मनु अपनी ससुराल में तीन दिन रही और इसके पश्चात् आनंद के साथ अपने पिता के पास आ गई। आनंद के पैतृक मकान में केवल दो कमरे थे और दो कमरों में दो परिवारों का निर्वाह वैसे भी कठिन था। इसके अतिरिक्त बेटी के विवाह के पश्चात् गोपीनाथ भी अकेले रह गए थे और आनंद को उनके विषय में भी सोचना था।
अभिशाप नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1
गोपीनाथ को आनंद के इस निर्णय पर प्रसन्नता हुई।
उसी शाम खाने की मेज पर गोपीनाथ ने निखिल का विषय छेड़ दिया और आनंद को संबोधित करते हुए कहा- ‘मनुष्य अपने जीवन में कभी-कभी बड़ी विचित्र भूलें कर बैठता है। उनमें एक भूल यह भी होती है कि जो लोग हमारे आस-पास होते हैं, हम उन्हें पहचानने में गलती कर बैठते हैं।’
मनु बोली- ‘पापा! मुझे तो यह लगता है कि आप भी आनंद की तरह दार्शनिक बनते जा रहे हैं।’
‘नहीं बेटी! यह दर्शन नहीं, बल्कि एक सच्चाई है।’
‘और इस सच्चाई का संबंध किससे है?’
‘निखिल से।’
निखिल का नाम सुनते ही मनु के खाने पर चलते हाथ रुक गए। उसने कनखियों से आनंद को देखा। आनंद इन सब बातों से बेखबर चुपचाप खाने के कौर तोड़ रहा था।
गोपीनाथ कहते रहे- ‘मैं निखिल के पूरे परिवार को जानता हूं। मुझे उसमें एवं उसके परिवार में कभी कोई दोष नजर न आया। कमी थी तो सिर्फ यह कि निखिल के पिता एक बैंक कर्मचारी थे और निखिल की मां एक पब्लिक स्कूल में आया की हैसियत से काम करती थी। इसके अतिरिक्त उसकी बड़ी बहन भी एक पब्लिक स्कूल में टीचर थी और छोटी बहन कॉलेज में पढ़ती थी। निखिल का भाई न तो पढ़ता था और न ही कोई काम करता था।’
आनंद ने कहा- ‘पापा! यह तो आप उसकी आर्थिक स्थिति के विषय में बता रहे हैं। इसका अर्थ यह तो नहीं कि उसके परिवार में अथवा उसमें कोई दोष था।’
‘दोष यह था कि मेरी और उसके परिवार की हैसियत में धरती-आसमान का अंतर था।’
‘मेरा विचार है-आपकी और निखिल के पिता की अच्छी जान-पहचान होगी।’
‘हां! जान-पहचान थी। वे लोग कभी-कभी यहां भी आते थे। किन्तु मेरे हृदय में उन लोगों के लिए कोई सम्मान न था।’
‘छोड़िए भी पापा!’ बात के विषय को रोकने के उद्देश्य से मनु बोली। उसे भय था कि कहीं पापा उसके एवं निखिल के संबंधों की चर्चा न कर बैठें।
‘मैं कुछ और कह रहा था।’
‘कुछ और…।’
‘हां! मैं यह बताना चाह रहा था कि मैंने जिस व्यक्ति को हमेशा घृणा की दृष्टि से देखा, वही मेरे जीवन में फरिश्ता बनकर आया। निखिल ने न केवल मुझे अपने स्टूडियो का ठेका दिया, बल्कि मुझे जानकीदास का ऋण चुकाने के लिए साढ़े सात लाख रुपए भी दिए। मैं तो नतमस्तक हो गया उसके सामने। मानो उसने मेरा जीवन ही नहीं मेरी आत्मा भी खरीद ली हो। यदि वह आयु में मुझसे छोटा न होता तो मैं उसके पांव पकड़ लेता।’
यह सुनकर मनु को प्रसन्नता हुई।
जबकि आनंद का चलता हाथ रुक गया। वह बोला- ‘वास्तव में आश्चर्यजनक बात है। और इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि चपरासी का बेटा एकाएक इतना बड़ा आदमी बन गया।’
‘सब ऊपर वाले की माया है आनंद बेटे! वह जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है। उसे भिखारी को बादशाह बनाने में देर नहीं लगती। निखिल का एक रिश्तेदार उसके नाम करोड़ों की संपत्ति छोड़ गया था।’
‘ओह! किन्तु यह साहब स्टूडियो किसलिए बनवा रहे हैं?’
