ek vichitra man ki katha
ek vichitra man ki katha

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

एक जंगल था। जंगल में प्रवेश होने के पहले किनारे पर एक आश्रम था। आश्रम में एक योगी रहते थे। आश्रम के पास एक बड़ा-सा रास्ता जंगल की तरफ जाता था। दो गाँवों के बीच में जंगल था। इस तरफ के गाँव के लोगों को उस तरफ गाँव में जाने के लिए 10-15 किलो मीटर दूर तक जंगल के बीच रास्ते से ही जाना पड़ता था। एक बार एक यात्री आया। उसे जंगल तक आने में ही शाम ढलने लगी। सूर्य अस्त हुआ। वहाँ पर योगी थे, उसके पास जाकर उसने प्रणाम किया। “महानुभाव! मुझे उस गाँव में जाना है। इस रास्ते से कितना कि.मी. दूरी पर हैं” -उसने पूछा, तब योगी ने कहा कि- “देखो, अब तुम्हारा जाना संभव नहीं है। अंधेरा हो रहा है, तुम यहीं पर रहो, कल सुबह जाना”। परंतु यात्री ने कहा- “जंगल के उस तरफ गाँव में जाना है।

वहां मेरा घर है और मुझे घर पहुंचना ही है। बहुत दूर से प्रवास करके आया हूँ। मेरे मन में इच्छा है कि अब जल्दी घर पहुँच जाऊ”। योगी ने कहा- “घना जंगल है, अंधेरा है, अब कोई नहीं है। तुम मत जाओ। घंटों समय लग जाता है, बहुत देर हो जाएगा और रात जंगल में सभी जानवर रहते हैं”। परंतु यात्री ने कहा- “नहीं महानुभाव मुझे जाना ही है। उस गाँव में पहुंचना ही है। उस गाँव में मेरी बहुत प्रतिष्ठा है। इसलिए मैं बहुत मानसिक तनाव में हूँ। मुझे जाना ही है।”
योगी कहते हैं- “तुम्हें जाना है तो मैं एक साधन देता हूँ, उसका उपयोग करते जाना।” तब योगी उसको एक मशाल देते हैं, मशाल में डालने के लिए जितना जरूरत हो उतना तेल देते हैं। “देखो इस डिब्बा में तेल है। इस मशाल को जलाकर जाना, तेल जंगल को पार करने के लिए जितना चाहिए उतना ही है। तुम्हें जंगल पार करने के लिए जल्दी-जल्दी जाना होगा और इधर-उधर मत देखना, ये मशाल जलता रहेगा। इस डिब्बे में से तेल को नहीं गिराना है। मशाल को नहीं बुझाना है। चौकन्ना रहना है। कहीं पर भी नहीं रुकना। तुम घर पहुंचने तक यहाँ-वहाँ अपने ध्यान को नहीं भटकाना, ये है जीवन की यात्रा”।

यात्री जंगल की तरफ मशाल और तेल लेकर चला। हाथ में मशाल को पकड़ा है, तेल को थोड़ा-थोड़ा डाल रहा है, जितनी जरूरत है उतना प्रकाश था। रास्ता दिख रहा था। अब आधा रास्ता जा चुका था। चारो तरफ अंधेरा था, रास्ते में कुछ चमक रहा था, उसको जिज्ञासा हुआ कि-वह क्या है? उसके पास जाकर देखता है, तो वहां एक छोटा-सा हंडा था। उसको थोड़ा-सा ही खोलकर देखा तो उसमें सोने के सिक्के थे, मशाल जल रहा है। तेल कम हो रहा है। आगे सोने के सिक्के हैं, अभी आधा रास्ता जाना है। आस-पास जानवर हैं। मशाल के जलने तक जानवर दूर रहते हैं, इस स्थिति में यात्री सोचता है कि इस प्रवास में मुझे खजाना (संपत्ति) मिला है। इसको घर लेकर जाना चाहिए। परंतु इस रात में कैसे लेकर जाये? इसलिए उसने सोचा कि इस हंडा में कितने सिक्के हैं, यह जान लूँ और इसको यहीं छुपा दूं, फिर कल ले जाऊंगा। वह सिक्का गिनना शुरू करता है- 1,2,3,4,5 ऐसे गिनते रहता है। तेल कम हो रहा है। मशाल जल रहा है। गिनता है, गिनता ही जा रहा है।

