अग्निपथ-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Agnipath

Kahani in Hindi: रिद्धिमा की मांँ उसका नाश्ता लिए उसके कमरे के बाहर खड़ी अपनी बेटी की चिंता में रात भर वो भी कहांँ ठीक से सो पाई थी। ना जाने क्या तो हो गया है… बिल्कुल शांत सी बुझी बुझी रहती है उसकी बिटिया। हो सकता है पढ़ाई की टेंशन हो सोच कर मन में आए बुरे विचारों को एक तरफ झटकती है।

 दरवाजा खुला तो सामने रिद्धिमा खड़ी थी, आंँखों के चारों तरफ काले घेरे और आंँखों की लाली चुगली कर रही थी कि वो रात भर सोई नहीं है और खूब रोई है।

“बिटिया ठीक तो है तू?”

“हांँ मांँ ठीक हूंँ।” नजरें झुका कर रिद्धिमा ने कहा क्योंकि जानती है  मांँ उसका झूठ पकड़ ही लेंगी।

 ठीक कहांँ थी वो… कई दिन रात से उसके मन में अंतर्द्वंद्व चल रहा था। दिन  तो जैसे तैसे बीत जाता  पर रात कटने ना कटती। जब सब सो जाते…  वो अपने और सुशांत के बारे में ही सोचती रहती। दो विपरीत धारा में बहती नदियों का संगम जैसे असंभव है उसी प्रकार तो उनका एक होना भी असंभव ही था।

“कहीं जा रही है क्या? पहले नही बताया तूने। रात को भी कुछ नहीं खाया। बैठ पहले चुपचाप नाश्ता कर ले।”

“नहीं मांँ अभी बिल्कुल भूख नहीं है। मांँ मुझे जरूरी काम से जरा जाना है। आप खाना खा लेना मेरा इंतजार मत करना हो सकता है आने में देर हो जाए या फिर…”

शायद ना आ पाऊं लौट कर आपके पास मन में ही बोल गई थी अंतिम वाक्य।

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“बिटिया इस मुसलाधार बारिश में कहां जाओगी। कल चले जाना। तुम्हारी तबियत भी तो ठीक नहीं लग रही है। कितनी सुस्त और बीमार लग रही हो ऐसे में अचानक यह बाहर जाने का मन कैसे हो गया।”

कैसे बताती रिद्धिमा अपनी मांँ को कि वो कहांँ और किस जरूरी काम के लिए जा रही है।

जब से सुशांत का फोन आया और उसने अंतिम बार मिलने के लिए कहा। तब से बस मन दो कस्ती में भटक रहा था। उसके आगे सिर्फ दो रास्ते ही थे जिसमें से उसे सिर्फ एक को चुनना था। एक परिवार वालों का साथ, उनकी खुशी दूसरा सुशांत उसका प्यार।

उसे पता था सुशांत उसके माता-पिता और भाई किसी को पसंद नहीं था। उसके पीछे भी ठोस वजह थी… जब वो तेरह साल का था तब ही अपने घर से भाग कर शहर आ गया था। तब वो सातवीं कक्षा में ही था उसके बाद उसने पढ़ाई की ही नहीं। जैसे तैसे वो अपना जीवन यापन करता रहा। कभी मजदूरी की तो कभी किसी होटल में जूठे बर्तन मांजे कभी किसी टैंट हाउस में काम किया तो कभी रिक्शा चलाया।

ऐसे में इस सुशांत से रिद्धिमा को कैसे और कब प्यार हो गया यह वो पढ़ी लिखी शहर में पली-बढ़ी लड़की भी कहाँ समझ पाई ।

दुबला पतला सांवला सा वो पच्चीस साल का लड़का। जो उस समय किसी कुरियर कम्पनी में काम करता था और वहीं ऑफिस के स्टोर रूम में मालिक ने उसे रहने की अनुमति दे रखी थी। 

रिद्धिमा एम.  कॉम. करने के बाद सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रही थी।