‘निखिल फिल्म निर्माता बन गया है। फिलहाल तो वह विज्ञापन फिल्में बना रहा है, किन्तु आगे चलकर वह बड़े बजट की फिल्म बनाने वाला है। लड़का मेहनती है और काबिल भी। मैं समझता हूं-उसे कामयाबी जरूर मिलेगी।’
आनंद ने इस बार कुछ न कहा।
खाना समाप्त होने पर गोपीनाथ अपने कमरे में चले गए।
आनंद एवं मनु भी कमरे में आ गए। कमरे में आकर आनंद ने मनु से पूछा- ‘मनु! तुम तो जानती होगी उसे।’
‘किसे?’
‘निखिल को।’
‘कुछ अधिक नहीं। कभी-कभी आते थे।’
‘वैसे-यह आश्चर्यजनक बात है।’
‘क्यों?’
‘एक चपरासी का बेटा रातों-रात करोड़पति बन जाए।’
घर पर बनाएं रेस्टोरेंट जैसी दाल, हर कोई चाटता रह जाएगा उंगलियां: Dal Fry Recipe
‘मनुष्य का भाग्य बदलते देर नहीं लगती।’ इतना कहकर मनु ने एक पत्रिका उठाई और बिस्तर पर लेट गई।
आनंद ने विषय बदलकर कहा- ‘इजाजत हो तो मैं प्रोफेसर भटनागर से मिल आऊं?’
‘इसमें इजाजत कैसी? कोई आवश्यक काम हो तो मिल आओ। लौटना कब है?’
‘एक घंटा तो लग ही जाएगा।’
‘ठीक है।’
फिर आनंद चला गया और मनु उठकर फोन के समीप आ गई। आज चार दिन बीत गए थे निखिल का कोई समाचार न मिला था। उसने रिसीवर उठा लिया किन्तु नंबर डायल करने से पूर्व हृदय को झटका-सा लगा।
अंतरात्मा ने जैसे पूछ लिया- ‘क्या कर रही है?’
‘निखिल से पूछना चाहती हूं-वह कैसा है?’
‘निखिल से तेरा रिश्ता क्या है?’
‘वह मेरे जीवन का पहला प्यार है।’
‘झूठ बोल रही है तू। यदि वह तेरे जीवन का पहला प्यार होता तो क्या तू उसके प्यार को यों ठोकर मार देती? घृणा करती उससे?’
इस आवाज को दबाने की कोशिश करते हुए मनु ने कहा- ‘निखिल से मैंने कभी घृणा नहीं की।’
‘क्यों तेरा उसकी ओर से मुंह फेर लेना-यह कहना कि भविष्य में तुम मुझसे कभी न मिलोगे और फिर उसे भुलाकर आनंद से प्रेम करना-यदि यह घृणा न थी तो और क्या थी?’
