1.प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व सोकर उठें। रात्रि में अधिक देर तक जागें नहीं।

2.प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम करें। तैरने से अच्छा व्यायाम हो जाता है। सप्ताह में कम से कम एक बार पूरे शरीर की मालिश करें।

3.सुबह-शाम टहलना लाभदायक है। नियमित रूप से टहलने से सम्पूर्ण शरीर की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं, रक्तसंचार बढ़ता है, शरीर में चुस्ती-फुर्ती आती है, धमनियों में रक्त के थक्के नहीं बनते। हृदय रोग, मधुमेह और ब्लडप्रेशर में लाभ पहुंचता है।

4.धूप, ताजी हवा, साफ-स्वच्छ पानी और सादा-सात्विक भोजन स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है।

5.नित्य योगासन-प्रणायाम करने से रोग नहीं होते और दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है।

6.स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है, इसलिए शरीर को स्वस्थ रखें। सदाचारी, निरोगी व्यक्ति सदा सुखी रहता है।

7.तेज रोशनी आंखों को नुकसान पहुंचाती है। इसलिए अपनी आंखों को तेज रोशनी से बचा कर रखें।

8.स्नान करते समय पहले सिर पर जल डालना चाहिए, उसके बाद अन्य अंगों पर। जल न तो अति शीतल हो और न बहुत गर्म। स्नान के बाद किसी मोटे तौलिये से अच्छी तरह रगड़कर शरीर पोंछना चाहिए।

9.स्वाद के लिए नहीं, स्वस्थ रहने के लिए भोजन करना चाहिए।

10.भोजन न करने से तथा अधिक भोजन करने से पाचकाग्रि दीप्त नहीं होती। भोजन के अयोग, हीनयोग, मिथ्यायोग और अतियोग से भी पाचकाग्रि दीप्त नहीं होती है।

11. पानी या दूध तेजी से न पिएं। इन्हें धीरे-धीरे पिएं। 

12.भोजन के बाद दांतों को अच्छी तरह साफ करें, अन्यथा अन्न कणों के लगे रहने से उनमें सड़न पैदा होगी।

13.हल्का और जल्दी पचे, ऐसा ही भोजन करना चाहिए। सड़ी-गली या बासी चीजें खाने से रोग होता है। खूब गरम-गरम खाने से दांत तथा पाचन-शक्ति दोनों की हानि होती है। जरूरत से अधिक खाने से अजीर्ण होता है यही अनेक रोगों की जड़ है।

14. प्रतिदिन चार-पांच तुलसी की पत्तियां खाने से ज्वर आदि रोग नहीं होते।

15.भोजन के पश्चात् दिन में थोड़ा विश्राम तथा रात में टहलना अच्छा रहता है।

16.हमेशा शान्त और प्रसन्न रहें। कम बोलने की आदत डालें। जितना जरूरी हो उतना ही बोलें।

17.चिन्ता से हानि होती है, लेकिन तत्त्व के चिन्तन-मनन से बुद्धि का विकास होता है।

18.प्रतिदिन आंखों में अंजन लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है।

19.रात में एक तोला त्रिफला को एक पाव ठंडे पानी में भिगो दें, सुबह छानकर उससे आंखें धोएं और बचे हुए जल को पी जाएं।

20.नित्य मुख धोने के समय ताजे ठंडे पानी से आंखों में छींटे लगाएं। इससे आंखें स्वस्थ रहती हैं।

21.हफ्ते-दस दिन के अन्तर पर कानों में तेल की कुछ बूंदें डालनी चाहिए।

22.बिस्तर के गद्दे-तकिये, चादर आदि को समय-समय पर धूप में डालना चाहिए।

23.सोने के स्थान को साफ-सुथरा रखें। नींद आने पर ही सोना चाहिए। बिस्तर पर पड़े-पड़े नींद की राह देखना रोग को आमन्त्रित करना है। दिन में सोने की आदत न डालें।

24.मच्छरों को दूर करने का उपाय करें। वे रोगों को फैलाने में सहायक होते हैं।

25.अगरबत्ती, कपूर अथवा चंदन का धुआं घर में हर रोज कुछ क्षणों के लिए करें। इससे घर का वातावरण पवित्र होता है।

