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आज फिर मेरे कदम पृथ्वीलोक की ओर बढ़चले थे,क्या करता? आख़िरकार मैं ईश्वर उसका सबसे अच्छा और सच्चा मित्र जो था। और वो थी मिट्टी के पुतले की कारा में बंद मेरी प्रिय आत्मा जो मुझ पर बहुत विश्वास करती थी,कई बरसों से उसकी पुकार सुनकर भी अनसुना कर देता था। वजह थे उसके कर्म ,ऐसा करने में मेरी मुट्ठी जिससे उसकी डोर जुड़ी थी ज़ोर से भिंच जाती और वो कील जो मुझे उससे जोड़े हुए थी मुझे भी चुभती पर विवश था।
मैँ उसके पास वेंटिलेटर तक पहुँच गया और उस आत्मा से सँवाद करने लगा कि आखिर असमय वो क्यों विवश हुई मुझसे छुटकारे की गुहार लगाने को,….. मशीनों से घिरी वो शरीर छोड़ने में समर्थ न थी और प्राण वो न जाने कब से उसे छोड़ जाने की तैयारियों में लगा था।

उसे अकेला विवश देख कर मुझे अपने ही अंशरूप आत्मा पर बड़ा क्रोध आया,मैनें तुम्हें इसका मित्र जानकर ये काया सौंपी थी। तुम इसकी प्रथम मित्र थीं अच्छा कर्तव्य निभाया तुमनें अपना मैंने उसे झिड़कते हुए कहा…
प्रभु मैँ विवश हो गयी ,आप ही बताईये इस जर्जर मकान में कैसे रह सकती हूँ मैं?
तुम्हें इसका ध्यान रखने को कहा था न मैने,हाँ प्रभु उसने सिर झुकाकर कहा ,पर प्राण ने सहयोग देने में असहमति जता दी।
प्राण! ….मैंने आवेश में पुकारा
जी मैं यहीँ हूँ उदास सिर झुकाकर उसने कहा ,इतना विवश था ,जैसे कोई किरायेदार जिसके पास अन्यत्र रहने की कोई जगह न हो और जर्जर ठिकाना मना कर दे ठौर देने से…….
क्या कमी थी मेरे कर्तव्य में जो तुमनें इतनी जल्दी इसे छोड़ने का मन बना लिया….
अनसुनी…..प्रभु न इसने मेरी सुनी और आत्मा की धीमी आवाज़ तो इसने कबका सुनना बन्द कर दिया था….
इसने सबके प्रति अपने दायित्वों की पूर्ति की,पर सुनी तो सिर्फ इस नालायक मन की …..हम इसे
जो मना करते ,मन उतना ही हमारे ख़िलाफ़ जहर उगलता ।
इसने सबकी भावनाओ ,और कर्तव्यों पर तो पूरा ध्यान दिया,और सबसे ज्यादा ध्यान दिया अपने मकान की सुविधाओं पर….. पर कभी हमारे मकान पर ध्यान देने की इसने जरा भी आवश्यकता न समझी।
यह दवाएँ सालों पुराने परचे पर खरीद कर खा लेता था,स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली चीज़े भी पसन्द करता था।
जब यह जिम में पहली बार हाँफने लगा था ,मैंने चलने में असमर्थता जता कर कहा
“थोड़ा स्लो हो जाओ न”
अरे उम्र तो बस एक नम्बर है ,जस्ट चिल बेकार में डराते हो मुझे,कहकर उसकी चेतावनी को परे झटक दिया।
और हम पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया कार्यक्षमता बढ़ाने का हवाला देकर,पर हमारी मरम्मत का न सोचा न हमारी कराहों पर की परवाह की। ये अपने आप को आज़ाद रूह कहता था ,इसे पूछिये जरा…. आपके बनाये बन्धनों,मर्यादा से कब सरोकार रहा। आजाद रहने की हिमायती रूह को बन्धन सदा से नापसन्द थे,उसकी मनमानियाँ वो ख़ामोश रह सहता रहा… कभी तो मान लिया करो, जब मैंने ने कहा ,
तो बोला …”यार परेशान मत करो , काश इसने मेरी हताशा को पहले समझा होता।”
