महिला सशक्तिकरण कानून

स्त्रियों से जुड़े तो न जाने कितने ही विषय ऐसे हैं, जिन पर खुद स्त्रियां ही बात नहीं करना चाहतीं। माहवारी भी एक ऐसा ही सबजेक्ट है। फिर आपने इस विषय को कब, कैसे और क्यों चुना?

सृजन फाउंडेशन के माहवारी स्वच्छता अभियान ‘हिम्मत’ की शुरुआत 28 मई, 2015 को हुई। अभियान की प्रेरणा थी, दिल्ली की एक कवयित्री की इसी विषय पर लिखी कविता। यह कविता इतनी मर्मस्पर्शी थी कि एक बार पढ़ने के बाद ही मन में विचार आ गया था कि अब मुझे केवल इसी विषय पर काम करना है। महिला सशक्तीकरण के लिए सबसे पहली जरूरत है, महिला स्वास्थ्य। यदि महिला स्वस्थ एवं स्वच्छ ही नहीं है तो हम उसे किसी भी और दिशा में कैसे सशक्त होने के लिए समझा सकते हैं। पूरे परिवार की जिम्मेदारी एक महिला अपने कंधों पर ले लेती है, लेकिन अपने ही स्वास्थ्य के प्रति वह उदासीन रहती है। ये समाज महिलाओं के दम पर टिका है, इसलिए अगर एक महिला ही स्वस्थ या स्वच्छ नहीं है तो पूरा का पूरा समाज भी बीमार ही होगा। इसी विचार के चलते महिला सशक्तीकरण के लिए हम लोगों ने बुनियादी चीज से शुरुआत की है कि सबसे पहले महिलाओं को स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना होगा। स्वस्थ और स्वच्छ रहने में भी हम लोगों ने महिलाओं से जुड़ा माहवारी का जो विषय लिया है, वह ऐसा विषय है कि जिस पर कि बात करने के लिए बहुत ही हिम्मत की जरूरत है। यही सोचकर इस अभियान का नाम रखा है- हिम्मत। 

लखनऊ के इंदिरा नगर के मानस एंक्लेव कॉलोनी में बने एक स्लम एरिया से हम लोगों ने 20 महिलाओं और लड़कियों को माहवारी स्वच्छता देने के लिए अडॉप्ट किया। उन्हें इस विषय पर पूरा ध्यान देकर हर पहलू से समझाया। उसके बाद अब अगली समस्या यह थी कि ये समस्या पूरे देश में फैली है तो पूरे देश को ही इस बारे में जागरूक करने की ज़रूरत थी, लेकिन सामाजिक सोच को देखते हुए इसे फेसबुक जैसे विशाल सोशल प्लेटफॉर्म से जोड़ना है या नहीं, ये भी एक बड़ा सवाल था। अपने कुछ फेसबुक के जानकार मित्रों से परामर्श के बाद 18 जून, 2015 को ‘हिम्मत’ के इस अभियान को फेसबुक से जोड़ दिया गया, क्योंकि ये सोशल प्लेटफॉर्म किसी भी जागरुकता या चेतना के लिए आज एक बहुत बड़ा मंच है। हमारे डर के विपरीत इसका जबर्दस्त रिस्पॉन्स आया। कई हाथ आगे बढ़े साथ जुड़ने के लिए। कुछ महिलाओं ने तो इसे स्त्री जाति के लिए उठाया हुआ वर्तमान का सबसे बढ़िया कदम तक बताया। बस फिर, हमारे इरादों को आसमान मिल गया।

शुरुआत कैसे हुई ‘सृजन’ के सृजन की?

‘सृजन’ का सृजन 2005 में इस उद्देश्य के साथ किया गया था कि जो भी काम किए जाएं, वे अपनी बड़ी संख्या से नहीं, बल्कि बड़े इरादों से मिसाल बनें। खुशी है इस बात की कि सृजन अपने सृजनात्मक कार्यों से ही अपनी पहचान बना पा रहा है। 

इस काम में आपको क्या-क्या दिक्कतें आईं?

