teepoolaal kee teep moral story
teepoolaal kee teep moral story

एक था टीपूलाल। वह पढ़ने-लिखने में तो सिफर था, पर उसे नकल करने की गंदी आदत थी। इम्तिहान में जो भी लड़का उसके आगे बैठा होता, चुपके-चुपके उसकी नकल करके अपनी कॉपी में लिखता जाता। इस तरह जैसे-तैसे पास भी हो जाता।

एक बार की बात। छमाही इम्तिहान के दिनों में टीपूलाल के आगे बैठा था कुक्कू। कुक्कू ने देखा, पिछली सीट पर बैठा टीपूलाल उसकी कॉपी में से एक-एक लाइन टीप रहा है। कुक्कू को बड़ा बुरा लगा। उसने सोचा, ‘मैंने इतनी मेहनत से पाठ याद किए हैं। यह टीपूलाल बिना कुछ किए-धरे ही पास हो जाना चाहता है।’

तभी कुक्कू को एक तरकीब सूझी। इतिहास का पर्चा था। उसमें सम्राट अशोक के बारे में सवाल पूछा गया था। कुक्कू ने सवाल का जवाब देते-देते अपनी कॉपी में लिखा, ”यह सारा कुछ मैं अपने से आगे बैठे एक समझदार बच्चे की कॉपी से टीपकर लिख रहा हूँ, क्योंकि सम्राट अशोक के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं है।”

नकल की घबराहट में टीपूलाल ने यह भी लिख लिया।

कुक्कू ने पूरा पर्चा हल करने के बाद चुपके से ये लाइनें काट दी। पर टीपूलाल की कॉपी में तो वे लिखी ही जा चुकी थीं। जब मास्टर जी ने टीपूलाल की कॉपी देखी, तो बड़े हैरान हुए। ‘अशोक ने कलिंग की लड़ाई कैसे जीती’ वाले सवाल का जवाब पढ़ते-पढ़ते उन्हें बीच में लिखा दिखाई दिया, ”यह सारा कुछ मैं अपने से आगे वाले एक समझदार बच्चे की कॉपी से टीपकर लिख रहा हूँ, क्योंकि सम्राट अशोक के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं है।”

पढ़कर मास्टर जी भौचक्के रह गए। उन्होंने इतिहास के पर्चे में टीपूलाल को गोल अंडा दिया।

अगले दिन मास्टर जी ने क्लास के सब बच्चों को टीपूलाल की कॉपी दिखाई कि देखो तो, टीपूलाल ने क्या लिखा है!

टीपूलाल की कॉपी देखते ही सब बच्चे हँसते-हँसते पागल हो गए। एक ने कहा, ”अरे टीपूलाल, नकल करते समय कुछ अकल का भी तो इस्तेमाल किया कर!”

टीपूलाल बेचारा क्या कहता! वह तो सिर झुकाए खड़ा था।

कुक्कू हँसकर बोला, ”मास्टर जी, इसने मेरी कॉपी से ही सब कुछ उतारा है। वह लाइन मैंने ही अपनी कॉपी में टीपूलाल को छकाने के लिए लिखी थी। इसने जस की तस उतार ली।”

सुनकर टीपूलाल की हालत यह हुई, मानो वह शर्म से जमीन में गड़ गया हो।

धीरे-धीरे टीपू की नकल की आदत छूटी, तो वह पढ़ाई में भी ठीक-ठाक चल निकला। हाँ, अब भी वह कुक्कू से मिलता है, तो यह कहना नहीं भूलता, ”दोस्त, कुछ भी कहो, तुम्हारा तरीका लाजवाब था। मैंने नकल की झोंक में देखा ही नहीं कि क्या लिख गया!”

इस पर कुक्कू और टीपूलाल दोनों ही जोरों से हँस पड़ते हैं।