26.श्वास सदा नाक से सहज ढंग से लें। मुंह से श्वास न लें, इससे आयु कम होती है।

27.उत्तम विचारों से मानसिक सुख तथा स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

28.अच्छा साहित्य पढ़ें। अश्लील एवं उत्तेजक साहित्य पढ़ने से बुद्धि भ्रष्टï होती है इससे बचें तथा दूसरों के अच्छे गुणों को अपनाएं।

29.सुबह उठते ही आधा सेर से एक सेर तक ठंडा पानी पीना चाहिए। यदि पानी तांबे के बरतन में रखा हुआ हो तो अधिक लाभप्रद होगा।

30.कपड़छान किये नमक में कडुआ तेल मिलाकर दांत और मसूड़ों को रगड़कर साफ करना चाहिए। इससे दांत मजबूत होते हैं और पायरिया से भी मुक्ति मिल सकती है।

31.धूप का सेवन अवश्य करना चाहिए। इससे शरीर को पोषकतत्त्व की प्राप्ति होती है।

32.मैदे की बनी हुई और तली हुई चीजों से परहेज करना चाहिए।

33.हर समय माथा और पेट ठंडा तथा पैर गरम रखना चाहिए।

34.सप्ताह में केवल नीबू-पानी पीकर एक दिन का उपवास करें। इससे पाचन शक्ति सशक्त होगी और स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। यदि पूरा उपवास न कर सकें तो फल खाकर या फल का रस पीकर उपवास करें।

35.पचास से अधिक उम्र होने पर दिन में एक ही बार अन्न खाएं। बाकी समय दूध और फलपर रहें।

36.भोजन में मौसमी फलों का उपयोग अवश्य करें।

37.भोजन करते समय और सोते समय किसी प्रकार की चिन्ता, क्रोध या शोक न करें।

38.सोने से पहले पैरों को धोकर पोंछ लेने, कोई अच्छी स्वास्थ्य संबंधी पुस्तक पढ़ने और अपने इष्ट देव को स्मरण करते हुए सोने से अच्छी नींद आती है।

39.रात्रि का भोजन सोने से तीन घंटे पहले करना चाहिए। भोजन के एक घंटा बाद फल या दूध लें।

40.सोते समय मुंह ढककर नहीं सोयें। खिड़कियां खोलकर सोयें। सोने का बिस्तर बहुत मुलायम न हो।

41.तेल-मालिश के बाद स्नान करना आवश्यक है। तेल से त्वचा के रोमकूप मैल से भर जाते हैं, जो लाभ के बदले हानि पहुंचाते हैं। यदि स्नान न करने की कोई बाध्यता हो तो गुनगुने पानी में तौलिया भिगोकर अच्छी तरह शरीर पोंछ लें।

42.सुबह-सुबह हरी दूबपर नंगे पांव टहलना भी काफी लाभप्रद है। पैर पर दूब के दबाव से तथा पृथ्वी क संपर्क से कई रोगों की चिकित्सा स्वत: हो जाती है।

43.न तो इतना व्यायाम करना चाहिए और न तो इतनी देर टहलना चाहिए कि काफी थकावट आ जाए। टहलने और व्यायाम के लिए सूर्योदय का समय ही सबसे उत्तम है।

44.भोजन से पहले हाथ-पैर पानी से धोकर कुल्ला-गरारा करना स्वास्थ्यप्रद होता है।

45.भोजन से पहले प्रारम्भ में और अन्त में अधिक मात्रा में जल न पिएं। बीच में दो-तीन घूंट पानी पी लेना चाहिए।

46.गरम दूध तथा जल पीकर तुंरत ठंडा पानी पीने से दांत कमजोर हो जाते हैं।

47.शयन करते समय सिर उत्तर या पश्चिम में रखकर नहीं सोना चाहिए। धूप में सोना हो तो सिर सूर्य की ओर करके सोएं और धूप में बैठना हो तो ऐसे बैठें कि पीठ पर धूप पड़े।

48.कपड़ा, बिस्तर, कंघी, ब्रश, तौलिया, जूता-चप्पल आदि वस्तुएं परिवार के हर व्यक्ति की अलग-अलग होनी चाहिए। दूसरे की वस्तु उपयोग में न लाएं।

