Birth and early years of Mother Teresa - Biographyय
Birth and early years of Mother Teresa - Biography

मदर टेरेसा का नाम पूरे संसार में बड़े ही आदर से लिया जाता है। वह एक अल्बेनियन रोमन कैथोलिक नन थीं, साथ ही उन्हें भारत की नागरिकता भी प्राप्त थी। उन्होंने निर्धनों व जरूरतमंदों की सेवा के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। वह मानव-जाति के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका वास्तविक नाम एग्नेस गोंझा बोज्यू था।

Birth and early years of Mother Teresa
Birth and early years of Mother Teresa

एग्नेस का जन्म 26 अगस्त 1910 को यूगोस्लाविया के स्कोपजे शहर (अब मकदूनिया गणराज्य की राजधानी) में हुआ, किंतु वह 27 अगस्त को अपना जन्म दिवस मानती थीं, जिस दिन उनका बपतिस्मा हुआ। वह एक अल्बेनियन कैथोलिक दंपती के तीन बच्चों में सबसे छोटी थीं। पिता का नाम निकोला व मां का नाम ड्रानाफाइल था। पिता एक सफल व्यवसायी थे। 1919 में अभी एग्नेस नौ वर्ष की ही थीं कि पिता चल बसे। एग्नेस की मां के लिए कठिन समय था, किंतु उन्होंने डटकर चुनौती का मुकाबला किया ताकि अपने बच्चों की जिम्मेदारी संभाल सकें।

Birth and early years of Mother Teresa
Birth and early years of Mother Teresa

वे कपड़े बेचने व कढ़ाई करके देने का काम करने लगीं। उन्होंने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए। एग्नेस व उनकी बहनें बहुत धार्मिक थीं; वे प्रतिदिन प्रार्थना करती थीं। एग्नेस बचपन से ही मिशनरियों के जीवन से प्रेरित थीं। उनका हृदय बहुत ही पवित्र व दयालु था। एक दिन वे अपनी बहनों व सड़क के कुछ निर्धन बालकों के साथ खेल रही थीं। मां ने देखा तो भीतर बुलाकर डांटा – “उन बच्चों के साथ मत खेला करो, क्या तुम भी उनकी तरह गंदी व अशिष्ट बनना चाहती हो? ” बहनें तो चुप रहीं किंतु एग्नेस ने कहा, ” माँ क्या हम इन बच्चों को अपने जैसा नहीं बना सकते। आपने हमें हमेशा निर्धनों व जरूरतमंदों की सहायता करने की शिक्षा दी हैं। फिर आप आज हमें उनके साथ खेलने से क्यों रोक रही हैं।” एग्नेस की मां द्रवित हो उठीं व बोली, ” प्रिय! तुमने ठीक कहा। हमें ऐसे बच्चों की उपेक्षा करने की बजाय अपना प्रेम व समर्थन देना चाहिए।” एग्नेस बारह वर्ष की हुइंर् तो मानव-जाति के प्रति और भी संवेदनशील हो चुकी थीं। वे एक नन बनना चाहती थीं।

Birth and early years of Mother Teresa
Birth and early years of Mother Teresa

वे जानती थीं कि नन बनना इतना आसान नहीं था। उन्हें यह भी पता था कि नन कभी विवाह नहीं करतीं व उनका कोई परिवार नहीं होता। उन्हें सब कुछ पीछे छोड़ना होगा। इस निर्णय को लेने से पहले, उन्होंने गंभीरतापूर्वक विचार किया। वे प्रतिदिन मां के साथ चर्च जातीं व दान-पुण्य करतीं। सत्रह वर्ष की आयु में उन्होंने मानवता की सेवा करने का अंतिम निर्णय ले लिया। उन्होंने भारत में कार्यरत कैथोलिक मिशनरियों के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। उन्होंने भारत में मिशन चलाने वाले आयरलैंड के ‘लॉरेटो ऑर्डर ऑफ नन्स’में अर्जी भेज दीं।