कोई भी माता-पिता जानबूझकर कर अपनी बेटी का विवाह ऐसे लड़के से नहीं कर सकता जो उनकी बेटी के लायक ना हो। उसे हीन दृष्टि से ही देखा करते थे सब। पर प्यार तो अंधा होता है। रिद्धिमा भी तो अंधी ही हो गई थी उसके प्यार में… जिसमें प्यार से ज्यादा जुदाई… विरह वेदना ही उसके जीवन में लिखी थी।

सालभर ही तो हुआ था सुशांत का दुबारा रिद्धिमा की जिंदगी में आए हुए। बारह साल के बाद लौट आया था उसका बचपन का दोस्त जो उसका प्रेमी बन गया और अब वो हमेशा के लिए उससे दूर जाने की बात कर रहा था।

“जाना ही था तो फिर मेरी जिंदगी में दुबारा आए ही क्यों। मैं तुम्हें अपना दोस्त मानती थी और अब एकतरफा प्यार समझूंगी… अपनी नादानी समझ कर भूल जाऊंगी। तुमने जो कहानी सुनाई अपने घर से भागकर यहांँ हमारे शहर आने की वो झूठ समझ लूंगी। तुम मेरे लिए नहीं आए थे बल्कि तुम परीक्षा में फेल होने के बाद घर से भागे थे। सच यही है कि तुमको कभी मुझसे प्यार था ही नहीं। मैं ही पागल थी जो यह समझती रही मेरे सुशांत ने मेरे लिए कितना त्याग किया।‌ 

मेरा वो तुम्हारी खैरियत के लिए हर मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में मथ्था टेकना और मन्नतों के वो धागे बांधना सब एक सपने की तरह भूल जाऊंगी।”

“रिद्धि मुझे जाना होगा। मेरे परिवार वालों को मेरी जरूरत है। मुझे समझने की कोशिश करो। मेरे कारण मेरे माता-पिता पहले ही बहुत तकलीफ़ झेलें हैं अब मुझे प्रायश्चित करना है।”

“यह बात तुम्हें उस समय क्यों नहीं समझ आई जब तुम घर छोड़कर भागे थे। एक मरीचिका की तरह है तुम्हारा प्यार। तुम किसी के नहीं हो सकते। मैंने आज तक तुम्हारे सिवाय किसी लड़के को अपना दोस्त नहीं बनाया। मैंने तुमसे सच्चा प्यार किया है इस तरह मुझे छोड़ कर मत जाओ। एक बार मेरे माता-पिता का मन जीतने की कोशिश तो करो। मुझसे शादी करोगी सिर्फ झूठ बोला करते थे तुम। अब जब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती तुमसे शादी करके घर बसाना चाहती हूं तब तुम मुझे छोड़ कर जा रहे हो।”

“मुझे जाना पड़ेगा। मेरे मांँ पापा मुझे बुला रहें हैं अपने पास उन्हें मेरी जरूरत है।”

“और मेरे परिवार वालों को नहीं है क्या मेरी जरुरत।”

बड़ा तड़पा था उसका मन जब वो सुशांत पर चीखी चिल्लाई थी फिर गिड़गिड़ाई भी थी।

” मत जाओ मुझे छोड़कर। तुम जैसा जहांँ जिस हाल में रखोगे मैं रह लूंगी। तुम्हारे साथ झुग्गी भी महल है मेरे लिए।”

उसे किसी बात का असर ही नहीं पड़ा था उस दिन। कितना निष्ठुर हृदय विहीन हो गया था वो उस दिन।

रिद्धिमा घर से निकल बस में खिड़की के सामने वाली सीट पर बैठी सुशांत से हुई पिछली मुलाकात याद कर रही थी। कल रात ही तो उसने फोन किया था…

“एक बार मिलने आ जाओ, वहीं लालकिले के पास जहांँ पहली बार तुझे देखा था। मैं तेरी यादों के सहारे पूरा जीवन बिता लूंगा।”

