Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “कुछ तो बताओ यार, क्या करूँ? मुझे सेल्फ डिपेंड होना ही है।” उसने ऐसे कहा, जैसे वह बहुत संजीदा है इस बात के लिए।

“मेरे बताने से कुछ नहीं होगा, अपनी सिचुएशन के अकॉर्डिंग तुम्हें ही चूज़ करना होगा।” चिरपरिचित जवाब।

“जॉब में तो घर वालों के नाटक रहेंगे और कोई ऐसी स्कील्स है नहीं मुझमें कि, कोई प्रोफेशनल सर्विस दे सकूँ। कोई बिज़नेस ही बताओ।”

“अपने आस-पास की चीजों को ग़ौर से देखो और उसमें से सोल्यूशन निकालो। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से कुछ आइडिया आए तो ज़्यादा अच्छा है; इसको तुम बाद में भी कन्टीन्यू कर पाओगी। ट्रेडिशनल बिज़नेस में जाना है, तो पापा के बिज़नेस में दिमाग लगाकर उसे डेवलप करो।” मैं जानता था, उसे आसान रास्ता चाहिए। जो मैं सुझा रहा था वह भी इतनी आरामदायक राह तो नहीं; पर कौन सी सरल राहें मंजिलों तक पहुँचाती हैं?

“नहीं यार वो सब में कुछ मज़ा नहीं है। मुझे मेरे इन्टरेस्ट का काम चाहिए।”

“काम इन्टरेस्ट का नहीं होता डियर, वह मस्ती और इन्टरटेन्मेंट होता है।” मुझे ऐसी बातों से कुढ़न होती है।

“हाँ तो वैसा ही तो काम होना चाहिए, जैसे हम अपने शौक़ पूरे कर रहे हों।”

“हा…हा…हा…मूवी की दुनिया से बाहर निकल आओ डार्लिंग। मेरा शौक़ शराब पीना है, तो बार टेन्डर बन जाऊँ या म्यूज़िक है, तो गिटार बजाता फिरूँ या मसाज कराना अच्छा लगता है, तो मसाजर बन जाऊँ या फोटोग्रॉफी का शौक़ है, तो फोटोग्राफर?” मुझे पता है, हर काम चाहे वह दिलचस्प लगता हो या नहीं, सफल होने के लिए जान लगानी ही होती है।

“हाँ तो इसमें दिक्क़त क्या है? काम तो अपनी पसंद का ही करना चाहिए।”

“मैं उन झूठे ख़्वाबों से बहुत ऊपर हूँ डियर। मेरे शौक़ सच्चे हैं। मैं पूरी तल्लीनता से अपने धंधे में पैसा कमाता हूँ, ताकि अपने शौकों को पूरा कर सकूँ। शराबखोरी और मज़े के लिए तय दिन का इंतज़ार करता हूँ। म्यूज़िक का मज़ा लेता हूँ, हर हफ़्ते नए-नए मसाज़ पार्लर जाता हूँ और तुम अपनी फोटो भेजना एडिट करके देता हूँ, देखना किस मस्ती से करता हूँ। मज़े और धंधे को अलग-अलग रखो डियर। किसी बड़े वैज्ञानिक को जब गिटार बजाने का शौक़ होता है, तो वह अपने काम से ब्रेक लेकर धुनों में खो जाता है, जो उसे पॉवर देती है; सोचो वह गिटार को ही धंधा बना लेता तो क्या ख़ुद के लिए करता, क्या दुनिया के लिए।”

“तो इतने जो म्यूजिशियन, सिंगर हैं सब काम कर रहे हैं या मज़े ले रहे हैं?” अब भी उसका सवाल बेढब ही था।

“काम करते हैं वे लोग। मेहनत करते हैं, एक-एक बिट्स की परफेक्शन के लिए दिमाग सोते-जागते, नहाते-खाते काम करता है। क़ामयाब लोग औसत दर्जे के नहीं होते। हमें कामयाबी दिखाई देती है, उसके पीछे की मेहनत नहीं। औसत दर्जा शौकीनी के लिए अच्छा है। अपनी जिदों के पीछे करियर की राह में निकले औसत दर्जे के कलाकर जीवन भर संघर्ष ही करते हैं।”

मुझे अब भी यक़ीन नहीं था कि वह पैसा कमाने को लेकर इतनी संजीदा है। शायद उसे पापा और पति के शरणागत रहना ज़्यादा आसान राह लगती है, कभी-कभार दूसरों को देखकर मन खिन्न होता था। औरों को देखकर या बहुत बार अबला जीवन की असलियत समझते हुए बेचैन हो जाती थी। कितनी बार एक ही सवाल का जवाब दे चुका था उसे, लेकिन कभी लगता था कि वह सब जानते हुए भी किसी तरह बच निकलने या शॉर्ट-कट की राह पर ज़्यादा यक़ीन रखती थी।

इस बार भी नाकामयाब रहा समझाने में, कि ज़िंदगी के लिए अपनाए जाने वाले शॉर्टकट हक़ीक़त में हमारे ही चुने गए भद्दे और लम्बे रास्ते साबित होते हैं।