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मां अब बूढ़ी हो चली है—गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: मां अब बूढी हो चली है!एक रोज मैंने मां को गौर से देखा,उसके रेशमी बालों से झांक रही थी चांदी की रेखा!मैं एक पल को डर गई, सहम गई, अरे!यह क्या मेरी मां बूढी हो चली है!मैंने पास जाकर उसका हाथ थामा,तो अकस्मात ही दिख गई मुझे उसके चेहरे की झुर्रियां,मैं अंदर तक […]

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मैं बहुत फोटो खिंचवाती हूं-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Kavita: हां मैं बहुत फोटो खिंचवाती हूंक्योंकि बीता वक्त लौटकर नहीं आता! तुम्हें क्या पता वह केवल तस्वीर नहीं होती उस तस्वीर में होती हैतुम्हारी, मेरी, बच्चों की प्यारी-प्यारी मुस्कुराहट उस तस्वीर में होती है मेरे बच्चों का बचपन, उनका नटखटपन, उनकी शरारते मैं सब कुछ इन कैमरों में कैद कर लेना चाहती हूं!मैं […]

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