झूठ बोलने
बात तब की है जब मेरा बेटा क्लास वन में पढ़ रहा था। एक दिन रविवार को पड़ोस की एक महिला सुबह-सुबह दरवाजा खटखटाने लगी, मैंने बाहर देखा तो चूंकि मैं तब ब्रश कर रही थी, मुझे कुछ असहज लगा। मैंने बेटे से कहला दिया कि कह दो मम्मी मौसी के घर कल से गई है, हैं नहीं। आप शाम को आइएगा। बेटा चूंकि अबोध था तभी उसने दरवाजा खोलकर कहा कि आंटी मम्मी कह रही हैं कि जाकर कह दो कि वे मौसी के घर पर हैं, इतना सुनकर वह खीझ कर लौट गई। मैंने वापस बेटे से पूछा तो उसने बताया कि मम्मा आंटी गुस्से में चली गईं। मैंने कह दिया कि मम्मा ने कहा है कह दो वे नहीं हैं। इतना सुनकर मुझे बड़ी पीड़ा हुई और तुरंत फिर कभी झूठ न बोलने की कसम खा ली।
 
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