‘मैं पापा के निर्णय के कारण विवश थी।’
‘तू चाहती तो पापा के निर्णय को बदल भी सकती थी। उन्हें तेरी हठ के आगे झुकना पड़ता। किन्तु तूने ऐसा न किया। कारण यह था कि तू निखिल की गरीबी को स्वीकार करने को तैयार न थी। तुझे निखिल की तो जरूरत थी किन्तु उसकी निर्धनता की नहीं। और इसी निर्धनता के कारण तूने उससे घृणा की। इसी निर्धनता के कारण तूने उससे मिलना उचित न समझा। और आज-आज जब तू उसे एक अमीर युवक के रूप में देख रही है तो तेरे हृदय में उसके लिए प्यार उमड़ रहा है। उससे मिले बिना तुझे चैन नहीं। क्या इसका अर्थ यह नहीं कि तू निखिल से नहीं, उसकी दौलत से प्यार करती है।’
‘नहीं!’ चीख-सी पड़ी मनु। बोली- ‘यह सब झूठ है। यह सच नहीं है! मैंने निखिल की दौलत से नहीं निखिल से प्यार किया है। मेरे हृदय में उसके लिए आज भी उतना ही प्यार है, जितना पहले था।
अंतरात्मा जोरों से हंस पड़ी।
मनु ने घबराकर रिसीवर रख दिया और यों हांफने लगी-मानो मीलों से भागकर आई हो।
तभी फोन की घंटी बजी।
मनु ने शीघ्रता से रिसीवर उठाया-बोली- ‘हैलो! मनु बोल रही हूं।’
‘मैं निक्की बोल रहा हूं मनु! तुम्हारा निक्की।’
‘ओह!’ मनु के होंठों से निकला-बोली- ‘कैसे हो तुम?’
‘बीमार हूं मनु!’
‘माई गाड!’ मनु घबराकर बोली- ‘कौन-सी बीमारी लग गई?’
‘दिल की। और जानती हो-यह बीमारी मुझे कितने दी? तुमने-तुम्हारे प्यार ने मनु! आज मेरे जीवन में सब कुछ है। दौलत भी और इज्जत भी। किन्तु इसके बावजूद भी तुम्हारी कमी खल रही है। यों लगता है-मानो विधाता ने मुझे सब कुछ देकर भी कुछ न दिया हो।’
‘ऐसा न कहो निक्की! ऐसा न कहो। यह मत सोचो कि मैं तुम्हारी नहीं। मैं पराई हो गई तो क्या-किन्तु मेरा प्यार तो आज भी तुम्हारा है। फिर कमी कैसी? लोग एक-दूसरे से दूर रहकर भी तो प्रेम करते हैं। दूर-दूर रहने से प्रेम तो नहीं मिट जाता।’
‘यही सोचकर तो अपने आपको समझाने की कोशिश कर रहा हूं। ससुराल से आज ही आई हो न?’
‘हां! और अब मैं यहीं रहूंगी। सदा के लिए यहीं। तुम आओ न किसी दिन। दोपहर के समय आना। आनंद सुबह दस से सायं चार बजे तक कॉलेज में रहता है।’
‘आऊंगा मनु! किन्तु कल तो तुम्हें आना पड़ेगा। जानती हो क्यों-क्योंकि कल मेरा जन्मदिन है। आनंद से कुछ भी कह देना और संध्या को ठीक पांच बजे रोशनी बाग में मिलना। हम लोग कहीं दूर चलेंगे। तुम-तुम आओगी न मनु?’
‘मैं आऊंगी निक्की! जरूर आऊंगी।’
तभी दूसरी ओर से संबंध विच्छेद हो गया और मनु ने निःश्वास लेते हुए रिसीवर रख दिया।
सुबह का समय था। राजाराम बैंक जाने के लिए तैयार हुआ और ज्यों ही कमरे से निकला; बरामदे में आते निखिल को देखकर वह रुक गया।
निखिल समीप आकर पिता के चरणों में झुका। किन्तु राजाराम फुर्ती से पीछे हटा और घृणा में बोला- ‘कोई आवश्यकता नहीं मेरे पांव छूने की। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे यह गंदे हाथ मेरे पांवों को स्पर्श करें।’
‘पापा!’
