fasal ki suraksha
fasal ki suraksha

एक गाँव था वीरपुर। इस गाँव में एक अत्यंत धनवान जमींदार रहता था। इस धनवान के पास ढेर सारी जमीन थी। इस जमीन पर उसने धान की खेती कर रखी थी। धान की देखभाल-और रखवाली के लिए जमींदार ने कई नौकर भी रख छोड़े थे। जमींदार सोच रहा था कि उसे काफी हानि हो रही है। एक बार उसने नौकरों से कहा कि वे जाल फैला कर रखें। ताकि पक्षियों को पकड़ा जा सके।

जाल फैलाया गया। जाल में एक सुंदर सा पक्षी फंस गया। नौकर उसे पकड़ कर जमींदार के पास ले गए। नौकर जमींदार के पास जाकर बोले- ‘मालिक, लगता है यही पक्षी रोजाना आकर हमारी फसल का बड़ा हिस्सा खाकर अपना पेट भरता है। और कुछ बालियां चोंच में दबाकर उड़ जाता है।’ जमींदार बोला- ‘ठीक है आज हम इस पक्षी को सजा जरूर देंगे।’

तभी अचानक से पक्षी बोल उठा- ‘आप मुझे सजा अवश्य दीजिए परंतु पहले मेरी बात भी सुन लें।’ पक्षी की बात सुनकर जमींदार बोला, ‘ठीक है, बोलो, तुम क्या कहना चाहते हो?’ वह पक्षी कहने लगा, ‘मैं अपने पेट को भरने के बाद सिर्फ छह बालियां धान की चोंच में दबा कर उड़ जाता हूँ। मैं दो बालियां अपने वृद्ध पिता के लिए ले जाता हूँ। वे इतने वृद्ध हैं कि उन्हें आंखों से कुछ दिखाई नहीं देता।

अब मेरा कर्तव्य है कि मैं उन्हें भूखा न रखूं।’ पक्षी आगे बोला, “दो बालियां मैं अपने बच्चों के लिए ले जाता हूँ, उनका पेट भरना भी मेरा दायित्व है। इसके बाद मैं दो बालियां अपने बीमार पड़ोसी पक्षियों के लिए ले जाता हूँ। ये मेरा परमार्थ मान सकते हैं। परमार्थ भी बहुत जरूरी है, नहीं तो मेरा जीवन भला किस काम का?’ इतने में अचानक से जमींदार की निद्रा भंग हो गई। स्वप्न में भी उन्हें सीख मिल गई। तभी से जमींदार ने अपनी फसल की सुरक्षा बंद कर दी। वह समझ चुका था, फसल में एक हिस्सा पक्षियों का जरूर होता है।

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)