Summary: राखी और पापा: 15 साल की दूरी के बाद मुलाक़ात
छह साल की उम्र में पिता से बिछड़ चुकी राखी ने 15 साल बाद अपनी अधूरी चाहत पूरी की। हिम्मत और अपनापन ने उन्हें फिर से जोड़ दिया।
Short Story in Hindi: राखी को अपने पिता की धुंधली-सी याद थी। वह सिर्फ़ छह साल की थी, जब माँ और पिता अलग हो गए। उस छोटे से मन में बस इतना ही बैठा था कि पापा कहीं चले गए हैं । उसके बाद माँ ने ही उसका पूरा संसार बना दिया। माँ के साथ रहते हुए उसने कभी पिता की कमी ज़ाहिर नहीं की, लेकिन भीतर कहीं न कहीं वह सवाल हमेशा रहा मेरे पापा कहाँ हैं?
राखी बड़ी हो रही थी। स्कूल, कॉलेज और फिर नौकरी ज़िंदगी आगे बढ़ती रही। माँ ने पूरी ताक़त लगाकर उसे अच्छे से पाला। लेकिन पापा का नाम सुनते ही माँ की आँखें भीग जातीं और राखी चुप हो जाती। रिश्तेदारों से उसने अक्सर सुना कि उसके मामा बहुत दबंग थे। उसी दबंगई के डर से उसके पिता ने कोर्ट-कचहरी का रास्ता नहीं चुना। शायद वे सोचते होंगे कि बच्ची माँ के पास रहेगी तो उसका जीवन सुरक्षित रहेगा।
पंद्रह साल बीत गए। राखी अब इक्कीस साल की थी। उसके दिल में पिता के लिए कोई गुस्सा नहीं था, बस एक अधूरी चाहत थी एक बार उन्हें देखने की, गले लगाने की।
फिर वह दिन आया। संयोग से कॉलेज के एक कार्यक्रम में उसे एक व्यक्ति से परिचय कराया गया। राखी जैसे ही मुड़ी, उसकी नज़र उस आदमी की आँखों से मिली। उनमें एक अजीब-सी चमक थी जैसे बरसों से किसी का इंतज़ार कर रही हों।
राखी? उसने नाम पुकारा। आवाज़ में कंपन था।
राखी ठिठक गई। कुछ पल तक समझ ही नहीं पाई, फिर जैसे दिल ने फुसफुसाकर कहा ये वही हैं…
पापा… शब्द होंठों से निकला और उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
पिता ने कांपते हाथों से उसे गले लगा लिया। पंद्रह साल का सूनापन एक पल में भर गया। वह बच्ची, जो कभी छह साल की उम्र में पापा की उँगली थामना चाहती थी, अब जवान बेटी बनकर उनके सीने से लिपट गई।
मुझे माफ़ कर दो, बेटा, पिता की आवाज़ में गहरा दर्द था। मैं मजबूर था। तुम्हारे मामा से लड़ नहीं सका। सोचा कम से कम तुम्हारा जीवन सँवर जाए। हर जन्मदिन, हर त्यौहार पर दूर से दुआ करता रहा…
राखी रोते हुए बोली, पापा, मैंने कभी आपसे नफ़रत नहीं की। बस इतना चाहा था कि एक बार आपकी गोद में सिर रख सकूँ।
उस पल दोनों के दिल में एक ही भावना थी प्रेम और अपनापन। ज़िंदगी के साल चाहे कितने भी छिन गए हों, लेकिन रिश्तों की डोर टूटी नहीं थी।
भीड़-भाड़ वाले हॉल में पिता-बेटी की वो मुलाक़ात किसी फिल्मी दृश्य से कम न थी। लोगों की नज़रें उन पर थीं, लेकिन उन्हें कुछ परवाह नहीं थी।
राखी के आँसू पिता के कंधे पर गिर रहे थे, और पिता की हथेलियाँ बेटी के बाल सहला रही थीं। दोनों जैसे कह रहे हों अब चाहे जितना समय मिला है, हम साथ रहेंगे।
वो पल रूला देने वाला था क्योंकि उसमें बिछड़ने का दर्द भी था और मिलने की मिठास भी। राखी ने जाना, पिता का प्यार कभी कम नहीं हुआ था, बस हालातों ने उन्हें अलग कर दिया था। और अब, बरसों बाद, वो प्यार उसके जीवन में लौट आया था।
दोनों गले मिलकर रो ही रहे थे कि तभी पीछे से एक तेज़ आवाज़ आई
राखी!
माँ और मामा वहाँ खड़े थे। माँ की आँखों में आँसू थे, पर मामा का चेहरा ग़ुस्से से तमतमा रहा था।
तुम्हें शर्म नहीं आती, यहाँ आकर नाटक कर रहे हो? मामा गरजे।
पिता काँपते हुए बोले, मैं सिर्फ़ अपनी बेटी से मिलने आया हूँ, कुछ छीनने नहीं।
मामा आगे बढ़े ही थे कि राखी अचानक बीच में खड़ी हो गई। उसकी आँखों में अब मासूमियत नहीं, हिम्मत चमक रही थी।
मामा! उसने दृढ़ आवाज़ में कहा। आपकी वजह से मेरे पापा पंद्रह साल मुझसे दूर रहे। लेकिन अब मैं बड़ी हो चुकी हूँ। किसी को हक़ नहीं कि मेरी ज़िंदगी से उनका हक़ छिने। चाहे आप हों या कोई और!
पूरा हॉल सन्न रह गया। माँ रो पड़ीं और आगे बढ़कर बोलीं, भाई, अब छोड़ दो। बच्ची को उसका पिता चाहिए।
मामा ने गुस्से में नज़रें फेर लीं, पर कुछ बोल न सके।
उस दिन राखी ने अपने पापा का हाथ थामा और पहली बार चैन की साँस ली। सालों की जुदाई के बाद वो पल आँसू भरा था, पर उसमें जीत का स्वाद भी था प्यार और अपनापन की जीत।