‘तुम्हें जरूरत भी नहीं यहां आने की। न तो यह घर तुम्हारा है और न ही इस घर में कोई ऐसा व्यक्ति रहता है, जिसे तुम अपना कह सको। जाओ-चले जाओ यहां से। मैं कहता हूं-जाओ और कभी भूलकर भी इस ओर आने की कोशिश न करना।’
‘पापा!’ दयनीय स्वर में निखिल बोला- ‘आज मेरा जन्मदिन है।’
राजाराम क्रोध से चीख पड़ा- ‘झूठ बोलता है तू! तेरा जन्म ही नहीं हुआ तो जन्मदिन कैसे हो सकता है। और यदि तेरा जन्म हुआ भी था तो बोल-बोल किसकी कोख से तेरा जन्म हुआ था? कौन वह पिता था, जिसने तुझे बांहों के झूले में झुलाया था? कौन बहन थी तेरी, जिसने तेरी कलाई पर राखी बांधी थी? कोई भाई था जो आयु में बराबर का होते हुए भी तेरे पांव छूता था? बोल-था कोई तेरा ऐसा?’
‘सब थे पापा! और आज भी सब हैं।’
‘नहीं निखिल नहीं! आज तू उन सबसे दूर हो चुका है। दौलत की बहुत ऊंची दीवार खड़ी है तेरे और हमारे रास्ते में।’
‘मेरे पास जो कुछ है सब आपका ही तो है।’
‘क्या है तेरे पास? करोड़ों की दौलत। किन्तु जिसे तू दौलत कहता है, वह हमारी नजरों में हराम की कमाई है। जरूर तूने किसी बैंक को लूटा है। जरूर तूने किसी का खून किया है या फिर तू तस्करी करता है। नहीं चाहिए हमें तेरी यह दौलत।’
निखिल की आंखें भर आईं।
उसने डबडबाई आंखों से देखा। द्वार के पास उसकी मां कौशल्या, भाई एवं दोनों बहनें खड़ी थीं।
राजाराम दिल का मरीज था। वह आवेश को सहन न कर सका और उसने जल्दी से पीछे हटकर दीवार का सहारा ले लिया।
यह देखकर निखिल का छोटा भाई अखिल आगे आया और निखिल से बोला- ‘जाइए भाई साहब और इस घर की बची-खुची शांति को भंग मत कीजिए। आपको देखते ही पापा की तबीयत बिगड़ जाती है और फिर इन्हें दो-तीन दिन की छुट्टी लेनी पड़ती है।
‘अखिल!’ भर्राए स्वर में निखिल ने पूछा- ‘क्या-क्या दूसरों की तरह तू भी मुझे गलत समझता है?’
‘आप अच्छे ही कब हैं? क्या अच्छे लोग तस्करी करते हैं? बैंक लूटते हैं? डाके डालते हैं?’
‘अखिल! मैं सच कहता हूं, मैंने कोई बैंक नहीं लूटा।’
‘बैंक नहीं लूटा तो इतनी दौलत आई कहां से?’
‘दौलत-दौलत।’ निखिल झुंझलाकर चीख पड़ा- ‘मेरी समझ में नहीं आता कि तुम लोगों को दौलत से इतनी घृणा क्यों है? और यदि घृणा है तो पापा सुबह से शाम तक बैंक में नौकरी क्यों करते हैं? आरती पढ़ती क्यों है? मम्मी आया की नौकरी क्यों करती है? और भारती दीदी विवाह के पश्चात् घर क्यों बैठी है? दौलत-सिर्फ दौलत अखिल! तुम लोग दौलत कमाने के लिए बाहर निकलते हो। तुम लोग महीने में चार दिन इसलिए भूखे सोते हो-क्योंकि तुम्हारे पास दौलत नहीं है। दौलत के महत्व को समझो अखिल! उसकी आवश्यकता को समझो। इसके बिना संसार में कुछ नहीं। गरीब से कोई प्यार नहीं करता। गरीब की कोई इज्जत नहीं करता। निर्धन लोग विद्वान होते हुए भी मूर्ख समझे जाते हैं और सज्जन होकर भी दुर्जन कहे जाते हैं। इसलिए प्यार करो दौलत से। यह मत सोचो कि वह आती कहां से है। आती है तो उसका स्वागत