मेरे साथ दिक्कत एक ही आई है शुरुआत से अभी तक कि एक पुरुष इस विषय पर महिलाओं को कैसे समझा सकता है, लेकिन ये दिक्कत सोच की है, जिसके लिए मैं भी पहले ही दिन से अपने दिमाग से तैयार था, इसलिए इस सोच के चलते मैंने अपना मिशन कभी रुकने नहीं दिया। अभी भी जब मैं किसी स्कूल में वर्कशाप के लिए बात करने जाता हूं तो पहला प्रश्न यही होता है कि वर्कशाप आप लेंगे? फिर वहां अपने काम और मिशन के बारे में विस्तार से बताना पड़ता है। एक बार जब वर्कशाप कंप्लीट हो जाती है तो फिर वही स्कूल वाले प्रभावित होकर दूसरे स्कूलों के नाम देते हैं या अपने जाननेवाले स्कूलों में फोन करके कहते हैं कि आप भी अपने यहां ये वर्कशॉप करवाइए। तब एहसास होता है कि हमारी मेहनत सही दिशा में चल रही है और हम सारी दिक्कतें भूल जाते हैं।

अपने इस अभियान को आप गांव और शहरों, दोनों ही जगह लेकर गए हैं। महिलाओं की स्थिति और इस समस्या में आपने क्या समानता पाई?

गांव और शहरों में यदि महिलाओं की स्थिति में तुलना की जाए तो निसंदेह शहरों में स्थिति अच्छी है। शहरों में महिलाओं को अपने से जुड़े विषयों पर विचार रखने की काफी हद तक स्वतंत्रता है, जबकि गांव में इसका अभाव है। यदि हम अपने मिशन ‘माहवारी’ से संबंधित जागरुकता की ही बात करें तो गांव में एक बहुत बड़ी समस्या है पैड्स की उपलब्धता। हमें ऐसे बहुत से ऐसे गांव मिले, जहां लड़कियां पैड्स का उपयोग तो करती हैं, लेकिन उन्हें पैड्स लेने के लिए दो से पांच किलोमीटर तक जाना पड़ता है। यही कम कठिन कार्य नहीं है। जहां तक पीरियड्स से संबंधित मिथ और अंधविश्वासों की बात है तो गांव या शहरों में कोई विशेष अंतर नहीं है। पूजा न करना, मंदिर न जाना, अचार न छूना आदि जैसे मिथ दोनों ही जगहों पर समान रूप में पाए जाते हैं। पता ही नहीं चलता है कि आप गांव में हैं या शहर में।

आपके अभियान के प्रति पुरुषों का रवैया क्या रहा?

इस अभियान में शुरूआत से अभी तक पुरुषों का रवैया सकारात्मक ही रहा है। बस कुछ अपवाद रहे, जब कुछ पुरुषों ने कहा कि आप अपने इस अभियान से पुरुषों को दूर रखिए। इसमें पुरुषों का क्या काम, लेकिन जब उन्हें यह समझाया गया कि इस विषय को महिला-पुरुष के विषय के रूप में न देखकर, मानवता की नजर से देखें। सभी के घर में महिलाएं हैं और वे खामोशी से अपना ये दर्द हर महीने झेलती हैं, तब उनके रवैये में भी बदलाव आया।

आप ‘लखनऊ के पैडमैन’ के रूप में जाने जाते हैं, जबकि कुछ विरोधी स्वर पैड को लेकर ही उठ रहे हैं कि इसमें इस्तेमाल की जाने वाली प्लास्टिक शीट के कारण यह भविष्य में एक बड़ी समस्या के रूप में उभरकर सामने आएगा। आपके इस पर क्या विचार हैं?

