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कांटों का उपहार

…. ‘दरवाजा उस तरफ है।’ राजा विजयभान सिंह ने मुस्कराते हुए एक ओर इशारा किया‒‘मगर तुमसे वह नहीं खुलेगा। काफी ताकत लगानी पड़ती है, क्योंकि पलड़े पत्थर के हैं।’

 राधा कुछ न बोली। तड़पकर रह गई।

 ‘यह हमारा रंगमहल है।’ राजा विजयभान सिंह ने फिर कहा‒‘यहां तुम्हें किसी वस्तु की कमी नहीं होगी। जब तक हमारी इच्छा होगी, तुम यहीं रहोगी, हमारी रानी बनकर। उसके बाद हम तुम्हें इतनी दौलत दे देंगे कि तुम जहां चाहो जा सकती हो और बहुत शान के साथ रह सकती हो।’

राधा के दिल पर बरछियां चल गईं। नफरत से उसने अपना मुंह फेर लिया, जिधर दीवारों पर बड़े-बड़े शीशे जड़े हुए थे। रात के झागदार प्रकाश में उसने अपनी अवस्था देखी तो दिल रो दिया। लटें बिखरी हुई थी, कपड़े जगह-जगह से फटे हुए, दिल की तड़प के आगे उसने इसका ध्यान ही नहीं किया था। शरीर पर अब भी चांदी के गहने चमक रहे थे। कानों में बड़े-बड़े झुमके, गले में मोटा हार। कलाइयों पर पहना कंगन रक्त से लथपथ था, अंगुलियों में कुछेक चांदी के छल्ले। एक अंगूठी पर लिखा था‒ राधा। सिर का मुकुट जाने कहां गिर गया था और करधनी कमर के नीचे लटक आयी थी। पैरों में पायल, बिछिया, हाथ-पैरों में रची-बसी मेहंदी की सुगंध शेष थी।

राजा विजयभान सिंह ने शीशे की एक अलमारी खोली। विदेशी शराब की अनगिनत बोतलें चमक उठीं। उसने अपना जाम भरा। फिर समीप ही रखे एक्वेरियम में छोटी-छोटी मछलियों को देखता हुआ बोला‒ ‘राधा! जितनी मछलियां इस एक्वेरियम की शान रही हैं, इतनी ही लड़कियां मेरी बांहों में भी आई हैं, जिस प्रकार इन मछलियों को पानी और चारे की कमी नहीं होती, उसी प्रकार मैं अपनी बांहों में आई लड़कियों को भी किसी वस्तु की कमी नहीं होने देता हूं। जिस मछली ने अपनी झूठी शान के कारण मेरी इच्छा से इनकार किया है, उसे मैं पानी से निकालकर फर्श पर छोड़ देता हूं, फिर जब यह तड़प-तड़पकर मरती है, तो मुझे बहुत आनंद आता है।’

 राधा ऊपर से नीचे तक कांप गई।

राजा विजयभान सिंह ने एक ही झटके में शराब खत्म की और जाम को फेंकते हुए ताली बजाई। दो दासियां उपस्थित हुईं अर्धनग्न-सी। उन्होंने झुककर अपने मालिक की आज्ञा की प्रतीक्षा की।

‘इस हसीना के शरीर से गांव की यह गंदगी दूर करके इस पर शाही नगीने जड़ दो।’ राजा विजयभान सिंह ने कहा।

दासियों ने आगे बढ़कर राधा को घेर लिया। उन्होंने उसके शरीर से गहने उतारे, गले का हार, झुमके, करधनी, पायल, बिछिया। राधा उसी प्रकार बुत बनी खड़ी रही, शादी के फटे हुए जोड़े में वह एक लुटी हुई विधवा लगने लगी। उन दासियों ने ज्यों ही उसके शरीर से कपड़े उतारने आरंभ किए, राधा की मुर्दा आत्मा में जाने कहां से जान आ गई। सहसा उसका हाथ हवा में लहराकर एक दासी के गाल पर इस प्रकार पड़ा कि वह छटपटाकर रह गई। तमाचे का स्वर सुनकर राजा विजयभान सिंह झट पीछे पलटा, लपककर वह राधा के सामने आया। उसे घूरकर देखा। फिर उसने दासियों पर दृष्टि डाली। वे पीछे हटकर दूसरी ओर चली गईं।

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