सितंबर 1928, एग्नेस ने अठारह वर्ष की आयु में अपना घर छोड़ा व सिस्टर ऑफ लॉरेटो में शामिल हो गईं। उन्होंने छः सप्ताह तक आयरलैण्ड में लॉरेटो के इतिहास की शिक्षा लीं। उन्होंने अंग्रेजी भाषा का विशेष प्रशिक्षण भी लिया ताकि भारत में स्कूली बच्चों को पढ़ा सकें। एग्नेस 1929 में भारत आईं। नन बनने की प्रक्रिया में दो वर्ष से अधिक समय लगा। 24 मई, 1931 को उन्होंने एक नन के रूप में शपथ लीं और लॉरेटो नन के रूप में, अपने लिए एक नया नाम चुना जो संत टेरेसा के नाम पर था।

Agnes became a nun
Agnes became a nun

तभी से वे सिस्टर टेरेसा कहलाने लगीं। वे कोलकाता (पहले कलकत्ता था) के लॉरेटो कान्वेंट में बच्चों को पढ़ाने लगीं। मदर को भारत के उन भूखे-नंगे बच्चों की दशा देखकर दुख होता था, जिनके पास रोटी, कपड़ा व मकान जैसी बुनियादी जरूरतें तक नहीं थीं। मदर टेरेसा का हृदय निर्धनों के लिए सहानुभूति से भर उठता था, वह उनका दुख तथा पीड़ा समझ सकती थीं। वे लॉरेटो की वर्दी छोड़कर एक सादी सूती धोती पहनने लगीं। लॉरेटो की नन्स को स्कूल से बाहर पढ़ाने की अनुमति नहीं थी, किंतु उन्हें सेंट टेरेसा कान्वेंट में पढ़ाने की अनुमति दी गई।

Agnes became a nun
Agnes became a nun

वहां दो वर्ष बिताने के बाद, उन्होंने मई 1937 में अंतिम शपथ ग्रहण कीं। फिर वे औपचारिक रूप से, ‘मदर टेरेसा’ बन गईं। वे सेंट मैरी कान्वेंट की मुख्याधीश बनीं व बीस वर्ष तक सेवा की। इसके साथ ही निर्धनों की भी सेवा करती रहीं। 1943 के बंगाल अकाल के कारण शहर में दुख-पीड़ा, रोग व मृत्यु ने डेरा जमा दिया। 1946 के हिंदू-मुसलमान दंगों की हिंसा से तो स्थिति और भी विकट हो गई।

Agnes became a nun
Agnes became a nun

मदर ने 1948 में भारतीय नागरिकता ग्रहण की व मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी आरंभ करने का निर्णय लिया। उन्होंने नीली किनारे वाली सफेद धोती को अपनी वर्दी चुना। उस समय नगर निगम महिला सफाईकर्मी यही वर्दी पहनती थीं। मदर टेरेसा उस पोशाक को चर्च ले गईं व फादर से कहा कि उसे आशीर्वाद दें। फादर ने कहा, “क्या तुम जानती हो कि इसे तो नीचे तबके की महिला सफाईकर्मी पहनती हैं। उन्हें अछूत माना जाता है।” “फादर! यही वजह है कि मैंने इसे चुना है। मैं चाहती हूं कि निर्धन व छोटे माने जाने वालों में ही मेरी गिनती हो।

Agnes became a nun
Agnes became a nun

मैं उनकी निर्धनता व रोग मिटाना चाहती हूं। उनका दुख व पीड़ा बांट लेना चाहती हूं।“ मदर टेरेसा ने कहा। फादर की आंखें नम हो आईं। उन्होंने उस पोशाक को आशीर्वाद दिया व प्रभु से प्रार्थना की कि वे मदर टेरेसा के मिशन को सफलता प्रदान करें।

मदर टेरेसा ने मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी को आरंभ करने की तैयारियां शुरू कर दीं। वे सादा जीवन व्यतीत करतीं व एक परिवार के साथ छोटे से कमरे में रहतीं थीं। एक लकड़ी का संदूक व मदर मैरी की मढ़ी तस्वीर ही उनका सामान था। उनके संगठन का मिशन था कि निर्धनों को खुले दिल से अपनाया जाए, उन्हें स्नेह दिया जाए।

great works of mother teresa
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उन्होंने मोती झील के किनारे झोंपड़पट्टी में रहने वाले बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। उनके पास पढ़ने वाले बच्चे सभ्य व शिष्ट हो गए व धीरे-धीरे स्कूल चल निकला। यह स्कूल खुले स्थान से दो कमरों वाले घर में आ गया। एक कमरे में रोगियों की चिकित्सा होती थी। धीरे-धीरे मदर के मिशन में स्वयं-सेविकाओं की गिनती बढ़ने लगी। उन्होंने निर्धनों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझा। उन्हें सुलझाने का हरसंभव प्रयास किया।

