Motivational Hindi Story: हज़ारों लोगों से खचाखच भरे हॉल के स्टेज पर डॉक्टर अमन अपने हाथ में माइक और एक किताब लेकर प्रवेश करते हैं, “ आप सबका स्वागत है। आज हम यहां मशहूर डॉक्टर श्याम की किताब का विमोचन करने आए हैं जो एक खोज पर आधारित है। आज डॉक्टर श्याम को किसी परिचय की ज़रूरत नहीं है। उनकी पिछली किताब ‘नेपोटिज़्म- कहीं श्राप कहीं वरदान’ अंतर्राष्ट्रीय दर्जे पर प्रसिद्ध हुई और उसकी लगातार हज़ारों कॉपियां आज भी बिकती हैं। जिस किताब के लिए लेकिन आज जो हम सब यहां सम्मिलित हुए हैं उस किताब के लिए उन्हें करीब 28 साल पहले सर्वोच्च सम्मान मिल चुका होता। जी हां यही किताब(डॉक्टर अमन किताब हाथ में ऊंची उठाकर सबको दिखाते हैं) डॉक्टर श्याम की खोज पर उनके द्वारा लिखी गई थी।
आज माननीय मिनिस्टर साहब के द्वारा उनको सम्मानित करने के लिए लिए आईए स्वागत करते हैं डॉक्टर श्याम का।”
डॉक्टर अमन के हाथ के इशारे पर कैमरे की लाइट एक करीब 80 साल के बुज़ुर्ग पर पड़ती है। दो लोगों की मदद से वह कुर्सी से उठते हैं और उन लोगों की मदद से स्टेज पर आते हैं। डॉक्टर श्याम शरीर से ज़्यादा मन से थके हुए दिख रहे थे। यह बात उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी, उनके होठों पर मुस्कान नहीं थी लेकिन आंखों में आंसू ज़रूर थे। कांपते थके शरीर को वह किसी तरह कुर्सी तक ले जाते हैं और ऐसे बैठते हैं मानो अपने आप को पूरी तरह से उसे समर्पित कर दिया हो।
डॉक्टर अमन जब उनके पास माइक लाकर कहते हैं, ‘मैं चाहूंगा डॉक्टर श्याम अपनी खोज के बारे में हमें कुछ जानकारी दें”….. कहते कहते वह माइक डॉक्टर श्याम की तरफ़ बढ़ा देते हैं। डॉक्टर श्याम की बस गीली आंखें ही बोल पा रही थीं जबकि ज़बान एकदम शांत थी। किसी तरह मानो लाखों जतन से उन्होंने हिम्मत जुटाई और बस इतना कहा, “मैं डॉक्टर अमन का हमेशा आभारी रहूंगा…. मेरा आशीर्वाद हमेशा उनके साथ है”… यह बोलकर वह एक मूक मूरत की भांति वहीं बैठे रहे।
डॉक्टर अमन वापस माइक लेकर कहते हैं, “ डॉक्टर श्याम ने इस किताब में जो खोज के बारे में लिखा है वह विज्ञान की दुनिया में एक चमत्कार है। यह सिर्फ़ एक खोज नहीं बल्कि उनकी पूरी जीवन यात्रा है। जो डॉक्टर श्याम की इस ऐतिहासिक जीवन यात्रा के बारे में समझना चाहते हैं वह उनकी लिखी हुई पहली किताब ‘नेपोटिज्म’ पढ़ें। जब मैंने किताब पढ़ी तो मैं उनके मन में जो कुछ टूटा था उसे समझ पा रहा था। मेरी जगह कोई दूसरा वैज्ञानिक होता तो शायद एक किताब समझ के नेपोटिज़्म के खिलाफ चार नाराज़गी दिखाता।
