रक्षा बंधन का वातावरण कन्फ्युजिया रहा था। अभी ठीक से औंघना भी बंद नहीं हुआ था कि मोबाइल के इन बॉक्स में चार मैसेज धमकी की तरह धमक गये। मुन्नी, गुडिय़ा, रुकिया, छुटकी के मैसेजों की भाषा कोई भी हो, मतलब एक ही निकल रहा था- भैया, हम राखी बांधने आ रही हैं।

फुन्नन हड़बड़ा कर उठ बैठे। सारी औंघयाहट फुर्र हो गई। अबे यार, जे हो क्या रिया है, फुन्नन हैरान थे। अभी वेलेंटाइन डे की खुमारी से नहीं उबरे थे। यह रक्षाबंधन कहां से आ गया और क्या हमारे लिये ही आ गया। आ गया तो आ गया मगर इन कन्याओं को क्या हो गया है। पुरा भर की लड़कियां हमें राखी बांधो अभियान छेडऩे जा रही हैं। हम और हमारी कलाई इत्ती फालतू है क्या।

वेलेंटाइन डे कैसा मजे-मजे में कटा था। पूरे दिन मौजाईं-मौजा रही। बस, किला गेट पर स्थिति थोड़ी पटरी से उतरी थी। वे रुकिया के मुंह में गोलगह्रश्वपा सेट कर रहे थे कि बजरंगी प्रगट हो गये। चीखे, यही संस्कृति है।

फुन्नन सिटपिटया गये। नहीं, रुकिया है, उन्होंने समझा कि बजरंगी रुकिया का नाम पूछ रहे हैं।

तेरी तो, तुम हमाओ मरौ मुंह देखो जो आगे बढ़ौ तौ, रुकिया बीच में आ गई थी।
रुकिया, कछू तौ सोचौ, कलई तौ तुमाये मोबाइल में बैलैंस डरवाऔ थौ हमने, बजरंगी रुआंसे हो रहे थे। अब नईं डरवइयो। बड़े आये बैलेंस डरवाबे बारे।

फुन्नन समझ गये कि बजरंगी सैध्दांतिक रूप से वेलेंटाइन का सम्मान करते हैं लेकिन उनका बैलेंस कहीं और काम आने लगे तो आदमी के पास एक ही रास्ता बचता है कि वह संस्कृति की रक्षा करने के लिये मुग्दर लेकर निकल पड़े।

मुन्नी पंचतंत्र पार्क पे मर मिटीं थीं। कुन्ने वाले बरगद के नीचे तुमाये संगे बैठ कर मक्का के फूला, अरे पोपकौन, खाबौ भौत अच्छौ लगत हैगौ। कोऊ कौं दिखात नईंयां उतैं से। भज्जू भैया तौ बिदक रये थे के आज बेलनटैन डे हैगौ। लड़किन को घर से नईं निकलनौ चइये। बिगड़ जाती हैंगी। अकेले हम तो जानत थे के भज्जू कम्मो को छोड़बे स्कूल जात हैंगे। बे आगे-आगे ठुमकती चली जाती हैं। भज्जू पीछे-पीछे जात हैं। सो इतैं भज्जू निकरे। उतैं टैम्पू पकड़ के हम चले आये।

गुडिय़ा कामकाजी थीं। परकटियन की भांति मुंह उठा कर घूमने-फिरने को वे बिगड़ जाना मानती थीं। ऊंचे परिवार की थीं। इसलिये बिगडऩा नहीं चाहती थीं। लेकिन जाने क्यों, गुडिय़ा को फुन्नन शाहरूख खान लगने लगे थे।

इधर, फुन्नन जब ठलुआ होते, कहीं मटरगस्ती करने जाने का मन नहीं होता तो छत पर ठंडी हवा खाने आ जाते। मोबाइल में भरा गाना लगा देते। याद में तेरी जाग-जाग के हम, रात भर करवटें बदलते हैं। उन्हें पुराने गाने पसंद थे। आज के जमाने के गाने सुनना लोफरगिरी लगता था।

तभी नीचे गुडिय़ा को हड़बड़ा कर याद आ जाता कि ऊपर कपड़े सुखाने जाना है। गुडिय़ा आ जातीं, फुन्नन कोई सस्ती सी टॉफी उनके मुंह में रख देते कि तुमाये हाथ गीले हैंगे, लाओ हम खवा दैं। टॉफी मुंह में घुलती रहती। गुडिय़ा पिघलती रहतीं। तब तक पिघलती रहतीं जब तक नीचे से अम्मा चीखने नहीं लगतीं, गुडिय़ा… कहां मर गईं भैंस को पानी नईं दैना है का। 

यही गुडिय़ा सबरे पन्नी भर कर हलुआ छत पर रख गई थीं। एक चिट दबा कर, खा लइयो। हमने बनाओ है, तुमें हमाई सौं। आज वैलनटान डे हैगौ। फुन्नन ने ठूंस कर हलुआ सूंता था और छुटकी को साइकिल पर बैठा कर डैम की तरफ निकल गये थे। छुटकी ने कभी गरिया डैम नहीं देखा था। मचल रही थीं कि वेलेंटाइन डे पर गरिया डैम दिखाओ। नहीं तो काये के तुम और काये कौ वैलनटान। गरिया डैम की गहराई देख कर छुटकी ऐसी अभिभूत हुईं कि फुन्नन की गर्दन से ही लटक गईं।