“और मैं क्या करूंगी तुम्हारे बिना? अब इस जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती जिस में तुम साथ ना हो। पापा मेरी शादी अपने पसंद के लड़के से करवा देंगे। मैं किसी और से शादी नहीं कर सकती। तुम अचानक क्यों बदल गए। क्या वो सारी बातें झूठी थी जो तुमने मुझे बताई थी।”

“कुछ झूठ नहीं था। बस एक बार आ जाओ।”

खुद को नहीं रोक पाई थी और उससे मिलने जा रही थी। पर नहीं मिल पाई वो उस रोज। लालकिले वाला वो बस स्टाप आ गया था जहांँ उसे उतरना था। बारिश तेज हो रही थी उसने खिड़की से देखा वो बाहर भीग रहा था। वो जानती थी कि उसे ऐसे विदा नहीं कर पाएगी।

 बस में गाना बज रहा था … 

चार दिनों का प्यार ओ रब्बा बड़ी लंबी जुदाई…

वो आज घर से यही सोचकर निकली थी कि वो सुशांत के साथ भाग जाएगी। कुछ गहने और पैसे भी उसने अपने बैग में  रख लिए थे। पर उसके सामने अपने मांँ पापा का चेहरा घूमने लगा। जो गलती सुशांत ने उस समय की थी जब वो मात्र तेरह साल का था वही गलती तेईस साल की रिदिमा करने जा रही थी। वो देखती ही रही सुशांत को बारिश में भीगते हुए बहुत देर तक जब तक वो उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गया। लौट आई घर और माँ के गले लग रोने लगी।

“क्या हुआ बिटिया। रो क्यों रही है। जिस काम से गई थी वो नहीं हुआ क्या। चिंता मत कर खुद पर विश्वास रख भगवान ने तेरे लिए कुछ अच्छा ही सोचा होगा।”

रिद्धिमा की मांँ को लगा था कि बेटी किसी परीक्षा में असफलता मिलने के कारण रो रही है।

हांँ वो असफल ही तो हो गई थी अपने प्रेम में।

अगले ही दिन से उसकी शादी की बात चलने लगी। 

“तेईस साल की हो गई है। पढ़ाई भी पूरी हो गई नौकरी अपने ससुराल में ही करेगी।” भाई ने जब यह कहा तो उसने अपने पिता से सिर्फ साल भर की मोहलत मांगी। 

इस साल भर में उसने विरह की अग्नि में तपते हुए भी खुद को झोंक दिया प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में और उसने बैंकिंग की पी. ओ. परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। 

उसके पिता बहुत खुश थे वो अपने मकसद में कामयाब जो हो गए थे। बेटी के अच्छे भविष्य के लिए सुशांत से उसे दूर करके। उसे दूसरे शहर के सरकारी बैंक में नौकरी के लिए जाना था।

बीस साल बीत गए अब माता-पिता दोनों इस दुनिया में नहीं थे। उसने शादी नहीं की। भाई ने भी उसकी जिंदगी में दखल देना छोड़ दिया।

मन से सुशांत की जो थी तो तन से किसी और की कैसे होती। वो बचपन का प्यार फिर जवानी में बिताए पल वो कभी भूल ही नहीं पाई।

हर तीन साल पर तबादला होता रहा और एक नया शहर उसका बांहें पसार स्वागत करता। पर उस विरहन के लिए सारे शहर एक समान ही थे। वो कब उसी शहर में आ गई पता ही नहीं चला जहांँ कभी सुशांत के साथ शादी कर उसके घर यानी अपने ससुराल आना चाहती थी।

एक दिन उसके सपनों का वो शहजादा जो मृग मरीचिका के समान उसके जीवन में आता और चला जाता फिर उसके सामने खड़ा था। अपने नए बिजनेस के लिए बैंक से लोन पास करवाने के लिए आया था।

जैसे ही सुशांत से नजरें मिली उसके हाथ से कलम छूट गई।

“रिद्धि तुम यहाँ… कैसी हो?”

