कैंसर कितने दिनों में फैलता है

फेफड़ों में कैंसर किस कारण होता है- इस विषय में कोई एक विशेष मत निर्धारित नहीं किया गया है। कई विशेषज्ञ इसके विभिन्न कारण बताया करते हैं। यही बात फेफड़ों के कैंसर के निदान के विषय में भी कही जा सकती है। विभिन्न विशेषज्ञ इसके निदान के विषय में भी विभिन्न मत निर्धारित करते हैं।

फेफड़ों का कैंसर महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक पाया जाता है। उसका कारण कदाचित् यही हो सकता है कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुष अधिक संख्या में और अधिक मात्रा में मद्यपान तथा धूम्रपान करते हैं। कोई भी देश क्यों न हो और कोई व्यक्ति कितना ही आधुनिक क्यों न बन गया हो, महिलाओं में मद्यपान की प्रवृत्ति प्रत्येक देश में पुरुषों की अपेक्षा कम मात्रा में पाई जाती है। यही बात धूम्रपान की भी है। यद्यपि मद्य की अपेक्षा धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या अधिक होती है।

कारण

धूम्रपान का फेफड़ों के कैंसर से सीधा संबंध है। वही बात मद्यपान की भी है। श्वास नली के माध्यम से तंबाकू का धुआं और मद्य का तरल पदार्थ सीधा फेफड़ों को जाकर स्पर्श करता है।

ग्रामीणों की अपेक्षा फेफड़ों का कैंसर नगर वासियों में अधिक पाया जाता है। नगरों में भी यह श्रमिक वर्ग तथा निम्न वर्ग के लोगों में अधिक पाया जाता है। दूषित वातावरण अथवा कल-कारखानों के समीप के निवासी इससे अधिक प्रभावित देखे गए हैं। धूम्रपान से तो इसका सीधा संबंध है, किंतु जो लोग कोलतार के कार्य से किसी प्रकार संबंधित हैं अथवा कोयले के धुएं से जिनका अधिक संपर्क होता है उनको भी यह रोग ग्रस लेता है।

इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति खादानों में काम करते हैं उनको भी फेफड़ों का कैंसर ग्रस लेता है। खानों में जो लोग कार्य करते हैं उनकी श्वास में धातु मिश्रित धूल कण फेफड़ों में पहुंचते हैं। इससे फेफड़ों का कैंसर होने की अधिक संभावना रहती है।

तंबाकू खाया जाए, पिया जाए, सूंघा जाए अथवा दबाया जाए-इन सब प्रकारों से तंबाकू का जो मल होता है, वह फेफड़ों में जाकर एकत्रित होता है। तंबाकू में निकोटीन आदि विषैले पदार्थ होते हैं, इनमें एक प्रकार का विष भी होता है। यही कारण है कि दिन पर दिन यह रोग अधिकाधिक बढ़ता ही जा रहा है।

किसी अन्य रोग के कारण भी कैंसर की उत्पत्ति हो सकती है। विशेषतया यक्ष्मा अथवा राजयक्ष्मा और ब्रोंकाइटिस आदि। फेफड़ों में सीधे कैंसर होने के साथ-साथ अन्य स्थानों के कैंसर की जड़ें जब फेफड़ों तक आती हैं तो उसके कारण भी फेफड़ों में कैंसर हो जाता है। दूसरी अवस्था में यह कैंसर अधिक व्यापक और भयंकर होता है क्योंकि जड़ों के रूप में यह चारों ओर स्वत: हो जाता है।

घातक है फेफड़ों का कैंसर 3

लक्षण

फेफड़ों के कैंसर का प्रथम लक्षण खांसी है। खांसी सूखी भी हो सकती है और बलगम भरी भी हो सकती है। यदि बलगम के साथ रक्त भी निकले तो फिर रोग के लक्षण स्वत: ही स्पष्ट हो जाते हैं। जो लोग धूम्रपान करते हैं वे समझते हैं कि उनकी खांसी धूम्रपान के कारण है इसलिए कभी-कभी वे इसके निदान में आलस कर जाते हैं अथवा  असावधान रह जाते हैं। खांसी किस समय और कितनी आती है इसकी कोई सीमा नहीं  है। यह कभी दिन को अधिक आ सकती है और किसी को रात्रि के समय अधिक आ सकती है। कभी सोते-सोते अधिक बढ़ जाया करती है। प्राय: सभी रोगियों में इस प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं।

इसका दूसरा लक्षण है छाती में पीड़ा का होना। यह पीड़ा संपूर्ण छाती में भी हो सकती है अथवा केवल उस ओर या उस स्थान पर जहां की व्याधि ने जन्म लिया है किंतु यह पीड़ा निरंतर बनी ही रहती है। कभी-कभी रोगी को ज्वर भी हो जाता है। यह ज्वर शरीर के अंगों में किसी भी प्रकार की अनियमितता के कारण होने लगता है। ज्वर के कारण रोगी चिकित्सक के पास जाता है तो चिकित्सक भी साधारण ज्वर समझ कर उसकी चिकित्सा करता है और उससे उसका ज्वर ठीक हो जाता है तो रोगी समझता है कि उसका ज्वर भाग गया है अत: वह स्वस्थ हो गया है किंतु उसका कैंसर तो बना ही रहता है।