सच्ची फुन्नन, तुमने काऊ और की तरफ देखौ तौ हम जई कूद जायेंगे। फुन्नन स्त्रियों की भावनाओं का सम्मान करते थे, इसलिये छुटकी बंधा में कूद जाएं, इसमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी। डर यह पैदा हो गया कि छुटकी आज ही उनकी गर्दन में लटके-लटके, उन्हें लेकर बंधा में न गिर जाएं। उन्होंने बड़ी मुश्किल से छुटकी को यह सूचना देकर गर्दन छुड़ाई कि उनकी आंखें कमजोर हैं। उन्हें और कोई दिखता ही नहीं है। जो कुछ हैं, छुटकी ही हैं जिनके लिये भगवान ने उन्हें बनाया है।

समय तेजी से गुजरा। यह कहैं कि बदला। रुकिया के फोन में कोई और बैलेंस डलवाने लगा था। वे उसका बैलेंस बजरंगी पर खर्च करने लगीं थीं। मुन्नी पंचतंत्र पार्क से ऊब गई थीं। वे टिल्लू की बाइक पर बैठ कर नारायण बाग जाने लगी थीं।

गुडिय़ा सीधी थीं। अम्मा नहीं चाहती थीं कि वे बिगड़ें, इसलिये उनकी शादी तय हो गई थी। और जब तक मुंह काला नहीं होता है, तब तक के लिये अम्मा ने आंखें तरेरी थीं कि बाहिर निकरीं तो टांग टोर डारेंगे। हालांकि उन्हें छत पर कपड़े सुखाने जाने की मनाही नहीं थी, इसलिये गुडिय़ा यह नियम निभा रही थीं। वे कपड़े सुखाने आतीं तो उनका दिया मोबाइल छाती में दुबका होता। एफएम पर कोई धूम धड़ाम सा गीत बज रहा होता।

छुटकी अब बड़ी हो गई थीं। जैसे कि बड़ी होकर हर कस्बाई लड़की बी टेक, बीसीए या ऐसा ही कुछ करने दिल्ली की ओर निकल जाना चाहती है, छुटकी भी निकल ली थीं। पिछले दिनों आयी थीं, कमर पर अटकी जीन्स तथा जीन्स से चार अंगुल ऊपर ठहर गई टी शर्ट में फंसी। तपाक से हाथ आगे बढ़ा दिया था, हाय फुन्नन, कैसे हो। फुन्नन सिटपिटया गये थे। पहचाने नहीं थे, पहचाने तो यह नहीं कह पाये कि चलो साइकिल पर बैठो, छुटकी, बंधा दिखा लाएं।

ऐसे में आज आ गया रक्षा बंधन। और न जाने कैसे इन सबके हृदय परिवर्तित हो गये थे। जो हमें राखी बांधने का परोगराम बना लिया था।
मगर पम्मो की कोई खबर नहीं थी, पम्मो जो हमें हर साल राखी बांधती थीं। उनकी मुंह बोली बहन थीं, पम्मो का सौन्दर्य ऐसा था कि आदमी के मन में उनके प्रति श्रद्धा ही उमड़ती थी। प्रेम उसके सामने होश खो बैठता था।

सुन्दरता नापने का शायद ही कोई पैमाना बना हो जिसमें उन्हें बैठाया जा सकता हो, इसलिये जब उन्हें सलमान खान बिना कमीज के ही अच्छे लगने लगे और उन्होंने कुछ-कुछ होता है- की नजर से फुन्नन को देखने की कोशिश की तो फुन्नन ने निकटतम् रक्षाबंधन पर ही उनके सामने कलाई प्रस्तुत कर दी थी। इक्कीस रुपया हाथ में रख कर चरण-स्पर्श कर लिये थे।

पम्मो के पिता जी दिल के साफ थे, वे फुन्नन को लम्पट मानते थे। उनकी धारणा थी कि बउ- बिटियन वाले घरों में फुन्नन को नहीं बैठाना चाहिये। उनकी नजर खराब है। इन्हीं पम्मो के पिता जी आज नीचे फुन्नन के बैठक में बैठे थे। वातावरण गम्भीर था, वे पम्मो के लिये फुन्नन का हाथ मांगने आये थे। वे फुन्नन के प्रति अपनी धारणा में संशोधन करना चाहते थे। यह ऐसे ही सम्भव हो सकता था कि फुन्नन के पांव पूजना शुरू कर दें।

उनके मन में फुन्नन के प्रति कोई मलाल इसलिये नहीं रहा था कि विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ था कि फुन्नन कचहरी में चपरासी हो गये हैं और फुन्नन का परिवार इस खबर को तब तक गुप्त रखना चाहता था, जब तक फुन्नन पहली तनखा नहीं ले आते हैं। लेकिन पूरा पुरा महल्ला यह भी जान गया था कि चपरासी के पद पर ताजपोशी के लिये दो बीघा खेत नजर हो गये हैं।

बहरहाल किसी को इससे क्या कि कितने खेत गये। लोग फुन्नन के पास सिफारिश लेकर आने लगे थे कि भैया तुम पुरा की नाक हो। अपुन को कौनऊ मुकदमा हारें नईं चइये। ऐसे होनहार दामाद को पाकर भला कौन पुरा निवासी धन्य नहीं होता? पम्मो के पिता जी इसके लिये फुन्नन के परिवार की सारी क्षतिपूर्ति कर देने को भी बुरा सौदा नहीं मान रहे थे। बाद में तो मौड़ी को राज करने ही है।