Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “क्या हुआ सरदारनी? चेहरे पर मूर्दे क्यों नाच रहे हैं? अपनी चोरी तो पकड़ी नहीं गई?” मैंने उसे बहुत गंभीर देखकर मन थोड़ा हल्का करने की नीयत से मज़ाकिया लहजे में पूछा। वह दुपट्टे से मुँह ढाँके हुए एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की पार्किंग में अपनी स्कूटी खड़ी करके मेरी कार में आई थी और अब खिन्न चेहरे से पर्दा हटा ही था।

“उसका फोन आया था, पापा के पास।”

“क्या बोल रहा था कमीना?”

“वही सब। कि अब सुधर गया है और दुनिया भर की कसमें खा रहा था।”

“क्या पता इस बार सच में सुधर ही गया हो, एक आख़िरी मौका और देकर देख लो।”

“यह तुम बोल रहे हो? हमेशा तो यही समझाते थे, कि जाने दो उसको भाड़ में और अपना रास्ता ख़ुद बनाओ…”

“हाँ बोलता हूँ, पर तुम्हें भी तो देखता हूँ ना छोटी-छोटी चीजों के लिए परेशान होते। मैं कितना साथ दे पाता हूँ तुम्हारा और बाद में कितना दे पाऊँगा? देखती हो ख़ुद को, स्कूल से घर जाने का तुम्हारा मन ही कब होता है?” अलग रहने का दुख आदमी में जानवरपने और क्रूर स्वाभाव को गलाता है।

“वो सब ठीक है यार। लेकिन उस राक्षस की शक्ल याद आते ही घिन से मन भर जाता है।” उसने मुझे बताया था कि, उसके पति के यहाँ ट्रांसपोर्ट का बिज़नेस है और ज़्यादातर उसके ससुर ही सम्भालते हैं। पतिदेव का कहीं अफेयर था और उस लड़की ने ब्लैकमेल करके, उसके पति को छोड़ दिया, तब से वह चौबीस घंटे कफ सीरप और नींद की गोलियों के नशे में पड़े रहता है। कभी-कभार ही किसी काम से कहीं आता जाता है, घर की आर्थिक स्थिति तो उसके पापा के कारण सम्भली हुई ही थी, पर अपने साथ-साथ इसकी भी मानसिक स्थिति उसने ख़राब कर रखी थी। पांच साल का एक बेटा था, जिसके कारण यह कुछ भी सह लेती थी और उसी का फ़ायदा उठाते हुए पति अब हाथ तक उठा दिया करता था और कुछ कहने पर ‘बच्चे को मार दूँगा’ कह कर दिन-दिन भर कहीं गायब रखता था। यह जब अपने पति को छोड़कर आ गई तो कोर्ट ने बच्चे को उसके पापा को ही दिया, शायद आर्थिक स्थिति के कारण और इसलिए कि यह ख़ुद कमाती नहीं थी। यह अपने बच्चे से हफ़्ते में एक दिन मिल सकती थी और फोन पर बात कर सकती थी।

“उसके लिए नहीं, अपने बच्चे के लिए सोचो।”

“सब तो यही कहते हैं। कितनी मुश्किल से अभी लाइफ़ में थोड़ी शांति आई थी; तुम आए, तो ऐसा लगा जीने का हक़ मुझे भी है। मैंने जैसे-तैसे आशु की कमी में तो रहना सीख लिया था। मेरे पीछे से तो आशु को बहुत ज़्यादा प्यार से रखता है, उसके दादा-दादी की आँखों का तारा तो है ही ना। लेकिन सोचती हूँ अब फिर से वही सब हुआ तो? यहाँ तुमको और जॉब छोड़कर जाऊँगी और वहाँ उस घिनौने आदमी को रोज़ देखना पड़ेगा मुझे।”

“देखो डियर, ऐसे नेगेटिव माहौल में पले-बढ़े बच्चे बहुत ज़्यादा मानसिक प्रताड़ना झेलते हैं। अगर वह थोड़ा ठीक हुआ है तो उसे चाँस देकर देखो, और वह भी उसके लिए नहीं, अपने बच्चे के लिए। वापस आने का रास्ता तो हमेशा खुला हुआ ही है ना। लेकिन बस इतना करना, वहाँ जाकर भी कोई ऐसा काम ज़रूर करना जिससे तुम अर्निंग हैंड रहो। होश में आ जाओ, दुर्गा बनो, कितना दर्द सहोगी। अभी तुम्हारी सब बातें मान लेंगे वो लोग। उन्हें भी तो ज़रूरत होगी, तब तो बार-बार यह बात कही जा रही है। शायद तुमसे बात करने की हिम्मत ना हो इसलिए पापा को कॉल करता हो।”

“कुछ समझ नहीं आता यार, जो नर्क मैंने देखा है; कैसे ख़ुद जानते-बुझते हुए वापस उसी में कूद जाऊँ?”

“सुनो डियर! उस समय तुम नर्क में थी, क्योंकि तुमने ख़ुद को उस बेशर्म आदमी के ऊपर निर्भर समझा हुआ था। याद रखना; जिसके मन में डर ना हो, उसे गुलाम बनाया ही नहीं जा सकता। अब तुम वह मासूम सुखदीप नहीं, अब तुम में मेरा भी कुछ हिस्सा तो मिल ही गया है। तुम उनके साथ रहते हुए भी ख़ुद के लिए जीना मत भूलना। और मैं कहीं नहीं जा रहा तुम्हारी लाइफ़ से…मैं हूँ ना, हर समय तुम्हारे साथ। मुझे महसूस कर सकोगी तुम। फिजिकल साथ की कोई अहमियत नहीं डियर, मन से हम साथ हैं। बातें-मुलाकातें थोड़ी कम हो जाएँगी और क्या होगा? लेकिन आशु की लाइफ़ के सामने यह क़ीमत बहुत छोटी है। तुम बढ़ो आगे, लेकिन इस बार रास्ते ख़ुद चुनना और ज़िंदादिली से अकेले जी लेने की सोच भी रखना।”

“तुम मेरा साथ तो नहीं छोड़ोगे ना?” उसकी आँखे भर आईं।

“पागल हो तुम। मैं चाहूँगा कि, तुम्हें कभी मेरे सहारे की कोई ज़रूरत ना रहे, लेकिन मेरी वह ज़िंदगी भी तो किसी काम की नहीं, जब मैं ज़रूरत पर तुम्हारे काम ना आ सकूँ।”

“आई लव यू।” रुंधी आवाज़ में कहते हुए उसने अपना सिर मेरे कंधों पर रखा और एक हाथ से अपनी आँखों को ढक लिया। मैं देख सकता था उन पारदर्शी हथेलियों के पार, कि मैं भरोसे के नशे की तरह उसकी आँखों में छलक रहा था।