किसी भी चीज़ के दो पक्ष होते हैं, उसी प्रकार यहां पर भी है। पैड का विरोध करना सिरे से गलत है। दिक्कत प्लास्टिक से है न तो प्लास्टिक का विकल्प खोजा जा सकता है और खोज भी लिया गया है। अब बायोडिग्रेडेबल पैड्स आ गए हैं, लेकिन अगर आप पैड्स की उपयोगिता को सिरे से नकार कर माहवारी के दौरान केवल कपड़ा ही इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं तो ये भी समझ लीजिए कि स्वच्छ पानी का कोई विकल्प नहीं है। जहां एक ओर पीने तक के लिए पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, वहीं दूसरी ओर माहवारी में इस्तेमाल किए गए कपड़े वाले पैड्स या कपड़ा धोने के लिए कितना अधिक पानी चाहिए होता है, क्या हम उस पर भी ध्यान दे रहे हैं? यह भी बोला जाता है कि पीरियड्स में केवल सूती कपड़ा ही उपयोग किया जाए, लेकिन कपास उगाने में जो पानी खर्च होता है, उस तक पर भी विचार किया जाना जरूरी है। वर्तमान में पैड्स ही बेहतर विकल्प हैं, बस इसे कैसे पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल बनाया जाए, इस पर कार्य किया जाना चाहिए।

इस मिशन के ही तहत फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार से आप कैसे जुड़े?

अक्षय कुमार जी को मिले खिताब ‘पैडमैन’ से जब लोग सीधे इस ‘लखनऊ के पैडमैन’ को जोड़ देते हैं तो सुखद एहसास होता है। हमारे काम के महत्त्व को समझकर इस स$फर में अब हमारे साथ बहुत से लोग जुड़ चुके हैं। हिम्मत अभियान तो साल 2015 से ही चल रहा था, लेकिन इसे एक बड़ी पहचान और मीडिया में भरपूर चर्चा साल 2017 में ‘पैडमैन’ फिल्म आने के बाद मिली। वर्ष 2018 में नाइन पैड्स लांच हुए। नाइन पैड्स की इस मुहिम का अक्षय कुमार सहयोग कर रहे थे। नाइन पैड्स ने हमें भी अपने साथ जोड़ा। जिस तरह के विषय पर हम काम कर रहे हैं, उनमें इस तरह से किसी सिलेब्रिटी का जुड़ना इस विषय के प्रति सामाजिक जागरुकता बढ़ाने में बहुत मददगार साबित होता है।

‘सृजन’ और किन-किन क्षेत्रों में सक्रिय है?

सृजन द्वारा बुजुर्गों की देखरेख के लिए एक वृद्धाश्रम ‘स्नेहधरा’ का संचालन भी किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य बुजुर्गों के लिए एक जगह बनाना नहीं, बल्कि उनके घरों में उनकी जगह वापस बनाना है। इसके अंतर्गत अभी तक बारह बुजुर्गों को उनके घर पहुंचवाया जा चुका है, जोकि अपने घर से बिछड़ गए थे। ये छोटी सी संख्या भी हमारे विश्वास और हिम्मत के लिए बहुत बड़ी है। इसके अतिरिक्त स्नेहधरा में ही बुजुर्गों का गृह उद्योग भी है, जिसके द्वारा धूपबत्ती-अगरबत्ती आदि चीज़ों का निर्माण किया जाता है। प्रत्येक माह झुग्गी-झोंपडी के बच्चों को चप्पल बांटी जाती हैं, जिसे ‘चप्पल डे’ का नाम दिया गया है। सृजन का सांस्कृतिक समूह भी है- झंकार, जिसके द्वारा लोगों को अपनी प्रतिभाओं को प्रदर्शित करने के लिए मंच प्रदान किया जाता है, जिसके अंतर्गत अभी तक नृत्य के पांच रिकॉर्ड बन चुके हैं।

गृहलक्ष्मी के पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

गृहलक्ष्मी के पाठकों के लिए यही संदेश है कि पीरियड्स के कारण ही मानवीय सृष्टि चल रही है तो इसका महत्त्व समझें। उससे जुड़ी समस्याओं के समाधान का हिस्सा बनें। अपनी सोच बदलें। महिलाओं के उस अनकहे दर्द को समझिए, जिसके दम पर आपका अस्तित्व है। उनके स्वास्थ्य और स्वच्छता पर पूरा ध्यान दीजिए। वही समाज सच्चे अर्थों में शक्तिशाली होता है, जिसकी महिलाएं पूरी तरह से स्वस्थ हों।

यह भी पढ़ें –काम से समाज को दे रही हैं प्रेरणा

स्त्रियों से जुड़े तो न जाने कितने ही विषय ऐसे हैं, जिन पर $खुद स्त्रियां ही बात नहीं करना चाहतीं। माहवारी भी एक ऐसा ही सबजेक्ट है। फिर आपने इस विषय को कब, कैसे और क्यों चुना?