उनके काम को हर जगह से स राहना मिलने लगी। 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ। दिसंबर 1947 को मदर ने एक सरकारी स्कूल में क्रिसमस समारोह का आयोजन किया। वहां पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी उस समय कोलकाता में ही थे। उन्होंने मदर को संदेश भेजा कि वे इस समारोह में हिस्सा लेना चाहेंगे। मदर ने उत्तर दिया कि यह उनके व उनकी संस्था के लिए सौभाग्य की बात होगी। पंडित जी ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया व मदर के कामों को सराहा।

great works of mother teresa
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उन्होंने हरसंभव तरीके से संगठन की सहायता करने का वचन भी दिया। 1950 में, एक महिला को उसके पुत्र मदर के दरवाजे पर छोड़ गए क्योंकि वह कुष्ठ रोगी थी। उसे कोढ़ हो गया था, इसलिए बेटों ने उसे छोड़ दिया। मदर को एहसास हुआ कि वहां अनेक व्यक्ति इस रोग पीड़ित थे। परिवार प्रायः उन्हें घर से बाहर कर देते थे। मदर ने संगठन की दूसरी बहनों की सहायता से, टीटागढ़ में एक कुष्ठ आश्रम खोला। वे कुष्ठ रोगियों को रहने का ठिकाना व भोजन उपलब्ध कराती थीं।

निर्धनों व जरूरतमंदों के लिए भी कई आश्रय खोले गए। कोलकाता में कालीघाट मंदिर के समीप ही निर्मल हृदय की स्थापना हुई। अधिकारियों व स्वयंसेवियों की मदद से भारत के दूसरे शहरों में भी यही कार्य होने लगा। पोप जॉन पॉल द्वितीय के आग्रह से मदर टेरेसा ने वेनेजुएला में पहला आश्रयस्थल खोला। मदर व उनकी सिस्टर्स अनेक युद्ध क्षेत्रें में भी गईं, वहां घायलों व रोगियों की सेवा की। उन्होंने दूसरे लोगों की सहायता से अनेक अनाथालय, वृद्धाश्रम, स्कूल व अस्पताल आदि खोले। मदर टेरेसा व उनका मिशन लोकप्रिय होते गए।

great works of mother teresa
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उन्हें अनेक पुरस्कार व सम्मान दिए गए। 1979 में उन्हें समाज कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘नोबल पुरस्कार’से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने कार्य के लिए 50 राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उन्हें भारत तथा विदेशों में कई पुरस्कारों; जैसे- भारत रत्न, द लिओ टालस्टॉय पुरस्कार, द मैग्सेसे पुरस्कार, द पीस प्राइज़, द केनेडी अवार्ड आदि से सम्मानित किया गया।

1983 में मदर टेरेसा को दिल का दौरा पड़ा। 1987 में दिल का दूसरा दौरा पड़ा। उन्होंने मिशनरी प्रमुख के पद से त्यागपत्र देने की इच्छा प्रकट की, किंतु नन्स नहीं चाहती थीं कि वे ऐसा करें। धीरे-धीरे उनकी सेहत गिरने लगी, उन्होंने मार्च 1997 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 5 सितंबर 1997 को उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु पर पूरे संसार में शोक मनाया गया।

The last phase of Mother Teresa's life
The last phase of Mother Teresa’s life

मदर टेरेसा एक जीवंत इतिहास थीं। उनकी मृत्यु मानवता के लिए एक बड़ी हानि थी। उन्होंने दुनिया में प्रेम, शांति व करुणा का संदेश दिया । उनकी महानता से अनेक प्रसंग जुड़े हैं। उनके निःस्वार्थ कार्य, समर्पण, प्रेम व दयालुता को हमेशा स्मरण किया जाएगा। हम सबको उनसे सीख व प्रेरणा लेनी चाहिए।