patang ka kamaal
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

घर में कोहराम मचा हुआ था। निलय स्कूल से वापस नही आया था। उसकी साईकिल घर के पास वाले मोड पर खडी हुई मिली थी। पुलिस को अपहरण की संभावना अधिक लग रही थी। निलय की माँ का रो-रो कर बुरा हाल था। उसके पिता इधर से उधर परेशान हाल टहल रहे थे कि अपहरणकर्ता सम्पर्क क्यों नहीं कर रहा। घर पुलिस की छावनी में तब्दील हो चुका था। होता भी क्यों नहीं, आखिर शहर के सबसे बड़े व्यापारी का इकलौता बेटा गायब हुआ था।

रात ढल चुकी थी। एक बार फिर सूरज सिर पर था। परन्तु अपहरणकर्ताओं ने अभी तक सम्पर्क नहीं किया था। घर वालों के साथ-साथ पुलिस वालों की भी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

“अग्रवाल साहब, याद करने की कोशिश करिये किसी ने कभी आपको धमकी दी है।” इंस्पेक्टर ने फिर से सुराग तलाशने की कोशिश की।

“नहीं इंस्पेक्टर साहब, ईश्वर का दिया बहत कछ है हमारे पास । हमारी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है।” टहलना रोक कर सेठ जी बोले।

“सेठ जी, कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे लगता हो कि आपकी तरक्की से उसका नुकसान हुआ है।’ इंस्पेक्टर ने पुनः पूछा।

सेठ जी सोच में पड़ गये “ऐसे तो कई लोग हो सकते हैं, परन्तु उनके ऊपर शक नहीं किया जा सकता”

“आप कुछ तो बताइये। हम कहीं से शुरुआत तो करें।”

“इस्पेक्टर साहब, हम सब व्यापारी है, क्रिमिनल नही। जो व्यापार में हुए नफे-नुकसान के लिये एक-दूसरे के बच्चे उठवायेंगे।” परेशान से सेठ जी बोले।

“तुम तो जी, उन लोगों के नाम बताओ बाकी पुलिस देखेगी कि उसे क्या करना है। …मुझे मेरा बेटा वापस चाहिये।” रोते हुये निलय की माँ बोलीं।

“सेठ जी मुझे लगता है, अपहरण करने वाले से निलय अच्छी तरह से परिचित है। अगर आप ध्यान से देखें तो लगता है निलय साईकिल खडी कर के अपहरणकर्ताओं के साथ गया है। किसी किस्म के प्रतिरोध का कोई निशान नहीं है।”

कुछ सोचते हुए इंस्पेक्टर फिर बोले, “मुझे लगता है कि उन्हें ये भी पता है कि पुलिस यहाँ है, और हो सकता है कि ये जो आपके हमदर्द यहाँ आ गये हैं। वो भी इन्ही में शामिल हों…”

अभी इंस्पेक्टर अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाये थे कि एक लड़का दौड़ता-दौड़ता आया।

“सेठ जी…….सेठ जी……”

“क्या हैं ?” सेठ जी उसकी ओर घूमें।

इंस्पेक्टर पर नजर पडते ही बच्चा थोडा डर गया।” क्या बात है? कौन हो तुम?” इंस्पेक्टर ने पूछा।

“इस्पेक्टर साहब, ये मोहन है मेरे माली का लडका।

ये यही आउट हाउस में रहता है। निलय के साथ खेलता हैं।”

“क्या कह रहे थे तुम मोहन?” सेठ जी ने पूछा?

……..’ मोहन इंस्पेक्टर को देख रहा था।

“बताओ क्या बात है?” इंस्पेक्टर ने प्यार से पूछा।

“ये ……….ये ……..पतंग”

सेठ जी गुस्से से चीखे,” भागो यहाँ से…. हम अपने बच्चे के लिये परेशान हैं और तुम पतंग दिखाने आये हो।”

“ठहरिये सेठ जी, …..हाँ, मोहन तुम पतंग की क्या बात कर रहे थे? ।”

“जी…जी.ये….” डरे हुए मोहन ने पतंग इंस्पेक्टर को ओर बढ़ा दी।

पतंग देखते ही इंस्पेक्टर की आँखों में चमक आ गई। “सेठ जी आप मेरे साथ आइये ।” कहता हुआ इंस्पेक्टर मोहन का हाथ पकड़ कर दूसरे कमरे की ओर चल दिया।

“आप यहाँ क्यों आ गये?” कमरे में धुसते ही सेठ जी ने पूछा।

“ये आपके मुनीम जी कैसे व्यक्ति है?”

“वैसे तो आदमी ठीक है काफी पुराना आदमी है। अपना काम बहुत अच्छी तरह करता है। बस थोड़े समय से इसे सट्टे की लत लग गई है। अभी उसे दो लाख का नुकसान हो गया था। मुझसे मांग रहा था। मैने सट्टे के लिये पैसा देने से मना कर दिया….लेकिन….आप ये क्यों पूछ रहे है? ”

ये देखिये आपके बेटे की लिखावट है क्या?”

“हाँ…” फटी-फटी आंखों से सेठ जी पतंग के ऊपर लिखे शब्द पढ़ रहे थे।

“कृप्या मेरे पिता सेठ मनोहर अग्रवाल को इस फोन नम्बर 133002 पर खबर कर दें कि मुझे मुनीम अंकल ने फैक्ट्री के पीछे वाली कोठरी में रखा है।”

फैक्ट्री के पीछे की कोठरी से निलय बरामद हो गया। मुनीम जी ने अपना अपराध स्वीकार लिया। रोते-रोते निलय ने बताया, “रात बीतने के बाद भी जब कोई नहीं आया तो मुझे बहुत डर लगा। ………लगा कि अपनी ही फैक्ट्री में तो कोई मुझे कभी भी नहीं ढूंढेगा और मैं मुनीम अंकल को पहचानता हूँ इसलिये वो मुझे मार देंगे। ……तभी एक पतंग आ कर दरवाजे पर गिरी, जिसका एक कोना नीचे से अन्दर घुस गया। मेरा बैग मेरे पास था ही, मैने जल्दी से उसमें से पेन निकाल कर पतंग पर अपनी बात लिख कर उसे वापस बाहर खिसका दिया। बच्चों के आने की आहट मैने सुनी परन्तु आवाज नहीं दिया। क्योंकि मुझे डर था कि वहाँ पर जो भी बड़ा व्यक्ति आस पास होगा वो मुनीम जी का ही आदमी होगा।”

“शाबाश बेटा! तुमने बहुत बुद्धिमानी से स्वयं को छुडाने में हमारी मदद करी है और तुम्हारी मदद तुम्हारे इन दोस्तों ने और इस पतंग ने करी है।”

खुशी से झूमते हुये सेठ जी बोले, “अपनी फैक्ट्री के सारे कर्मचारियों और फैक्ट्री के आसपास रहने वाले गरीबों के सारे बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्चा आज से मैं दूंगा। ताकि बच्चों को लिखना पढ़ना आए और मोहन के लिये तो मैं एक पतंग की दुकान ही खुलवा दूंगा।

“जिसमें से एक पतंग मैं रोज खरीदूंगा।” चहकता हुआ निलय बोला।

घर फिर से खुशियों से भर उठा था।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’