इस प्रकार कैंसर घटने की अपेक्षा बढ़ता जाता है और फिर इसमें अन्य प्रकार के लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं। रोगी की श्वास फूलने लगती है। कफ के साथ रक्त निकलने लगता है। रोगी को निगलने में कष्ट होने लगता है। रोगी का स्वर भारी हो जाता है। श्वास लेने में कठिनाई अनुभव होने लगती है।

रोगी जब इन सबको किसी अन्य कारण से समझता है तो वह चिकित्सक को भी उसी अनुसार वर्णन करता है और उसका परिणाम यह होता है कि चिकित्सक ठीक निर्णय पर नहीं पहुंच पाता और रोगी का बाह्र उपचार होने लगता है। उससे कोई एक या सब लक्षण कम होने लगते हैं। ऐसी अवस्था में जो रोगी सावधान होता है और जो चिकित्सक निपुण होता है वह रोगी का सारा विवरण जान कर और उसके आस-पास के वातावरण को जान कर अनुमान लगा लेता है कि रोगी को ज्वर, श्वास, कफ आदि नहीं अपितु मुख्य रोग कैंसर है। अन्यथा जो असावधान होते हैं उनका वैसा ही उपचार चलता है और रोग बढ़ता जाता है।

लसिका वाहिनियां तथा रक्त वाहिनियां जिनका शरीर में जाल-सा बिछा होता है ये सब कैंसर के विस्तार में कारण बन जाया करते हैं। श्वास क्रिया भी इसके विस्तार में सहायक होती है। लसिका ग्रंथि और आवरण की झिल्ली तक यह रोग लसिका ग्रंथियों के माध्यम से पहुंच जाया करता है और जब इससे रक्त वाहिनियां नष्ट हो जाती हैं तो यह रक्त के माध्यम से शरीर के अन्य भाग जैसे मस्तिष्क, अस्थि, यकृत, वृक्क आदि स्थानों पर भी पहुंच जाया करता है। अंतराभ्रमण प्रक्रिया से यह फेफड़ों के भीतर भी फैलता है और फिर वहां से समीपस्थ अंगों को प्रभावित करता है।

सावधानियां

खांसी इसका प्रथम लक्षण है। यदि चिकित्सा द्वारा खांसी किसी प्रकार भी ठीक न हो रही हो तो उचित यही है कि सीने का एक्स-रे करा लेना चाहिए। एक्स-रे से इसका ज्ञान हो जाता है। किंतु रोग बढ़ जाने पर झिल्ली और फेफड़ों के बीच में पानी आ जाने से एक्स-रे में वह स्पष्ट नहीं होता इस कारण इसका पता भी नहीं चलता और छिप जाता है। ऐसी अवस्था में यही उचित है कि उस पानी को निकलवा कर पुन: एक्स-रे करवाना चाहिए और यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि उस पानी का वर्ण किस प्रकार का है। यदि वह पानी रक्तिम अथवा रक्त मिश्रित है तो यह निश्चिय करने में विलब नहीं करना चाहिए कि रोगी को कैंसर का रोग है। उस पानी का परीक्षण करवा लेना चाहिए और रोगी के फेफड़ों का पुन: एक्स-रे करवा लेना चाहिए।

इस प्रकार रोगी के कफ का भी परीक्षण करवा लेना चाहिए। इस संबंध में दो ही बातों का ध्यान में रखा जाता है। एक तो यह कि कफ में यक्ष्मा के जीवाणु हैं अथवा नहीं तथा दूसरे कैंसर कोशों की विद्यमानता है अथवा नहीं। इससे भी रोग का निर्णय करने में सुविधा होती है।

चिकित्सा

आधुनिक चिकित्सा पद्धति में विकिरण अर्थात् रेडिएशन चिकित्सा इसके लिए उपयुक्त बताई जाती है। किंतु कैंसर अधिक फैल न पाया हो और छोटा-सा ही हो तथा रोगी दुर्बल न हो तो चिकित्सक शल्य क्रिया द्वारा भी इसकी चिकित्सा कर सकता है। गांठ निकाल देने के उपरांत यदि चिकित्सक समझे कि रोग का कुछ अंश शेष रह गया है तो फिर उसको चाहिए कि वह विकिरण के द्वारा उसको समूल नष्ट कर दे। और जब यह पाया जाता है कि शल्य क्रिया द्वारा उसका उपचार नहीं हो सकता है तो फिर यही उचित है कि विकिरण द्वारा उसको कैंसर मुक्त किया जाए। 

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