मनुष्य का मन कितना अजीब है। 1000 सोने के सिक्के होने चाहिए, परंतु उसमें एक कम था। 999 कैसे हो सकते हैं? शायद मैं गलत गिना हूँ, इसमें हजार रहनी ही चाहिए। जिसने इन सिक्कों को रखा है, वह पूरी तरह से सही होना ही चाहिए। फिर से गिनना शुरू करता है, तब 1001 होता है। इसी तरह जीवन चक्र चलता है। यह कभी भी पूर्ण रूप नहीं होता है। ये केवल एक कथा है। हजार नहीं होते है। एक कम होता है या एक ज्यादा रहता है। जीवन भी ऐसा ही है, इसमें एक कम तो रहता है या एक ज्यादा रहता हैं, पक्का परिपूर्ण जीवन नहीं रहता हैं। 2-3 बार गिनता है, एक बार 999 है, एक बार 1001 होता है। कुछ भी हो कहकर हंडा को जमीन में गाड़ देता है, उस पर मिट्टी डाल देता है, तब तक मशाल बुझ जाता है। इस तरह वह अपने गाँव की दिशा भूल जाता है, जंगल के बीच में अटक गया।

चारों ओर जानवर हैं, उसको तब याद आता है कि योगी कहे थे कि यहाँ-वहाँ मत देखना, सरल रास्ते पर जाना, कुछ भी हो इधर-उधर ध्यान नहीं देना। तेल कम है, जंगल पार करने तक ही ये मशाल जलता रहेगा, आगे नहीं। इन सभी बातों को यात्री याद करता है। पर अब क्या करना है? मैंने सिक्का गिनने में ही अपना समय गवां दिया। किन्तु गिनती खत्म नहीं हुई, सोना वहीं पर रह गया। इतने में ही एक जानवर ने उसे पकड़ लिया। संपत्ति मिली है ऐसा लगता है परंतु नहीं मिलती, 25-30 साल की संपत्ति मिली है ऐसा लगता है, पर धीरे-धीरे हाथ से छूटने लगती है। कुर्सी मिल गयी, 5 साल होने के बाद वो भी चली जाती है। यह खजाना काम नहीं आया सिर्फ आकर्षण के लिए शामिल हुआ, खजाना मिला, पर जान चली गयी थी। जंगल के बीच में यात्री के प्राण चले गये। यात्री को हँसकर हंडा बोला कि- तुम एक नहीं हो, इस रास्ते में बहुत लोग आये और गिनकर गये हैं। लेकिन कोई प्राप्त नहीं कर सका। मैं वैसे ही बैठा हूँ। 999 तो 1000 एक कम या एक ज्यादा, ये संसार एक हंडा जैसा है। इसमें हम गिनने बैठे हैं, इस गिनती में जीवन की ज्योति बुझ जाती है। कुछ भी इकट्ठा कर लो, पर हम ही चल बसते हैं, हमारा इकट्ठा की हुई संपत्ति हम से दूर चली जाती है। दो में से एक होता हैं। मनुष्य तुम यहाँ हमेशा के लिए नहीं हो, इस दुनिया में एक यात्री हो। एक महानुभाव योगी एक मशाल देता है, वो सिर्फ मशाल नहीं है, वो एक प्रकाश है। उसको तेल देता है, ये तेल का महत्त्व लक्ष्य है। इस लक्ष्य के साथ इस दुनिया में चुपके से अपना कार्य करते जाना चाहिए, कभी मन को हारना नहीं चाहिए और लोभ नहीं करना चाहिए।

“अनित्याने शरीराणी विफवो नैवशाश्वतः”


अत्यधिक संपत्ति है, तो भी वह शाश्वत से हमारे पास नहीं रहती है। कौन-सी संपत्ति है। यौवन ये एक संपत्ति है ना? यौवन एक संपदा, आयुष्य ये भी संपदा, शक्ति-सामर्थ्य संपदा, सौंदर्य संपदा इसमें से कुछ भी हमारे पास शाश्वत से नहीं रहेगा। इसलिए इन सभी के लिए जीवन में मोह नहीं चाहिए। हमें आनंद के लिए जीना चाहिए।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’