Housefull 5 Review
Housefull 5 Review

Housefull 5 Review: अगर आप लॉजिक, कहानी और सिनेमाई गुणवत्ता की उम्मीद लेकर ‘हाउसफुल 5’ देखने जा रहे हैं, तो बेहतर होगा कि घर पर ही रहिए। क्योंकि ये फिल्म सिर्फ एक चीज़ के लिए बनी है… बेतुकेपन की हद तक जाकर आपको हंसाने के लिए। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है इसकी स्क्रिप्ट। लगता है जैसे किसी ने आधी नींद में वॉट्सऐप फॉरवर्ड पढ़कर पटकथा लिख डाली हो।

पंचलाइन कब चुटकुला बन जाती है और चुटकुला कब क्रिंज जोक … कुछ समझ नहीं आता। अजीब से सीन हैं… जैसे लेखक सोच रहे हों कि लिखने से नहीं हंसा पा रहे तो हरकतों से हंसाओ। एक सीन में अक्षय कुमार दो बंदरों से थप्पड़ खाते दिखते हैं बाल नोचने का मन होता है… हद तो तब हो जाती है जब क्लाइमेक्स में सभी एक बड़े पंखे में खिंचते चले जाते हैं। तब लगने लगता है कि आप भी उस पंखे में खिंच जाएं!

कहानी शुरू होती है अरबपति रंजीत डोबरियाल (रंजीत) के 100वें जन्मदिन से। यह बर्थडे असल में तो कभी आता ही नहीं क्योंकि जनाब एक दिन पहले ही गुजर जाते हैं। उनके वसीयतनामे में यह लिखा है कि सारी संपत्ति उनकी पहली शादी से हुए बेटे ‘जॉली’ को मिलेगी। अब ट्विस्ट ये है कि जॉली एक नहीं, तीन हैं …रितेश देशमुख, अभिषेक बच्चन और अक्षय कुमार। तीनों अपनी-अपनी पत्नियों के साथ आते हैं और दावा करते हैं कि असली जॉली वही हैं। फिर जहाज पर अजीब घटनाएं होने लगती हैं। एक-एक कर मर्डर होने लगते हैं। डॉक्टर, कैप्टन, डायरेक्टर … यहां कोई सुरक्षित नहीं। इन सबके बीच एंट्री होती है इंटरपोल ऑफिसर दगडू की (नाना पाटेकर), जो हत्यारे की तलाश में जुट जाते हैं। लेकिन तब तक तो देखने वाले भी निढाल हो जाते हैं!  कहानी में एक ट्विस्ट भी है, और आपको दो दर्जन मिलते हैं – हाउसफुल 5 (A) और हाउसफुल 5 (B), जिनमें खूनी अलग-अलग होते हैं, पर फर्क इतना मामूली है कि शायद आप महसूस भी न करें।

आश्चर्यजनक रूप से अभिषेक बच्चन इस फिल्म में असली ‘जॉली’ लगते हैं। उनका कॉमिक टाइमिंग अच्छा है और वो वाकई किरदार में जान डालते हैं। चित्रांगदा सिंह अपनी अदाओं से स्क्रीन पर रंग भरती हैं। नाना पाटेकर अपने डायलॉग से थोड़ी राहत देते हैं। बाकी के हाल तो पूछिये ही मत… संजय दत्त और जैकी श्रॉफ को देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्हें स्क्रिप्ट का पता ही नहीं थी। वो बस क्रूज पर छुट्टी मनाने आ गए और कैमरा ऑन हो गया हो। श्रेयस तलपड़े, डिनो मोरिया और एक भीड़ है… जो कभी रुचि नहीं जगा पाती। फिल्म में कॉमेडी है, मर्डर मिस्ट्री है, और कुछ-कुछ रोमांस भी है। पर ये सब मिलाकर भी हासिल कुछ नहीं है। ये आप प्रियदर्शन जैसे निर्देशक को देते तो बड़ा ‘धमाल’ बनता। लेकिन तरुण मनसुखानी ने लॉजिक की चिता जला दी। निर्देशक ने शायद सोचा कि अगर स्क्रीन पर 19 कलाकार दिख रहे हैं, तो दर्शक व्यस्त रहेंगे… पर सच्चाई ये है कि इतनी भीड़ में कोई याद भी नहीं रहता।

‘हाउसफुल 5’ न तो ‘अंदाज़ अपना अपना’ है, न ही ‘हेरा फेरी’। ये एक थका देने वाला मज़ाक है, जो कभी-कभी हंसाता है, पर ज्यादातर वक्त सिर पकड़ने पर मजबूर करता है। अगर आपकी जिंदगी में गंभीरता कुछ ज्यादा हो गई है और आप बेवकूफी से भी हंस सकते हैं, तो शायद ये फिल्म एक बार देखने लायक हो। हंसी के नाम पर कुछ भी चलेगा, तो टिकट लीजिए। वरना ओटीटी पर आने दीजिए, वहां स्किप का बटन भी होता है।

ढाई दशक से पत्रकारिता में हैं। दैनिक भास्कर, नई दुनिया और जागरण में कई वर्षों तक काम किया। हर हफ्ते 'पहले दिन पहले शो' का अगर कोई रिकॉर्ड होता तो शायद इनके नाम होता। 2001 से अभी तक यह क्रम जारी है और विभिन्न प्लेटफॉर्म के लिए फिल्म समीक्षा...