Hindi Kahani: धारचूला से पिथौरागढ़ का संकरा और सर्पीला मोटर मार्ग, कभी नीचे गोरी गंगा के दर्शन होते हैं तो कभी काली गंगा के। इन दोनों का संगम स्थल बहुत ही सुन्दर, किसी का भी हृदय मोह लेने वाला। मुंस्यारी की ओर से आ रही गोरी गंगा और धारचूला की ओर कैलाश से आती काली गंगा जौलजीवी में एक-दूसरे में विलय हो जाती है। गोरी गंगा अपने स्वरूप को काली गंगा में समाहित कर अद्भुत संगम में परिवर्तित हो जाती है जो आगे पंचेश्वर तीर्थ तक अपने अनुपम प्राकृतिक व आध्यात्मिक सौन्दर्य को बिखेरती हुई प्रकृति प्रेमियों, सैलानियों को अपने मोहपाश में बांध लेती है। इन चित्ताकर्षक नजारों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कुदरत ने सारी नैसर्गिक सुन्दरता जैसे यहाँ उड़ेल कर रख दी हो।
आनंद गांव व पहाड़ों की चोटियों के बारे में कुछ न कुछ बताता जा रहा था, एकाएक संकरी घाटी आयी तो मालपा प्रकरण की चर्चा शुरू हो गयी। ओह! कैसा समय था वह, बस याद करते ही रोंगटे खड़े हो गये। राघवेश अचानक कहीं खो सा गया था। आनंद बोला ‘क्या हो गया?’
राघवेश ने जैसे अपने को झकझोर कर फिर पहली स्थिति में लाते हुए कहा ‘होना क्या है, सोच रहा हूँ कि प्रकृति भी क्या है, कभी-कभी कैसी लीला खेलती है! सन् 1999 में मालपा प्रकरण जब हुआ 14 प्रदेशों के लोग जो मानसरोवर की यात्रा पर आये थे, अलग-अलग दल जगह-जगह फंस गये थे और मालपा पर तो कहर ही ढा दिया था प्रकृति ने। पूरी पहाड़ी ने ऊपर से गिरकर दर्जनों लोगों को अपना शिकार बना दिया था। कुछ लोगों का तो पता ही न चला, मलबे के साथ नदी में बह गये थे और कुछ की लाशों को भी बड़ी मुश्किल से निकालना पड़ा था। पूरी सेना का सहयोग लेना पड़ा था बल्कि स्थिति यह थी कि सेना भी असहाय सी हो गयी थी। क्या करती- चारों ओर सड़क टूट चुकी थी और मालपा में ऊपर से पहाड़ गिरता जा रहा था। नीचे बचे लोग ऊपर से मलवा गिरता देख कभी इधर भागते, कभी उधर भागते, चीखते चिल्लाते, पर कुदरत की भी यह कैसी माया रही कि दौड़ने भागने की कोई जगह नहीं। एक ओर पेड़, पत्थर और मलबे को बहाती उफनती नदी और ऊपर की ओर भयंकर चट्टान से गिरते भारी पत्थर और मलबा। अपनी मौत को स्वयं अपने सामने देखा था लोगों ने।
हेलीकॉप्टर में सेना के जवान ऊपर घूमते, पर असहाय होकर इस विनाशकारी दृश्य को देखकर उनका भी दिल पसीज जाता था। एक तो बिल्कुल संकरी घाटी, हेलीकॉप्टर के नीचे उतरने का सवाल ही नहीं। दूसरे उस क्षेत्र के चार-पांच किलोमीटर तक कोई भी ऐसा सुरक्षित स्थान नहीं था जहां हेलीकॉप्टर उतर पाता। दूर उतरता भी तो कई किलोमीटर तो सड़क जगह-जगह टूटी है और मालपा में तो दोनों तरफ आधा-आधा किलोमीटर सड़क का कहीं पता ही नहीं, कहां चली गयी। हैलीकॉप्टर से सेना के जवान ठीक मालपा पर भी नीचे कूदते पर सिवाय मौत के उन्हें भी फिलहाल कुछ हासिल नहीं हो सकता था, क्योंकि लगातार ऊपर से पहाड़ गिरता जा रहा था।
राघवेश अभी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि अचानक आनंद ने गाड़ी रोकी और एक छोटी सी झोपड़ी की ओर हाथ से इशारा करते हुए बोला, दीनू से मिलेंगे साब आप………..’
