Manto story in hindi dhua

Manto story in Hindi: जब वह स्कूल जा रहा था तो उसने रास्ते में एक कसाई देखा, जिसके सिर पर एक बहुत बड़ा टोकरा था। उसमें दो ताजा जिबह किये हुए बकरे थे। खालें उतरी हुई थीं और नंगे गोश्त में से धुंआ उठ रहा था। जगह-जगह पर यह गोश्त, जिसको देखकर मसऊद के ठंडे गालों पर गर्मी की लहरें-सी दौड़ जाती थीं, फड़क रहा था, जैसे कभी-कभी उसकी आंख फड़का करती थी।

सवा नौ बजे होंगे, पर झुके हुए सलेटी बादलों से ऐसा लगा रहा था कि बहुत सवेरा है। सर्दी में शिद्दत नहीं थी, लेकिन राह चलते आदमियों के मुंह से गर्म-गर्म समाचार की टोंटियो की तरह, गाढ़ा सफेद धुंआ निकल रहा था। हर चीज बोझिल दिखाई देती थी, जैसे बादलों के वजन के नीचे दबी हुई हो। मौसम की कुछ वही हालत थी जो रबड़ के जूते पहन कर चलने पर होती है। इसके बावजूद कि बाजार में लोगों की आमदोरफ्त जारी थी और दुकानों में जिंदगी के आसार पैदा हो चुके थे-आवाजें, मद्धिम थीं, जैसे सरगोशियां हो रही हों, चुपके-चुपके, धीरे-धीरे बातें हों, हौले-हौले लोग कदम उठा रहे हों या ज्यादा ऊंची आवाज पैदा न हो।

मसऊद बगल में बस्ता दबाए, स्कूल जा रहा था। आज उसकी चाल भी सुस्त थीं जब उसने बेखाल के, ताजा जिबह किए हुए बकरों के गोश्त से सफेद-सफेद धुआं उठता देखा तो उसे राहत महसूस हुई। उस धुएं ने उसके ठंडे गालों पर गर्म-गर्म लकीरों का एक जाल-सा बुन लिया। इस गर्मी से उसे राहत पहुंचाई और वह सोचने लगा कि सर्दियों में, ठंडे यख हाथों पर बेंत खाने के बाद, अगर यह धुंआ मिल जाया करे तो कितना अच्छा हो।

फिजा में उजलापन नहीं था, रोशनी थी, पर धुंधली। कोहरे की एक पतली-सी तह, हर चीज पर चढ़ी हुई थी, जिससे फिजा में गंदलापन पैदा हो गया था। यह गंदलापन आंखों को भला लगता था, इसलिए कि नजर आनेवाली चीजों की नोक-पलक कुछ मद्धिम पड़ गई थी। मसऊद जब स्कूल पहुंचा तो उसे अपने साथियों से यह जानकर जरा भी खुशी न हुई कि स्कूल सेक्रेटरी साहब के गुजर जाने की वजह से बंद कर दिया है। सब लड़के खुश थे, जिसका सबूत यह था कि वे अपने बस्ते एक जगह रख कर, स्कूल के सहन में, ऊटपटांग-से खेलों में मशगूल थे। कुछ लड़के, छुट्टी का पता लगते ही घर चले गए थे, कुछ आ रहे थे और नोटिस बोर्ड के पास जमा थे और एक ही खबर को बार-बार पढ़ रहे थे। मसऊद ने जब सुना कि सेक्रेटरी साहब गुजर गए हैं तो उसे बिल्कुल अफसोस न हुआ। उसका दिल जज़्बात से बिल्कुल खाली था। हां, उसने यह जरूर सोचा कि पिछले साल, जब उसने दादा जान का इंतकाल इन्हीं दिनों में हुआ था तब उनका जनाजा ले जाने में बड़ा दिक्कत हुई थी, इसलिए कि बारिश शुरू हो गयी थी। वह भी जनाजे के साथ गया था और कब्रिस्तान में चिकने कीचड़ की वजह से यूं फिसला था कि खुदी हुई कब्र में गिरते-गिरते बचा था। ये सब बातें उसको अच्छी तरह याद थी। सर्दी की शिद्दत, कीचड़ से लथपथ उसके कपड़े सुर्ख लिए नीले हाथ, जिनको दबाने से सफेद-सफेद धब्बे पड़ जाते थे, नाक जो कि बर्फ की डली लगती थी और फिर जाकर हाथ-पांव धोने और कपड़े बदलने का मसला-यह सब कुछ उसको अच्छी तरह याद था। इसलिए जब उसने सेक्रेटरी साहब की मौत की खबर सुनी तो उसे ये सब बीती हुई बातें याद आ गई और उसने सोचा जब सेक्रेटरी साहब का जनाना उठेगा तो बारिश शुरू हो जाएगी और कब्रिस्तान में इतना कीचड़ हो जाएगा कि कई लोग फिसलेंगे और उनको ऐसी चोटें आएंगी कि वे बिलबिला उठेंगे।