मैं कॉलेज के शुरुआती दिनों से ही डॉक्टर श्याम को अपना गुरु मानता आया हूं। उनके विचार, शोध और उनके ज्ञान के बारे में मैंने बहुत पढ़ा और समझा। यूं तो विज्ञान के ऊपर सर की कईं किताबें छपी हैं लेकिन नेपोटिज़्म पर उनकी लिखी किताब एक राह से हटकर विषय था। जैसे जैसे मैं वह किताब पढ़ता गया मुझे कुछ कुछ समझ आने लगा के हो ना हो किताब डॉक्टर श्याम की अपनी कहानी है। वो भी शायद इसीलिए क्योंकी मैंने सुना था कि वह महीनों से किसी खास खोज पर काम कर रहे थे लेकिन फ़िर अचानक से डॉक्टर श्याम की कोई खास खबर नहीं मिली और खोज के बारे में तो जैसे ताला सा लग गया था।
नेपोटिज़्म की किताब पढ़ते हुए महसूस हुआ कि वह इस खोज से जुड़ी है। तब मैंने कुछ लोगों की मदद से सर की पुरानी खोज के कुछ कागज़ात निकलवाए। कागज़ात पढ़कर अचंभा हुआ कि इतनी खास ऐतिहासिक खोज को डब्बे में बंद क्यों रखा था। पता करते करते सारी बात सामने आई। मैं यहां किसी का नाम तो नहीं लूंगा खासकर इसलिए की सर ने भी किताब में किसी का नाम ज़ाहिर नहीं करा है। ये तब की बात है जब सर की खोज को वह फाइनल कराने के लिए अपनी टीम के सीनियर डॉक्टर के पास गए थे। सीनियर डॉक्टर ने उन्हें कुछ दिन रूकने के लिए कहा। लेकिन वह सीनियर डॉक्टर जब तब डॉक्टर श्याम को टालते रहते। काफ़ी वक्त बीत जाने पर डॉक्टर श्याम को किसी तरह पता चला कि उन सीनियर डॉक्टर ने उनकी खोज से जुड़ी हर जानकारी अपने डॉक्टर भतीजे को दे दी थी। लेकिन कहते हैं ना नकल के लिए भी अकल चाहिए। वह डॉक्टर भतीजा सर की तरह समझदार नहीं था। नतीजन, सारी जानकारी हाथ में होने के बावजूद वह कुछ नहीं कर पा रहा था। अपनी बदनामी के डर से शायद, लेकिन डॉक्टर श्याम के सीनियर ने अपनी सांठगांठ से उस खोज को बाहर आने ही नहीं दिया। सर किसी भी तरह कोशिश करते रहे, उनके कागज़ात आगे जा नहीं पाते और आखिरकार सर की सालों की मेहनत और भागदौड़ करीब २3 साल के लिए अलमारी के डब्बे में कैद हो गई।
आखिरकार मैंने सर के आधे अधूरे कागज़ातों की मदद से खोज का काम दोबारा शुरू करा और आज कुछ सालों की मेहनत के बाद यह किताब आपके सामने है। इस पर हालांकि मेरा और सर, दोनों का नाम है लेकिन किताब सिर्फ़ और सिर्फ़ डॉक्टर श्याम की ही है।
एक बात और कहना चाहूंगा… नेपोटिज़्म सिनेमा या बड़ी कंपनियों में ही नहीं बल्कि हर जगह देखने को मिलता है। बेशक, आप काबिल हैं तो सीढ़ी पर कदम रखने और चलने में अपने बच्चों या रिश्तेदारों की मदद ज़रूर करेंगे। उसमें कुछ पूरी तरह गलत भी नहीं है, लेकिन किसी और की मेहनत की सीढ़ी का इस्तेमाल करने का किसी को कोई हक नहीं। याद रखिए नेपोटिज़म सीढ़ी तो दे सकता है लेकिन मंज़िल तक पहुंचने के लिए चढ़ना तो इंसान को खुद ही पड़ता है।
वह डॉक्टर भतीजा आज भी नाकाम हैं।डॉक्टर अमन सबको धन्यवाद करते हुए डॉक्टर श्याम को आगे लाते हैं और उनको सहारा देकर उनके हाथों से ही किताब का विमोचन कराते हैं। डॉक्टर श्याम अपने एक हाथ से किताब डॉक्टर अमन की तरफ़ बढ़ाते हैं और दूसरा हाथ उनको आशीर्वाद देने के लिए उठाते हैं।