‘ये दीनू कौन है।’
‘अरे साब वही दीनू जो इतने वज्रपात में दर्जनों लोगों के बीच अकेला बच गया था। तीन दिन बाद मलबे के बीच फंसे दीनू को सेना के जवानों ने जिंदा निकाल लिया था। इसका पूरा परिवार तो यात्रियों के साथ मलबे में दबकर खत्म हो गया था, यह वहीं मालपा में एक छोटी-सी झोपड़ी बनाकर छोटी-मोटी चाय की दुकान कर बच्चों को पाल रहा था। कुछ दिनों से तो बहुत खुश रहता था। एक बंगाली यात्री ने कह दिया था कि उसके बेटे को साथ ले जायेंगे और अच्छी नौकरी लगवा देंगे। मानसरोवर यात्रा से लौटते हुए लड़के को साथ ले जाने की बात हो गयी थी, किन्तु! किसको पता था कि यात्री के मानसरोवर से लौटने से पहले ही वह हमेशा के लिए यहां से चला जायेगा।’
‘राघवेश तुरन्त कार से नीचे उतरा और झोपड़ी की ओर बढ़ने लगा, देखा कि दीनू के छोटे से कमरे में उसके बिस्तर से लेकर हर एक कोने में हार्डबोर्ड पर चित्र ही चित्र फैले हुए हैं; कुछ टीन सीटों पर, कुछ कागजों में, और वह चित्र बनाने में डूबा हुआ है। थोड़ी देर तक खड़े रहने के बाद भी दीनू ने नजर नहीं उठायी और वह चित्र बनाने में ही डूबा दिखाई दिया तो आनंद ने आवाज देकर कहा-‘दीन दा!’
बड़ी मुश्किल से दीनू ने धीरे से सिर उठाया, एक निगाह डाली, हाथ से इशारा किया और फिर डूब गया अपनी दुनिया में।
राघवेश बोला, क्या दीनू बोला नहीं।
‘नहीं साब उस हादसे ने उसकी आवाज को छीन लिया, पर इच्छा शक्ति तो देखिये गजब की है।’
‘इतने चित्र कहां भेजते हैं ये, कौन बनवाता है इन चित्रों को।’
‘अरे साब आपको मालूम नहीं मालपा की दुर्घटना ने जहां इससे पूरे परिवार को छीन लिया वहीं भगवान ने क्या जादू किया कि ये पत्थर पर जीवंत चित्र बनाने लगा। धीरे-धीरे लोगों ने इसे समझा, यह झोपड़ी सरकार ने बनवा दी थी। बड़ी मुश्किल से तो यह मौत के मुंह से बचकर आया, छः माह तक तो दिल्ली अस्पताल में रहा, पर अब तो पूरी दुनिया भर के लोगों का तांता लगा रहता है इसके पास।
किताब छपवाने वाले लोग हों, या पहाड़ प्रेमी लोग, देश के कोने-कोने से आकर इसके बनाये चित्रों को खरीदकर ले जाते हैं। ये तो लखपती बन गया साब लखपती।’
‘लेकिन इसकी स्थिति तो…’
‘अरे साब ये चाहे तो खरीद ले आधा डीडीहाट, इतना पैसा है इसके पास, पर सब ‘मंगलम्’ संस्था को दे देता है। इन सात-आठ साल में इसने सैकड़ों लोगों की आंखों का आप्रेशन करवाया, जो लूले-लंगड़े हैं उनका इलाज कराने से लेकर उन्हें बैसाखी देना और व्हील चेयर से लेकर उनके बच्चों को पढ़ाने तक की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी है।
राघवेश जहां का तहां खड़ा का खड़ा रहा गया था। उसकी नजर दीनू के चेहरे से हटने का नाम नहीं ले रही थी। वह कभी सामने खड़े पहाड़ और नीचे बहती नदी को, और कभी उस झोपड़ी के कोने में बसे दीनू के संसार को एकटक देखे जा रहा था। दीनू के साथ हुए हादसे की कल्पना भर से उसके रोंगटे खड़े हो गये। उसने नदी के संगम पर गहरी सोच में डूबे व्यक्ति का चित्र उठाया उस पर अंकित धनराशि को जेब से निकालकर दीनू के सामने रखा और डीडीहाट की ओर चल पड़ा। कार में बैठे-बैठे वह लगातार उस चित्र को देखता रहा। कैसा सजीव दृश्य उकेरा है इस तस्वीर में, इस तस्वीर में जैसे सारी दुनियां समा दी है दीनू ने।
उस जीवंत तस्वीर के सम्मोहन से वह न जाने किस दुनिया में खो गया। कुछ क्षणों के लिए वह जीवन के झंझावातों, आपा-धापी से मुक्त, तस्वीर की गहराइयों में डूबता चला गया।