मसऊद ने यह खबर सुनकर, सीधा अपनी क्लास का रुख किया। कमरे में पहुंच कर उसने अपने डेस्क का ताला खोला। दो-तीन किताबें, जो कि उसे दूसरे दिन फिर लानी थी, उसमें रखीं और बाकी बस्ता उठा कर घर की तरफ चल दिया। रास्ते में उसने फिर वहीं, ताजा जिबह किए हुए दो बकरे देखे। उनमें से एक को अब कसाई ने लटका दिया था, दूसरा तख्ते पर पड़ा था।

जब मसऊद दुकान से गुजरा तो उसके दिल में ख्वाहिश हुई कि वह उस गोश्त को, जिसमें से धुंआ उठ रहा था, छू कर देखे। चुनांचे उसने आगे बढ़ कर उंगली से बकरे से उस हिस्से को छू कर देखा, जो अभी तक फड़क रहा था। गोश्त गर्म था। मसऊद की ठंडी उगली को यह गर्मी बहुत भली लगी। कसाई दुकान के अंदर छुरी तेज करने में लगा था, इसलिए मसऊद ने एक बार फिर गोश्त को छूकर देखा और वहां से चल पड़ा। घर पहुंच कर, जब उसने अपनी मां की सेक्रेटरी साहब की मौत की खबर सुनाई तो उसे पता चला कि उसके अब्बा जी, उनके ही जनाजे के साथ गए हैं। अब घर में सिर्फ दो लोग थे। मां और बड़ी बहन। मां रसोई में बैठी सालन पका रही थी और बड़ी बहन कुलसुम पास ही एक कांगड़ी लिए दरबारी की सरगम याद कर रही थी।

चूंकि गली के दूसरे लड़के गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ते थे, जिस पर इस्लामिया स्कूल के सेक्रेटरी की मौत का कुछ असर नहीं हुआ था, इसलिए मसऊद ने खुद को बिल्कुल बेकार महसूस किया। स्कूल का कोई काम भी नहीं था।

छठी क्लास में जो कुछ पढ़ाया जाता है, उसे यह घर में अपने अब्बा जी से पढ़ चुका था खेलने के लिए भी उसके पास कोई चीज न थी। एक मैली-कुचैली ताश ताक में पड़ी थी, पर उसमें मसऊद को कोई दिलचस्पी न थी। लूडो और इस किस्म के दूसरे खेल, जो उसकी बड़ी बहन, अपनी सहेलियों के साथ हर रोज खेलती थी, उसकी समझ से परे थे। समझ से परे यूं थे कि मसऊद ने उनको समझने की कोशिश ही नहीं की थी। उसको ऐसे खेलों से कोई लगाव ही नहीं था।

बस्ता अपनी जगह पर रखने और कोट उतारने के बाद वह किचन में अपनी मां के पास बैठ गया और दरबारी की सरगम सुनता रहा, जिसमें कई बार, सा रे गा मा आता था। उसकी मां पालक काट रही थी। पालक काटने के बाद उसने हरे-हरे पत्तो का गीला-गीला ढेर उठा कर हंडिया में डाल दिया।

थोड़ी देर बाद जब पालक को आंच लगी तो उसमें से सफेद-सफेद धुंआ उठने लगा। उस धुएं को देखकर मसऊद को बकरे का गोश्त याद आ गया

तब उसने अपनी मां से कहा-‘अम्मी जान, आज मैंने कसाई की दुकान पर दो बकरे देखे। खाल उतरी हुई थी और उनमें से धुंआ निकल रहा था, बिल्कुल ऐसा ही, जैसा कि सुबह-सवेरे मेरे मुंह से निकलता है।’

‘अच्छा!’ कहकर उसकी मां चूल्हे में लकड़ियों के कोयलें झाड़ने लगी।

‘हां! और मैंने गोश्त को अपनी उंगली से छूकर देखा तो वह गर्म था।’

अच्छा!’ यह कहकर उसकी मां ने वह बर्तन उठाया, जिसमें उसने पालक का साग धोया था और रसोईघर से बाहर चली गई।

‘और वह गोश्त कई जगह पर फड़कता भी था।’

‘अच्छा…!’ मसऊद की बड़ी बहन ने दरबारी की सरगम याद करनी छोड़ दी और उसकी ओर मुखातिब हुई, ‘कैसे फड़कता था?’

