गर्भावस्था में अगर मां आर एच निगेटिव हो और शिशु अपने पिता से आर एच पॉजिटिव हो, तो वे मां के इम्यून प्रणाली के लिए‘अजनबी’ हो जाते हैं। इम्यून प्रतिक्रिया में मांका सिस्टम इस एंटीबॉडी से लड़ने के लिए पूरी फौज तैयार कर लेता है, जिसे हम आरएच प्रतिकूलता कहते हैं। हर गर्भवती महिला की आरंभ में जांच द्वारा आर एच फैक्टर का पता लगाया जाता है। यदि वह महिला आर एच पॉजिटिव है तो इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा कि शिशु आर एच पॉजिटिव है या आर एच निगेटिव।
यदि मां आर एच निगेटिव हो, पिता भी आर एच निगेटिव हो तो शिशु भी आर एच निगेटिव होगा क्योंकि दो निगेटिव साथी एक पॉजिटिव बेबी नहीं बना सकते, लेकिन अगर आपका साथी आर एच पॉजिटिव है तो आपका शिशु भी आर एच पॉजिटिव हो सकता है,जिससे मां व शिशु के बीच प्रतिकूलता पैदा हो सकती है। पहली गर्भावस्था में यह समस्या नहीं बनती। यदि प्रसव, एबॉर्शन या मिसकैरिज के दौरान शिशु का रक्त मां के रक्त परिसंचरण तंत्र में मिल जाए तो परेशानी खड़ी हो जाती है। तब मां के शरीर में आर एच फैक्टर के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा हो जाती हैं।

मां जब तक दूसरे आर एच पॉजिटिव शिशु के साथ गर्भवती नहीं होती, तब तक वे एंटीबॉडीज़ कोई नुकसान नहीं पहुंचाती। बाद में वे प्लेसेंटा को पार कर,शिशु की लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला कर देती हैं। जिससे भ्रूण में हल्के से ले कर गंभीर एनीमिया तक हो सकता है।ऐसा बहुत कम होता है कि ये एंटीबॉडीज़ पहली गर्भावस्था में कोई नुकसान पहुंचाएं। ऐसी स्थिति से निबटने का सबसे बड़ा उपाय यही है कि एंटीबॉडीज बनने ही न दिए जाएं। 28वें सप्ताह में डॉक्टर आर एच निगेटिव गर्भवती महिला को आर एचइम्यून-ग्लोव्यूलिनका इंजेक्शन देते हैं। इसे आर एच ओगैम कहते हैं।
अगर रक्त की जांच से पता चले कि शिशु आर एच पॉजिटिव है तो प्रसव के 72 घंटे बाद एक और खुराक दी जाती है। अगर शिशु आर एच निगेटिव है तो किसी इलाज की जरूरत नहीं है। यह इंजेक्शन; किसी मिसकैरिज,एक्टोपिक प्रेगनेंसी, एबॉर्शन, कोरिओनिक विल्ससैंपलिंग, एम्निओसेंटेसिस, योनि से रक्तस्रावया सदमे के दौरान भी दिया जाता है।यदि इसे जरूरत पड़ने पर तीन कर दिया जाए तो आनेवाली गर्भावस्था काफी सुरक्षित हो जाती है। यदि किसी आर एच निगेटिव गर्भवती महिला को पिछली गर्भावस्था में आर एच ओगैम नहीं दिया गया था और टेस्ट से पता चलता है कि उसके शरीर में आर एच एंटी बॉडीज पैदा हो गई हैं तो एम्निओसेंटेसिस की मदद से भ्रूण के रक्त की जांच हो सकती है।
यदि यह आर एच निगेटिव है तो मां व शिशु का रक्त अनुकूल होगा और किसी इलाज की जरूरत नहीं पड़ेगी। यदि यह आर एच पॉजिटिव है और मां के रक्त से मेल नहीं खाता तो मां के शरीर में एंटीबॉडी के स्तर का नियमित रूप से ध्यान रखना होगा।यदि यह स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाए तो अल्ट्रासाउंड की मदद से भ्रूण की स्थिति का पता लगाया जाता है। यदि उसके लिए किसी प्रकार का खतरा पैदा हो जाए तो, भ्रूण के आर एच निगेटिव रक्त आधान (ब्लडट्रोसफ्यूज़न) जरूरी हो जाता है।
आर एच ओगैम के प्रयोग से रक्त आधान (ब्लड ट्रांसफयूजन) की नौबत नहीं आती और आने वाली गर्भावस्थाएं भी काफी हद तक सुरक्षित हो जाती हैं। रक्त में दूसरी अनियमितताओं की वजह से भी ऐसी प्रतिकूलता पैदा हो सकती है जैसे कैल एंटीजन, हालांकि ये आर एच फैक्टर के मुकाबले कम ही होते हैं।यदि मां को ये एंटीजन नहीं है और पिता के पास हैं तो इससे समस्या पैदा हो सकती है। पहले रूटीन टेस्ट में मां के शरीर में एंटीबॉडीज की जांच की जाती है। यदि एंटीबॉडीज पास आते हैं तो शिशु के पिता की जांच होती है कि कहीं वह पॉजिटिव तो नहीं। ऐसी स्थिति में वही चिकित्सा होती है, जैसे कि आर एच प्रतिकूलता में होती है।
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