करो। आरती उतारो उसकी। तुमने मेरा एक वर्ष पहले का समय देखा? कॉलेज से निकाल दिया गया था मुझे। कॉलेज की फीस नहीं दे पाया था मैं। जिन साथियों को मैं अपना मित्र कहता था, उन्होंने मुझे पांच रुपए भी उधार नहीं दिए थे। और-स्वयं गोपीनाथ जिनकी लड़की मुझसे मिले बिना एक दिन भी नहीं रह सकती थी-उसने मुझे ठोकर मार दी। मिलना छोड़ दिया। मुझसे घृणा की। और यह सब-यह सब इसलिए हुआ अखिल! क्योंकि उस वक्त मेरे पास चरित्र भी था, ईमान भी था किन्तु दौलत नहीं थी।’
‘और!’ अखिल चुप न रहा और बोला- ‘आज आपके पास सिर्फ दौलत है चरित्र और ईमान नहीं।’
‘कौड़ियों के मोल बिकता है इस संसार में चरित्र। नोटों की गड्डियां हों तो ईमान सरेआम खरीद लिया जाता है। आश्चर्य है कि तुम ऐसे चरित्र और ईमान की तुलना दौलत से कर रहे हो।’
‘मैं आपसे बहस नहीं करता भाई साहब! मैं तो सिर्फ इतना ही कहूंगा कि हम लोग अपने आदर्शों को नहीं त्याग सकते। हमें अपना चरित्र और अपना ईमान संसार भर की दौलत से अधिक मूल्यवान है। आपको अपनी अमीरी मुबारक हो और हमें अपनी गरीबी। अवैध ढंग से उत्पन्न की गई दौलत को छूना तो दूर-हम उसकी ओर देखना भी पाप समझते हैं।’ इतना कहकर अखिल मुड़ा और पिता के समीप आ गया।
राजाराम अब भी क्रोधावस्था में थे और गहरी-गहरी सांसें ले रहे थे। अखिल ने उन्हें सहारा देकर कहा- ‘चलिए पापा! थोड़ी देर आराम कर लीजिए। आपकी तबीयत ठीक नहीं। थोड़ा लेट भी हो जाएंगे तो कुछ न होगा।’
राजाराम ने चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आंखों में क्रोध के शोले बरस रहे थे। उसने एक बार निखिल को देखा और फिर अखिल से कहा- ‘इस कमीने से कहो कि यह यहां से चला जाए। मैं-मैं इसकी सूरत भी देखना नहीं चाहता।’
‘शांति से काम लीजिए पापा! क्रोध आपके लिए ठीक नहीं।’
‘शांति तो अब मौत के बाद ही मिलेगी। या फिर उस दिन मिलेगी-जब ये संपोलिया दुनिया से चला जाएगा। मेरे कुल को दाग लगा दिया इस कुत्ते ने। पता नहीं यह स्वतंत्रता सेनानी कालीप्रसाद के खानदान में क्यों पैदा हुआ? मेरे दादाजी जीवन भर देश के लिए लड़े। पिताजी ने जीवन भर समाज की सेवा की। और यह-यह कमीना आज उसी देश और समाज का खून पी रहा है। लानत है इस पर-हजार दफा लानत है।’ कहते-कहते राजाराम की सांसें उखड़ने लगीं।

फिर जब वह किसी प्रकार भी अपनी सांसों को नियंत्रित न कर सका तो नीचे बैठ गया और अपना सीना मसलने लगा।
यह देखकर कौशल्या, आरती एवं भारती जल्दी से उसके समीप आ गईं और उसे सहारा देकर अंदर ले गईं। उनमें से प्रत्येक की आंखों से निखिल के लिए घृणा की चिंगारियां छूट रही थीं।
निखिल ने सख्ती से होंठ काट लिए। फिर वह एक पल के लिए भी न रुका और तेज-तेज पग उठाते हुए घर से बाहर आ गया। उसका हृदय मानो उससे बार-बार एक ही प्रश्न पूछ रहा था-करोड़ों की दौलत पाकर उसे मिला क्या था।
किन्तु निखिल के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर न था।