‘यं…यं!’ मसऊद ने उंगलियों से फड़कन पैदा करके, अपनी बहन को दिखाई।

‘फिर क्या हुआ?’

यह सवाल कुलसुम ने अपने सरगम-भरे दिमाग से कुछ इस ढंग से निकाला कि मसऊद एक लम्हे के लिए बिल्कुल भौचक्का रह गया, फिर क्या होना था? मैंने ऐसे ही आपसे बात की थी कि कसाई की दुकान पर गोश्त फड़क रहा था। मैंने उंगली से छू कर भी देखा था, गर्म था।’

‘गर्म था?…..अच्छा मसऊद, यह बताओ, तुम मेरा एक काम करोगे?’

‘बताइये।’

‘आओ, मेरे साथ आओ।’

‘नहीं, पहले आप बताइए-काम क्या है?’

‘तुम आओ तो सही मेरे साथ।’

‘जी नहीं….आप पहले काम बताइए।’

‘देखो, मेरी कमर में बड़ा दर्द हो रहा है…..मैं पलंग पर लेटती हूं। तुम जरा पांव से दबा देना….अच्छे भाई जो हुए। अल्लाह की कसम, बड़ा दर्द हो रहा है।’ यह कहकर मसऊद की बहन ने अपनी कमर पर मुक्कियां मारनी शुरू कर दी।

‘यह आपकी कमर को क्या हो जाता है। जब देखो, दर्द हो रहा है। और फिर आप दबवाती भी मुझी से हैं। क्यों नहीं अपनी सहेलियां से कहती?’ मसऊद उठ खड़ा हुआ और राजी हो गया।

‘चलिए, लेकिन आपसे यह कहे देता हूं। कि दस मिनट से ज्यादा मैं बिल्कुल नहीं दबाऊंगा।’

‘शाबाश….शाबाश।’ कह कर उसकी बहन उठ खड़ी हुई और सरगमों की कापी सामने ताक में रख कर उस कमरे की तरफ चली जहां वह और मसऊद दोनों सोते थे। सहन में पहुंच कर उसने अपनी दुखती हुई कमर सीधी की और ऊपर आसमान की तरफ देखा। मटियाले बादल झुके हुए थे।

‘मसऊद, आज जरूर बारिश होगी।’ यह कहकर उसने मसऊद की तरफ देखा, पर वह अंदर, अपनी चारपाई पर लेटा था। जब कुलसुम अपने पलंग पर औंधे मुंह लेट गई तो मसऊद ने उठ कर घड़ी में वक्त देखा, ‘देखिए बाजी, ग्यारह बजने में दस मिनट बाकी हैं। मैं पूरे ग्यारह बजे आपकी कमर दबाना छोड़ दूंगा।’

‘बहुत अच्छा, लेकिन तुम अब खुदा के लिए ज्यादा नखरे न करो। इधर मेरे पलंग पर आकर जल्दी कमर दबाओ, वरना याद रखो, बड़े जोरे से कान उमेठूेंगी।’ कुलसुम ने मसऊद को डांट पिलाई। मसऊद ने अपनी बड़ी बहन के हुक्म का पालन किया और दीवार का सहारा लेकर, पांव से उसकी कमर दबानी शुरू कर दी।

मसऊद के भार के नीचे कुलसुम की चौड़ी-चकती कमर में हल्का-सा झुकाव पैदा हो गया। जब उसने पैरों से दबाना शुरू किया-ठीक उसी तरह, जिस तरह मजदूर मिट्टी गूंथते हैं तो कुलसुम ने मजा लेने की खातिर हौले-हौले हाय-हाय करना शुरू कर दिया।

गुलदाऊदी और नाजबू के हरे-हरे पत्ते, ऊपर लाल-लाल गमलों में नहा रहे थे फिजा में नींद घुली हुई थी-ऐसी नींदे जिनमें जागने की कैफियत ज्यादा होती है और इंसान के इर्द-गिर्द नर्म-नर्म ख्वाब यूं लिपट जाते है, जैसे ऊनी कपड़े।

मसऊद ऐसी बातें सोचने लगा, जिनका मतलब उसकी समझ में नहीं आता था। वह उन बातों को छू कर देख सकता था, पर उनका मतलब उनकी गिरफ्त से बाहर था। फिर भी, एक गुमनाम-सा मजा इस सोच में उसे आ रहा था।