सृजन फाउंडेशन के माहवारी स्वच्छता अभियान ‘हिम्मतÓ की शुरुआत 28 मई, 2015 को हुई। अभियान की प्रेरणा थी, दिल्ली की एक कवयित्री की इसी विषय पर लिखी कविता। यह कविता इतनी मर्मस्पर्शी थी कि एक बार पढ़ने के बाद ही मन में विचार आ गया था कि अब मुझे केवल इसी विषय पर काम करना है। महिला सशक्तीकरण के लिए सबसे पहली जरूरत है, महिला स्वास्थ्य। यदि महिला स्वस्थ एवं स्वच्छ ही नहीं है तो हम उसे किसी भी और दिशा में कैसे सशक्त होने के लिए समझा सकते हैं। पूरे परिवार की जिम्मेदारी एक महिला अपने कंधों पर ले लेती है, लेकिन अपने ही स्वास्थ्य के प्रति वह उदासीन रहती है। ये समाज महिलाओं के दम पर टिका है, इसलिए अगर एक महिला ही स्वस्थ या स्वच्छ नहीं है तो पूरा का पूरा समाज भी बीमार ही होगा। इसी विचार के चलते महिला सशक्तीकरण के लिए हम लोगों ने बुनियादी चीज से शुरुआत की है कि सबसे पहले महिलाओं को स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना होगा। स्वस्थ और स्वच्छ रहने में भी हम लोगों ने महिलाओं से जुड़ा माहवारी का जो विषय लिया है, वह ऐसा विषय है कि जिस पर कि बात करने के लिए बहुत ही हिम्मत की जरूरत है। यही सोचकर इस अभियान का नाम रखा है- हिम्मत। 

लखनऊ के इंदिरा नगर के मानस एंक्लेव कॉलोनी में बने एक स्लम एरिया से हम लोगों ने 20 महिलाओं और लड़कियों को माहवारी स्वच्छता देने के लिए अडॉप्ट किया। उन्हें इस विषय पर पूरा ध्यान देकर हर पहलू से समझाया। उसके बाद अब अगली समस्या यह थी कि ये समस्या पूरे देश में फैली है तो पूरे देश को ही इस बारे में जागरूक करने की ज़रूरत थी, लेकिन सामाजिक सोच को देखते हुए इसे फेसबुक जैसे विशाल सोशल प्लेटफॉर्म से जोड़ना है या नहीं, ये भी एक बड़ा सवाल था। अपने कुछ फेसबुक के जानकार मित्रों से परामर्श के बाद 18 जून, 2015 को ‘हिम्मतÓ के इस अभियान को फेसबुक से जोड़ दिया गया, क्योंकि ये सोशल प्लेटफॉर्म किसी भी जागरुकता या चेतना के लिए आज एक बहुत बड़ा मंच है। हमारे डर के विपरीत इसका जबर्दस्त रिस्पॉन्स आया। कई हाथ आगे बढ़े साथ जुड़ने के लिए। कुछ महिलाओं ने तो इसे स्त्री जाति के लिए उठाया हुआ वर्तमान का सबसे बढ़िया कदम तक बताया। बस फिर, हमारे इरादों को आसमान मिल गया।

शुरुआत कैसे हुई ‘सृजनÓ के सृजन की?

‘सृजनÓ का सृजन 2005 में इस उद्देश्य के साथ किया गया था कि जो भी काम किए जाएं, वे अपनी बड़ी संख्या से नहीं, बल्कि बड़े इरादों से मिसाल बनें। खुशी है इस बात की कि सृजन अपने सृजनात्मक कार्यों से ही अपनी पहचान बना पा रहा है। 

इस काम में आपको क्या-क्या दिक्कतें आईं?

