Hindi Motivational Story: स्वामी विवेकानंद की प्रसिद्धि ज्ञान और अच्छे आचरण की वजह से पूरे विश्व में फैल चुकी थी। वह जहाँ जाते लोग उनके अनुयायी बन जाते ओर उनकी बातों से मंत्रमुग्ध हो जाते थे। एक बार स्वामी विवेकानन्द एक नगर में पहुँचे। जब वहाँ के लोगों को पता चला तो वे स्वामी जी से मिलने के लिए पहुँचे। नगर के अमीर लोग एक से बढ़कर एक उपहार स्वामी जी के लिए लाए। कोई सोने की अंगूठी लाया तो कोई हीरों से जड़ा बहुमूल्य हार। स्वामी जी सबसे भेंट लेते और एक ओर रख देते।
इतने में एक बूढ़ी औरत स्वामीजी के पास आई और बोली, “महाराज आपके आने का समाचार मिला तो मैं आपसे मिलने को व्याकुल हो गई। मैं बहुत गरीब हूँ और कर्ज़ में दबी हूँ। मेरे पास आपको देने के लिए कुछ उपहार तो नहीं है। मैं खाना खा रही थी तो कुछ रोटियाँ आपके लिए लाई हूँ। अगर आप इस गरीब की रोटियाँ स्वीकार करें तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी।”
स्वामी जी के आँखों से आँसू भर आए। उन्होंने महिला से रोटी ली और वहीं खाने लगे। वहाँ बैठे लोगों को यह बात कुछ बुरी लगी। उन्होंने पूछा, “स्वामी जी हमारे दिए हुए कीमती उपहार तो आपने अलग रख दिए और गंदे कपड़े पहने की जूठी रोटी आप बड़े स्वाद से खा रहे हैं ऐसा क्यों?” स्वामी जी ने बड़ी सुंदरता से मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “देखिए आप लोगों ने मुझे अपनी पूरी धन दौलत से मात्र हिस्सा निकालकर कीमती रत्न दिए लेकिन इस महिला के पास तो कुछ नहीं है सिवाय इस रोटी के, फिर भी इसने अपने मुँह का निवाला मुझे दे दिया। इससे बड़ा त्याग क्या हो सकता है? एक माँ ही ऐसा काम कर सकती है। माँ ख़ुद भूखी रहकर भी अपने बच्चों को खाना खिलाती है। यह एक रोटी नहीं माँ की ममता है और इस ममतामयी माँ को मैं शत्-शत् नमन करता हूँ।” स्वामी जी की बातें सुनकर वहाँ उपस्थित सारे लोग निःशब्द रह गए। वाह! कितने उच्च विचार हैं आपके, सबके मन में स्वामी जी के यही शब्द थे।
मित्रों माँ एक इंसान नहीं बल्कि भगवान का दिया हुआ वरदान है जो हम लोगों को मिला है। कहा जाता है कि माँ की ममता के आगे स्वर्ग का सुख भी फीका है क्योंकि माँ ही वह इंसान है जो ख़ुद कष्ट सहकर अपने बच्चों को पालती है।
ये कहानी ‘नए दौर की प्रेरक कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Naye Dore ki Prerak Kahaniyan(नए दौर की प्रेरक कहानियाँ)