49.दिन और रात में कुल मिलाकर कम से कम तीन लीटर पानी पीना चाहिए। इससे शरीर की अशुद्धि मूत्र के द्वारा बाहर निकल जाती है तथा रक्तचाप आदि पर नियन्त्रण रहता है। 

50.प्रौढावस्था शुरू होते ही चावल, नमक, घी, तेल, आलू और तली-भुनी चीजें खाना कम कर देना चाहिए। 

51.केला, दूध, दही और मट्ठा  एक साथ नहीं खाना चाहिए।

52.कटहल के बाद दही और मट्ठा एक साथ नहीं खाना चाहिए।

53.शहद के साथ उष्णवीर्य पदार्थों का सेवन न करें।

54.दूध के साथ इन वस्तुओं का प्रयोग हानिकारक होता है- नमक, खट्टï फल, दही, तेल, मूली, और तोरई।

55. दूध के साथ इन पदार्थों का सेवन किया जा सकता है- आंवला, मिश्री, चीनी, परवल, अदरक, सेंधा नमक।

56.दही के साथ किसी भी प्रकार का उष्णवीर्य पदार्थ- कटहल, दूध, तेल, केला, आदि खाने से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। रात को दही खाना निषिद्ध है। शरद और ग्रीष्म ऋतु में दही खाने से पित्त का प्रकोप होता है। रक्त, पित्त और कफ संबंधी रोगों में भी दही का सेवन नहीं करना चाहिए।

57.दूध और खीर के साथ खिचड़ी नहीं खानी चाहिए।

58.कांसे और पीतल के बर्तन में घी रखने से विषतुल्य हो जाता है।

59.शहद और घी समान मात्रा में सेवन करना अत्यन्त हानिकारक हो जाता है।

60.पढ़ना-लिखना आदि आंखों के द्वारा होने वाला कार्य लगातार काफी देर तक न  करें। बीच-बीच में नेत्र बंद करके उन पर उंगलियां फेरें और दूर की किसी वस्तु पर नजर जमाएं।

61.गर्मी में धूप आकर तत्काल स्नान न करें और न तो हाथ-पैर या मुंह धोयें। थोड़ा विश्राम करके, पीसना सूख जाने पर जब शरीर तापमान सामान्य हो जाए, तभी स्नान करें।

62.देर रात तक जागना या सुबह देर तक सोते रहना आंखों और स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं है।

63.अधिक वसायुक्त आहार, धूम्रपान एवं मांसाहारी भोजन हृदय के लिए नुकसानदेह होते हैं। ये रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं।

64.नियमित व्यायाम से शरीर की क्षमता बढ़ती है। शरीर में हानिकारक तत्त्वों की मात्रा घटती है। नियमित योग एवं व्यायाम, कम वसायुक्त भोजन तथा नियमित दिनचर्या से अनेक रोग स्वत: समाप्त हो जाते हैं।

65.तम्बाकू, शराब, चरस, अफीम, गांजा आदि जहर से भी खतरनाक हैं। नशीले पदार्थों के सेवन से धन और स्वास्थ्य दोनों से हाथ धोना पड़ता है।

66.नियमित समय पर प्रात: जागकर शौच जानेवाला, समय पर भोजन करने और सोने वाला व्यक्ति स्वस्थ, संपन्न और बुद्धिमान होता है।

67.भोजन करने के बाद लघुशंका अवश्य करनी चाहिए। इससे गुर्दे स्वस्थ रहते हैं।

68. सही मुद्रा में चलने-बैठने का अभ्यास करना चाहिए। चलते समय पैर को घिसटते हुए, ठोड़ी को आगे निकालकर या झटका देकर नहीं रखने चाहिए। बैठते समय पीठ सीधी रखकर बैठें।

69. धूप, वर्षा और शीत की अति से शरीर को बचाना चाहिए। इन तीनों के अति सेवन से आयु कम हो जाती है।

70.अत्यधिक भीड़-भाड़ तथा सीलन युक्त स्थान स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता।

71.प्रगाढ़ निद्रा में सोये व्यक्ति को नहीं जगाना चाहिए।

72.सुबह उठते ही यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि आज दिनभर न तो किसी की निन्दा करूंगा और न ही क्रोध करके किसी को भला-बुरा कहूंगा। 

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