मेरे साथ दिक्कत एक ही आई है शुरुआत से अभी तक कि एक पुरुष इस विषय पर महिलाओं को कैसे समझा सकता है, लेकिन ये दिक्कत सोच की है, जिसके लिए मैं भी पहले ही दिन से अपने दिमाग से तैयार था, इसलिए इस सोच के चलते मैंने अपना मिशन कभी रुकने नहीं दिया। अभी भी जब मैं किसी स्कूल में वर्कशाप के लिए बात करने जाता हूं तो पहला प्रश्न यही होता है कि वर्कशाप आप लेंगे? फिर वहां अपने काम और मिशन के बारे में विस्तार से बताना पड़ता है। एक बार जब वर्कशाप कंप्लीट हो जाती है तो फिर वही स्कूल वाले प्रभावित होकर दूसरे स्कूलों के नाम देते हैं या अपने जाननेवाले स्कूलों में फोन करके कहते हैं कि आप भी अपने यहां ये वर्कशॉप करवाइए। तब एहसास होता है कि हमारी मेहनत सही दिशा में चल रही है और हम सारी दिक्कतें भूल जाते हैं।

अपने इस अभियान को आप गांव और शहरों, दोनों ही जगह लेकर गए हैं। महिलाओं की स्थिति और इस समस्या में आपने 

क्या समानता पाई?

गांव और शहरों में यदि महिलाओं की स्थिति में तुलना की जाए तो निसंदेह शहरों में स्थिति अच्छी है। शहरों में महिलाओं को अपने से जुड़े विषयों पर विचार रखने की काफी हद तक स्वतंत्रता है, जबकि गांव में इसका अभाव है। यदि हम अपने मिशन ‘माहवारीÓ से संबंधित जागरुकता की ही बात करें तो गांव में एक बहुत बड़ी समस्या है पैड्स की उपलब्धता। हमें ऐसे बहुत से ऐसे गांव मिले, जहां लड़कियां पैड्स का उपयोग तो करती हैं, लेकिन उन्हें पैड्स लेने के लिए दो से पांच किलोमीटर तक जाना पड़ता है। यही कम कठिन कार्य नहीं है। जहां तक पीरियड्स से संबंधित मिथ और अंधविश्वासों की बात है तो गांव या शहरों में कोई विशेष अंतर नहीं है। पूजा न करना, मंदिर न जाना, अचार न छूना आदि जैसे मिथ दोनों ही जगहों पर समान रूप में पाए जाते हैं। पता ही नहीं चलता है कि आप गांव में हैं या शहर में।

आपके अभियान के प्रति पुरुषों का 

रवैया क्या रहा?

इस अभियान में शुरूआत से अभी तक पुरुषों का रवैया सकारात्मक ही रहा है। बस कुछ अपवाद रहे, जब कुछ पुरुषों ने कहा कि आप अपने इस अभियान से पुरुषों को दूर रखिए। इसमें पुरुषों का क्या काम, लेकिन जब उन्हें यह समझाया गया कि इस विषय को महिला-पुरुष के विषय के रूप में न देखकर, मानवता की नजर से देखें। सभी के घर में महिलाएं हैं और वे खामोशी से अपना ये दर्द हर महीने झेलती हैं, तब उनके रवैये में भी बदलाव आया।

आप ‘लखनऊ के पैडमैनÓ के रूप में जाने जाते हैं, जबकि कुछ विरोधी स्वर पैड को लेकर ही उठ रहे हैं कि इसमें इस्तेमाल की जाने वाली प्लास्टिक शीट के कारण यह भविष्य में एक बड़ी समस्या के रूप में उभरकर सामने आएगा। आपके इस पर क्या विचार हैं?

