पुराने समय की बात है, उन दिनों हवा और सूरज साथ-साथ रहते थे। उनमें आपस में पक्की दोस्ती थी। पर एक दिन किसी बात को लेकर उनमें बहस और तनातनी हो गई। दोनों में से कोई झुकने को राजी नहीं था। लिहाजा तनातनी बढ़ती चली गई।
अब तो देखते ही देखते हवा और सूरज में लड़ाई ठन गई। हवा कह रही थी, ”मैं बड़ी हूँ। सारी दुनिया को मुझसे ही चैन मिलता है। वरना तुम तो अपनी धूप और गरमी से सबको मार ही डालते!”
लेकिन सूरज का कहना था, ”तुम पर क्या, सारी दुनिया पर ही मेरा राज्य चलता है। बड़ा मैं हूँ, मैं!”
बड़ी देर तक आपस में दोनों की तकरार होती रही। अंत में सूरज ने कहा, ”वह देखो, एक राहगीर जा रहा है। हम दोनों उस पर अपनी-अपनी ताकत आजमाएँ। पता चल जाएगा, कौन बड़ा है!”
”वह कैसे?” हवा ने पूछा। सूरज हँसकर बोला, ”उस राहगीर के कपड़े उतरवाने हैं। जो उतरवा लेगा, वही बड़ा है।”
हवा भी हँस दी। बोली, ”चलो, ठीक है।”
अजीब सी शर्त थी। पर आपस में तनातनी हो जाए तो ऐसा ही होता है। एक बार जो ठान लिया सो ठान लिया। दोनों एक-दूसरे पर अपना सिक्का जमाना चाहते थे।
कुछ सोचकर सूरज बोला, ”अच्छा, जरा पहले तुम अपनी ताकत को आजमाओ।”
हवा बोली, ”मंजूर!”
हवा ने उसी समय सन-सन करके जोर से बहना शुरू किया। यह देखकर राहगीर घबराया। उसने अपने कपड़ों को जोर से लपेट लिया। हवा ने जैसे-जैसे अपना जोर बढ़ाया, राहगीर भी अपने कपड़ों को और जोर से कसकर पकड़ने लगा। आखिर हवा ने हार मान ली।
अब सूरज की बारी थी। उसने अपनी तपिश बढ़ाई। राहगीर देखते ही देखते पसीने-पसीने हो गया। घबराकर उसने अपनी पगड़ी उतार दी। फिर भी चैन नहीं मिला तो झट से कुरता उतार दिया। लेकिन बनियान अब भी पसीने-पसीने थी। हारकर उसने बनियान भी उतार दी और पसीना पोंछने लगा।
इस पर सूरज ने बड़े जोरों से अट्टहास किया। बोला, ”सुनो हवा, देख लो, जीत मेरी हुई।”
हवा एक पल चुप रही। फिर बोली, ”ठीक है, तुम ही जीते। लेकिन भाई, कपड़े उतरवाने में जीतना कोई बड़ी जीत नहीं है। प्रतियोगिता तो कपड़े पहनाने की होनी चाहिए थी। उसमें तो जरूर मेरी ही जीत होती।”
सुनकर सूरज कुछ शर्मिंदा हुआ। बोला, ”ठीक है, हवा बहन! न तुम छोटी, न मैं। सबकी अपनी-अपनी जगह है।”
”हाँ, यह ठीक है।” कहकर धीमी-धीमी, प्यारी हवा चलने लगी। सूरज ने भी अपनी गरमी समेट ली थी। लिहाजा चारों ओर उजली-उजली गुनगुनी धूप बिखर गई।
इससे राहगीर को बड़ा सुकून मिला। थोड़ी ही देर में उसका पसीना सूख गया, तो उसने फिर से कपड़े पहने और आगे चल दिया।
इस पर हवा मुसकराई। सूरज का चेहरा शर्म से लाल हो गया था।
वह समझ गया कि हवा हारी नहीं है। हारकर भी जीत तो आखिर उसी की हुई है।
सूरज हँसकर बोला, ”सुनो हवा, न मैं बड़ा और न तुम छोटी हो। दोनों मिलकर रहेंगे, ताकि लोगों को हम खुशी दे पाएँ!”
हवा भी हँसकर बोली, ”हाँ, यह हुई न बात!”
और फिर दोनों अपनी बहसबाजी और तनातनी भूलकर फिर से अच्छे दोस्त की तरह रहने लगे।