बारिश में कुछ देर खड़े रहने के बाद, जब मसऊद के हाथ बिल्कुल बर्फ हो गए और दबाने से उन पर सफेद धब्बे पड़ने लगे तो उसने मुट्ठियों कस ली और उनको मुंह की भाप से गर्म करना शुरू किया। ऐसा करने से हाथों को कुछ राहत तो पहुंची पर वे नम हो गये इसलिए आग तापने के लिए किचन में चला गया। खाना तैयार था। अभी उसने पहला कौर ही उठाया था कि उसके वालिद कब्रिस्तान से लौट आए। बाप-बैटे में कोई बात न हुई। मसऊद की मां उठ कर फौरन दूसरे कमरे में चली गई और वहां देर तक अपने पति के साथ बातें करती रही।

खाना खत्म कर, मसऊद बैठक में चला गया और खिड़की खोल कर फर्श पर लेट गया। बारिश की वजह से सर्दी की शिद्दत बढ़ गई थी, क्योंकि अब हवा भी चल रही थी। मगर यह सर्दी बुरी नहीं लगती थीं तालाब के पानी की तरह, यह ऊपर ठंडी और अंदर गर्म थी।

जब मसऊद फर्श पर लेटा तो उसके मन में ख्वाहिश हुई कि वह उस सर्दी के अंदर धंस जाए, जहां उसके बदन को राहतकुन गर्मी पहुंचे। देर तक वह ऐसी, गर्म दूध-जैसी बातों के बारे में सोचता रहा, जिसकी वजह से उसके पुट्ठों में हल्का-हल्का दर्द पैदा हो गया। एक-दो बार उसने अंगड़ाई ली तो उसे मजा आया। उसके जिस्म के किसी हिस्से में (यह उसको पता नहीं था कि कहां) कोई चीज अटक-सी गई थी। यह क्या चीज थी, इसके बारे में भी मसऊद को कुछ पता नहीं था। हां, इस अटकाव ने उसके सारे जिस्म में बेचैनी, एक दबी हुई बेचैनी पैदा कर दी थी। उसका सारा शरीर खिंच कर लंबा हो जाने का इरादा बन गया था।

देर तक गुदगुदे कालीन पर करवटें बदलने के बाद वह उठा और किचन में से होता हुआ सहन में आ निकला। न किचन में कोई था, न सहन में। इधर-उधर जितने कमरे थे, सब के सब बंद थे। बारिश अब रुक गई थी। मसऊद ने हॉकी और गेंद निकाली और आंगन में खेलना शुरू कर दिया। एक बार, जब उसने जोर से हिट लगाई तो गेंद आंगन के दाएं हाथ वाले कमरे के दरवाजे पर लगी। अंदर से मसऊद के बाप की आवाज आई-‘कौन?’

‘जी, मैं हूं मसऊद।’

अंदर से आवाज आई।-‘क्या कर रहे हो?’

‘जी, खेल रहा हूं।’

‘खेलो….’ फिर थोड़ा रुक कर, उसके बाप ने कहा-‘तुम्हारी मां मेरा सर दबा रही है।…..ज्यादा शोर न मचाना।’

यह सुनकर मसऊद ने गेंद वहीं पड़ी रहने दी और हॉकी हाथ में लिए, सामने वाले कमरे का रुख किया। उसका एक दरवाजा बंद था और दूसरा अधखुला…. मसऊद को एक शरारत सूझी। दबे पांव, वह अधखुले दरवाजे की ओर बढ़ा और धमाके के साथ उसने दोनों पट खोल दिए। दो चीखें बुलंद हुई और कुलसुम तथा उसकी सहेली विमला ने, जो पास-पास लेटी थीं, डट कर झट से रजाई ओढ़ ली।

विमला के ब्लाऊज के बटन खुले हुए थे और कुलसुम उसके खुले हुए सीने को घूर रही थी। मसऊद कुछ समझ न सका। उसके दिमाग पर धुंआ-सा छा गया। वहां से उल्टे कदम लौट कर, वह जब बैठक की ओर चला तो उसे सहसा अपने अंदर बेपनाह ताकत का एहसास हुआ, जिसने कुछ देर के लिए उसकी सोचने-समझने की कूवत बिल्कुल कमजोर कर दी।

बैठक में खिड़की के पास बैठ कर जब मसऊद ने हॉकी को दोनों हाथों में पकड़ कर घुटने पर रखा तो यह सोचा कि हल्का-सा दबाव डालने पर भी हॉकी में झुकाव पैदा हो जाएगा और ज्यादा जोर लगाने पर तो हैंडल चटाख से टूट जाएगा। उसने घुटने पर हॉकी के हैंडल में झुकाव तो पैदा कर लिया पर ज्यादा-से-ज्यादा जोर लगाने पर भी वह न टूट सका। देर तक वह हॉकी के साथ कुश्ती लड़ता रहा। जब थक कर हार गया तो झुंझला कर उसने हॉकी परे फेंक दी।