किसी भी चीज़ के दो पक्ष होते हैं, उसी प्रकार यहां पर भी है। पैड का विरोध करना सिरे से गलत है। दिक्कत प्लास्टिक से है न तो प्लास्टिक का विकल्प खोजा जा सकता है और खोज भी लिया गया है। अब बायोडिग्रेडेबल पैड्स आ गए हैं, लेकिन अगर आप पैड्स की उपयोगिता को सिरे से नकार कर माहवारी के दौरान केवल कपड़ा ही इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं तो ये भी समझ लीजिए कि स्वच्छ पानी का कोई विकल्प नहीं है। जहां एक ओर पीने तक के लिए पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, वहीं दूसरी ओर माहवारी में इस्तेमाल किए गए कपड़े वाले पैड्स या कपड़ा धोने के लिए कितना अधिक पानी चाहिए होता है, क्या हम उस पर भी ध्यान दे रहे हैं? यह भी बोला जाता है कि पीरियड्स में केवल सूती कपड़ा ही उपयोग किया जाए, लेकिन कपास उगाने में जो पानी खर्च होता है, उस तक पर भी विचार किया जाना जरूरी है। वर्तमान में पैड्स ही बेहतर विकल्प हैं, बस इसे कैसे पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल बनाया जाए, इस पर कार्य किया जाना चाहिए।

इस मिशन के ही तहत फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार से आप कैसे जुड़े?

अक्षय कुमार जी को मिले खिताब ‘पैडमैनÓ से जब लोग सीधे इस ‘लखनऊ के पैडमैनÓ को जोड़ देते हैं तो सुखद एहसास होता है। हमारे काम के महत्त्व को समझकर इस स$फर में अब हमारे साथ बहुत से लोग जुड़ चुके हैं। हिम्मत अभियान तो साल 2015 से ही चल रहा था, लेकिन इसे एक बड़ी पहचान और मीडिया में भरपूर चर्चा साल 2017 में ‘पैडमैनÓ फिल्म आने के बाद मिली। वर्ष 2018 में नाइन पैड्स लांच हुए। नाइन पैड्स की इस मुहिम का अक्षय कुमार सहयोग कर रहे थे। नाइन पैड्स ने हमें भी अपने साथ जोड़ा। जिस तरह के विषय पर हम काम कर रहे हैं, उनमें इस तरह से किसी सिलेब्रिटी का जुड़ना इस विषय के प्रति सामाजिक जागरुकता बढ़ाने में बहुत मददगार साबित होता है।

‘सृजनÓ और किन-किन क्षेत्रों में सक्रिय है?

सृजन द्वारा बुजुर्गों की देखरेख के लिए एक वृद्धाश्रम ‘स्नेहधराÓ का संचालन भी किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य बुजुर्गों के लिए एक जगह बनाना नहीं, बल्कि उनके घरों में उनकी जगह वापस बनाना है। इसके अंतर्गत अभी तक बारह बुजुर्गों को उनके घर पहुंचवाया जा चुका है, जोकि अपने घर से बिछड़ गए थे। ये छोटी सी संख्या भी हमारे विश्वास और हिम्मत के लिए बहुत बड़ी है। इसके अतिरिक्त स्नेहधरा में ही बुजुर्गों का गृह उद्योग भी है, जिसके द्वारा धूपबत्ती-अगरबत्ती आदि चीज़ों का निर्माण किया जाता है। प्रत्येक माह झुग्गी-झोंपडी के बच्चों को चप्पल बांटी जाती हैं, जिसे ‘चप्पल डेÓ का नाम दिया गया है। सृजन का सांस्कृतिक समूह भी है- झंकार, जिसके द्वारा लोगों को अपनी प्रतिभाओं को प्रदर्शित करने के लिए मंच प्रदान किया जाता है, जिसके अंतर्गत अभी तक नृत्य के पांच रिकॉर्ड बन चुके हैं।

गृहलक्ष्मी के पाठकों को क्या 

संदेश देना चाहेंगे?

गृहलक्ष्मी के पाठकों के लिए यही संदेश है कि पीरियड्स के कारण ही मानवीय सृष्टि चल रही है तो इसका महत्त्व समझें। उससे जुड़ी समस्याओं के समाधान का हिस्सा बनें। अपनी सोच बदलें। महिलाओं के उस अनकहे दर्द को समझिए, जिसके दम पर आपका अस्तित्व है। उनके स्वास्थ्य और स्वच्छता पर पूरा ध्यान दीजिए। वही समाज सच्चे अर्थों में शक्तिशाली होता है, जिसकी महिलाएं पूरी तरह से 

स्वस्थ हों। ठ्ठ

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