धीमी पड़ती धड़कन और सुन्न होता दिमाग बस बचे खुचे कर्तव्यों की गिनती कर रहा था,और मन्द पड़ती ह्र्दयगति ,गुर्दे और जिगर प्राण को धक्का देकर शरीर से निकाल देना चाहते थे।
सुनो रूको न मन ने मायूसी से कहा।
“अब मुमकिन नहीं .”…आत्मा ने उससे कमज़ोरी और शिथिलता से कहा।
मुझे तुम्हारी ज़रूरत है,जोर से चीखकर उसने कहा पर उस शून्य कमरे में बस कर्म और मन अपराधी थे ,प्राण और आत्मा बड़ी बेबस….
वो भावनाएँ और कर्तव्य जिनके वशीभूत होकर उसने काया से छल किया था,वो काया अपने विरुद्ध ख़ून ,ह्रदय ,दिमाग और गुर्दों का विद्रोह देख लाचार थी,आख़िर अनसुनी का दण्ड भुगतना तो था ही।
वो जर्जर हो चुका था ,आँखे धूमिल हो रहीं थीं ,साँस अटक रही थी, वो अब आत्मा से थोड़ा दूर दिख रहा था।
हाँ वो मेरा दिया सर्वश्रेष्ठ शरीर था मेरी प्यारी आत्मा का मकान ,उसने अपनी अनदेखी पर मुझे बार बार चेताया। पर ज़माने के साथ चलने की दौड़ ने उसे कभी किसी की न सुनने दी।
अब तो मैं स्वयँ साक्षी था
अब मैं भी उसे कह रहा था कि वक़्त ने भी पछतावे की सीमा पार कर ली है।
अब आत्मा तेज़ हो कर विदाई चाहती थी और जिस्म को आज़ाद करना,अब साथ निभाने से वो बेज़ार था…
पर आत्मा बेबस भी सभी रिश्तों की उस शरीर से जुड़ी हुई उम्मीद की कीलें उसे जकड़े हुए थीं।शरीर छूटता भी तो कैसे और किस प्रकार……
उनको तो बस मैँ ही देख पा रहा था,मैंने रोते हुए उसके शरीर को उन कीलों से एक एक करके आज़ाद करना शुरू किया,उस समय मेरी स्थिति एक विवश पिता की थी ,जो नालायक बच्चे की दुर्दशा पर रोता है
यूँ तो मैं लोभ और मोह से परे हूँ ,पर उस पवित्र आत्मा से विशेष नेह था ,बड़ी सुन्दर काया प्रदान की थी उसे।
जब मैंने उसे भेजा था ,तब वो छोड़ना ही नहीं चाहती थी मुझे और मेरी मित्रता को तब मैंने उसे आत्म रूप में अपना ही अंश दिया ,और कहा!मैँ परमात्मा हूँ तो ये मेरा रूप हैं ये आत्मा है।
पर आज जब वो मुझसे मिल रही थी ,तो मैं अपने आँसू रोक न पाया
उसके शव पर उसके पहले घर उसकी माँ ने भी दुःख से कहा ,”कि तूने मेरी सुनना कबका छोड़ दिया था।वरना असमय न जाता”।
अब उसके बहुत से घावों की पीड़ा खत्म हो चुकी थी,पर कुछ अब भी दुःख रहे थे ।वो सुबकते हुए मेरे पीछे चल दी। अचानक मुझे उसकी आहट मिलना बंद हुई तो उसे खड़े हुए पाया।मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
उसे मेरा सामीप्य और सत्कर्मों के बदले ….मोक्ष चाहिये था,पर ईश्वर होने की भी नियति है मैं भी तो कर्मफल से बंधा हुआ हूँ।

उसकी स्मृति को विलुप्त करने से पहले कहा,”तुमनें मित्रधर्म से विश्वासघात किया है,”
उसने आश्चर्य से कहा “विश्वासघात… पर किससे?

मैंने कहा,”हाँ …..वही शरीर जिससे तुमने सारे दायित्व निभाये बस उसके प्रति दायित्व नहीं निभाये…..आत्मा जर्जर मकान को छोड़ देती है उस शरीर को भूलो अब पर चिंता मत करो अगले शरीर में तुम इससे अच्छा करोगे,कहकर विवशता से अपनी उम्मीद की कील उसके माथे में ठोंक दी।