराध्य देवी के प्रति श्रद्धा से परिपूर्ण था! मंदिर के आंगन में पहुंची। उपासक आसनों पर बैठे हुए दुर्गा पाठ कर रहे थे। धूप और अगरबत्ती की सुगंध उड़ रही थी। उसने मंदिर में प्रवेश किया। सामने दुर्गा की विशाल प्रतिमा शोभायमान थी। उसके मुखारविंद पर एक विलक्षण दीप्ति झलक रही थी। बड़े-बड़े उज्ज्वल नेत्रों से प्रभा की किरणें छिटक रही थीं। पवित्रता का एक समां-सा छाया हुआ था। भामा इस दीप्तवर्ण मूर्ति के सम्मुख सीधी आंखों से ताक न सकी। उसके अंतःकरण में एक निर्मल, विशुद्ध भाव-पूर्ण भय का उदय हो आया उसने आंखें बन्द कर ली। घुटनों के बल बैठ गई और हाथ जोड़कर करुण स्वर में बोली – माता मुझ पर दया करो।

उसे ऐसा ज्ञात हुआ, मानो देवी मुस्कराई। उसे उन दिव्य नेत्रों से एक ज्योति सी निकलकर अपने रूप में आती हुई मालूम हुई। उसके कानों में देवी के मुंह से निकले ये शब्द सुनाई दिए – पराया धन लौट दे, तेरा भला होगा।

भामा उठ बैठी। उसकी आंखों में निर्मल भक्ति का आभास झलक रहा था। मुखमंडल से पवित्र प्रेम बरसता पड़ता था। देवी ने कदाचित उसे अपनी प्रभा के रंग में डुबा दिया।

इतने में दूसरी एक स्त्री आयी। उसके उज्ज्वल केश बिखरे और मुरझाए हुए चेहरे के दोनों ओर लटक रहे थे। शरीर पर केवल एक श्वेत साड़ी थी। हाथ में चूड़ियों के सिवा और कोई आभूषण न था। शोक और नैराश्य की साक्षात् मूर्ति मालूम होती थी। उसने भी देवी के सामने सिर झुकाया और दोनों हाथों से आंचल फैलाकर बोली – देवी जिसने मेरा धन लिया हो, उसका सर्वनाश करो।

जैसे सितार मिजराब की चोट खाकर थरथरा उठता है, उसी प्रकार भामा का हृदय अनिष्ट के भय से थरथरा उठा। ये शब्द तीव्र तीर के समान उसके कलेजे में घुस गए। उसने देवी की ओर कातर नेत्रों से देखा। उनका ज्योर्तिमय स्वरूप भयंकर था, नेत्रों से भीषण ज्वाला निकल रही थी। भामा के अंतःकरण में सर्वत्र आकाश से, मंदिर के सामने वाले वृक्षों से, मंदिर के स्तम्भों से, सिंहासन के ऊपर जलते हुए दीपक से और देवी के विकराल मुंह से ये शब्द निकलकर गूंजने लगे – पराया धन लौट दे, नहीं तो तेरा सर्वनाश हो जायेगा। भामा खाड़ी हो गई और उस वृद्धा से बोली – क्यों माता, तुम्हारा धन किसी ने ले लिया है?

वृद्धा ने इस प्रकार उसकी ओर देखा, मानो डूबते को तिनके का सहारा मिला। बोली – हां बेटी

भामा – कितने दिन हुए?

वृद्धा – कोई डेढ़ महीना।

आमा – कितने रुपए थे?

वृद्धा – पूरे एक सौ बीस।

भीमा – कैसे खोए?

वृद्धा – क्या जाने कहीं गिर गए। मेरे स्वामी पलटन में नौकर थे। आज कई बरस हुए, वह परलोक सिधारे। अब मुझे सरकार से साठ रुपए साल पेंशन मिलती है। अबकी दो साल की पेंशन एक साथ ही मिली थी। खजाने से रुपए लेकर आ रही थी। मालूम नहीं, कब और कहां गिर पड़े। आठ गिन्नियां थीं।

भामा – अगर वे तुम्हें मिल जाएं तो क्या दोगी?

वृद्धा – अधिक नहीं, उसमें से पचास रुपए दे दूंगी।

मामा – रुपए क्या होंगे, कोई उससे अच्छी चीज दो।

वृद्धा – बेटी और क्या दूं जब तक जिऊंगी तुम्हारा यश गाऊंगी।

भामा – नहीं, इसकी मुझे आवश्यकता नहीं।

वृद्धा – बेटी, इसके सिवा मेरे पास क्या है?

भामा – मुझे आशीर्वाद दो। मेरे पति बीमार है, वह अच्छे हो जाएं।

वृद्धा क्या उन्हीं को रुपए मिले है?

भामा – हां, वह उसी दिन से तुम्हें खोज रहे हैं।

वृद्धा घुटनों के बल बैठ गई और आंचल फैलाकर! कम्पित स्वर से बोली – देवी! इसका कल्याण करो।