बड़ी मुश्किल से रिद्धिमा ने खुद को संभाला था। 

“प्लीज़ सर गिव मी ऑल पेपर्स। आदरणीय अपने सभी कागजात दिखाईए।”

सुशांत समझ गया था ऑफिस टाइम में वो उससे बात नहीं करेगी। पर बिना बात किए वो नहीं जाएगा। इस विरह की अग्नि में तो वो भी वर्षों से जला है। भले बालों पर चांदी झलक आई है पर वो बचपन का प्यार अभी भी जीवित था उसके मन में। यह विरह की आग दोनों तरफ बराबर जलती रही थी।

वो बैंक बंद होने और रिद्धिमा के बाहर निकलने का इंतजार करता रहा।

“कैसी हो रिद्धि ? पहचाना नहीं क्या मुझे?”

“तुम्हें कैसे भूल सकती हूंँ। अच्छा बताओ तुम्हारी पत्नी और बच्चे कैसे हैं?”

सुशांत हंसते हुए बोला…

“कौन सी पत्नी और बच्चे? मैंने तो शादी ही नहीं की। 

तुम बताओ तुम्हारे पतिदेव कैसे हैं। बहुत स्मार्ट और पढ़े लिखे खूब पैसे वाले होंगे।”

जवाब में रिद्धिमा भी मुस्कुरा दी।

 सुशांत ने उसके चेहरे की तरफ ध्यान से देखा ना माथे पर बिंदी ना सिंदूर ना गले में मंगलसूत्र और ना ही हाथों में चूड़ियां।

“क्या देख रहे हो सुशांत? मेरे शादी शुदा होने का कोई प्रमाण नजर नहीं आ रहा ना।”

“ओह सॉरी! तुम्हारे पति अब इस दुनिया में नहीं रहे।”

“नहीं सुशांत ऐसा नहीं है जो तुम समझ रहे हो। मैं तुम्हारे सिवाय किसी और से शादी कर ही नहीं सकती थी।

अच्छा अब सच बताओ तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गए थे।”

“सच जानना चाहती हो तो सुनो… तुम्हारा भाई और पापा आए थे कुछ गुंडों को साथ लेकर उस कम्पनी के ऑफिस में जहांँ मैं उस समय काम करता था। उन्होंने हम दोनों को एक साथ देख लिया था। मुझे अपनी जान की परवाह नहीं थी पर जब तुम्हारे भाई ने कहा वो अब अगर कभी तुमको मेरे साथ देखेगा तो मार डालेगा हम दोनों को। मुझे शहर छोड़ने और तुमसे हमेशा दूर रहने के लिए मजबूर किया था। मेरे मांँ पापा को भी मारने की धमकी दी थी तुम्हारे भाई ने। मेरे पास कोई चारा नहीं था।”

“अब कैसे हैं तुम्हारे मांँ पापा।”

“वो दोनों अब नहीं रहे। मैंने यहांँ आकर अपनी पढ़ाई दुबारा शुरू की । तुम्हारे काबिल तो नहीं बन सका पर जो भूल की थी उसे सुधारने की कोशिश की। अब अपनी खुद की कम्पनी खोल ली है। पैसा भी अच्छा खासा कमा लेता हूं।”

“अच्छा! “

 “क्या मुझसे शादी करोगी?”

सहर्ष मौन स्वीकृति दे दी थी रिद्धिमा ने उसके गले लग कर। दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली। रिद्धिमा ने सुशांत के घर में जब राधाकृष्ण की वो मूर्ति देखी जो उसने उसे उपहार स्वरूप दी थी।

तुमने इतने सालों से इसे संभाल कर रखा है। हांँ मेरी राधिका मैं तुम्हारा कृष्ण… अब हमारे विरह की बेला समाप्त हो गई है। इस जीवन के अग्निपथ पर हम दोनों अब साथ साथ ही चलेंगे। अब भले कुछ भी हो जाए एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे।