KHUSHI, Anshula, Arjun and Janhvi
KHUSHI, Anshula, Arjun and Janhvi

Summary : अब चारों कपूर भाई-बहन अलग ही स्तर जुड़े हैं

श्रीदेवी की मौत ने अंशुला और अर्जुन कपूर को खुशी और जान्हवी के करीब लाने का काम किया। बड़ों ने काफी बड़प्पन दिखाया जिससे हालात सुधरे...

Anshula Kapoor with Janhvi and Khushi: जब 2018 में श्रीदेवी का निधन हुआ, तब उनकी बेटियां जान्हवी और खुशी कपूर सिर्फ 21 और 17 साल की थीं। इतनी छोटी उम्र में मां को खो देना बेहद भारी महसूस हो सकता है। इस कठिन समय में उन्हें सहारा मिला अपने सौतेले भाई-बहन अंशुला और अर्जुन कपूर से, जिनसे उनका पहले बहुत गहरा रिश्ता नहीं था। हाल ही में द क्विंट से बातचीत में अंशुला ने बताया कि उन्हें क्यों लगा कि यह हाथ बढ़ाना जरूरी है।

अंशुला ने कहा “मैंने उनसे बात की। मैंने उस दौर को याद किया जो मैंने मां को खोने के बाद जिया था। मैं नहीं चाहती थी कि वे अकेले उस दौर से गुजरें क्योंकि मुझे पता था ये कितना मुश्किल होता है। यही बात मेरी और भैया की आपस में हुई थी कि हम नहीं चाहते थे कि वे इस स्थिति को अकेले झेलें क्योंकि जब हमारी मां का निधन हुआ था तब हम उनसे बड़े थे। लेकिन उन्हें यह तब झेलना पड़ा जब वे सिर्फ 17 और 20 साल की थीं। यह बहुत छोटी उम्र है इसलिए हमने उनसे संपर्क किया और सहारा दिया।”

अंशुला ने अपनी छोटी बहनों की मजबूती की भी तारीफ की, खासकर इस बात की कि उन्होंने इतने सार्वजनिक रूप से अपने दुख का सामना किया। अंशुला कहती हैं, “वे दो अलग-अलग शख्सियतों और मजबूत औरतों में बदल गई हैं। उन्हें इस तरह बढ़ते हुए देखना मेरे लिए भी सशक्त करने वाला रहा है। उन्होंने सिनेमा में तब कदम रखा जब सोशल मीडिया अपने सबसे अस्थिर दौर में था, जब तारीफ से ज्यादा ट्रोलिंग होती थी।” फिलहाल के रिश्ते के बारे में उन्होंने कहा, “अब वे दोनों जानती हैं कि मैं उनकी बड़ी बहन हूं, चाहे कुछ भी हो जाए हम एक-दूसरे को जज नहीं करते। हम चारों के बीच बातचीत के लिए हमेशा रास्ता खुला होता है।”

Anshula in different moods
Anshula in different moods

अगर आपके करीब में ऐसी ही कोई घटना हुई है तो बिना मां वाले टीनएजर्स का ध्यान रखना आपकी जिम्मेदारी है। यकीन मानिए 17 या 20 साल की उम्र में माता-पिता को खोना ऐसा है जैसे बिना नक्शे के वयस्कता में धकेल दिया जाना। उस उम्र में बच्चे, माता-पिता पर मार्गदर्शन और प्यार के लिए निर्भर होते हैं और अचानक वह सुरक्षा जाल टूट जाता है तो यह वज्रपात समान है। भाई-बहन या परिवार… दुख को मिटा तो नहीं सकते, लेकिन वे उसके बोझ को हल्का जरूर कर सकते हैं।”

आपका काम छोटे-छोटे और लगातार किए गए कामों से स्थिरता देना है, जैसे दिनभर के बाद हालचाल पूछ लेना, साथ में खाना खाना या बस पास होना। सबसे अधिक मददगार होता है मौजूद रहना, बिना किसी दबाव के। आपका पहला कदम होना चाहिए है बच्चों की भावनात्मक सीमाओं की रक्षा करना। सोशल मीडिया पर म्यूट करना, ब्लॉक करना या वहां से दूर होना देखभाल का काम है, भागना नहीं। आपको यह ध्यान रखना होगा कि सबसे जरूरी बात यह याद रखना है कि दुख कोई दिखावा नहीं है। इसे बाहर की दुनिया के लिए संभला हुआ ना रखें। आपको कतई खुद को मजबूत दिखाना जरूरी नहीं है।

ढाई दशक से पत्रकारिता में हैं। दैनिक भास्कर, नई दुनिया और जागरण में कई वर्षों तक काम किया। हर हफ्ते 'पहले दिन पहले शो' का अगर कोई रिकॉर्ड होता तो शायद इनके नाम होता। 2001 से अभी तक यह क्रम जारी है और विभिन्न प्लेटफॉर्म के लिए फिल्म समीक्षा...